जब तस्करी से बचाया गया एक मुल्क का इतिहास

टिम्बकटू की पांडुलिपियां
Image caption माली के शहर टिम्बकटू में प्राचीन पांडुलिपियों को बचाने की मुहिम चल रही है

जब विद्रोहियों ने इस साल के शुरू में माली के शहर टिम्बकटू की दो इमारतों में आग लगा दी, तो लोगों को लगा था कि शायद सदियों पुरानी पांडुलिपियों का ख़ज़ाना तबाह हो जाएगा.

लेकिन उनमें से काफ़ी क़िताबें चोरी-छिपे शहर से बाहर सुरक्षित पहुंचा दी गई थीं.

टिम्बकटू के सबसे बड़े निजी पुस्तकालय के मालिक डॉक्टर अब्दुल हैदर कहते हैं, ''ये पांडुलिपियां हमारे लिए बहुमूल्य हैं. वे हमारे परिवार की धरोहर हैं, हमारा इतिहास और हमारी विरासत हैं.''

हैदर के पुस्तकालय में 16वीं सदी से पहले की पांडुलिपियां भी मौजूद हैं.

वह कहते हैं,''हमारे परिवार की हर पीढ़ी में महान विद्वान और खगोलविद हुए हैं और हम इन पांडुलिपियों को हमेशा देखते रहे हैं.''

दस्तावेज़ों की देखभाल

पिछले साल इस्लामी विद्रोहियों के टिम्बकटू पर कब्जा करने के बाद से इन दस्तावेजों की देखभाल एक असंभव काम हो गया है.

इस्लाम की सख़्त व्याख्या करने वाले विद्रोहियों ने पूजास्थलों को तबाह करना शुरू कर दिया. उन्हें लगता था कि इससे मूर्ति पूजा को बढ़ावा मिलता है.

इसके बाद यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ ज़्यादा लोकतांत्रिक दृष्टिकोण की ज़रूरत है.

हैदर कहते हैं, ''हमने महसूस किया कि इनकों पूरी तरह टिम्बकटू से बाहर ले जाने के लिए कोई दूसरा उपाय ढूंढने की ज़रूरत है.''

मगर यह काफी मुश्किल काम था. ''पांडुलिपियों का बोझ ज़्यादा था. हमें धातुओं के हज़ारों बक्सों की ज़रूरत थी. हमारे पास उन्हें बाहर ले जाने का कोई साधन नहीं था. हमें बाहरी सहयोग की दरकार थी.''

35 परिवारों की मंज़ूरी मिलने के बाद हैदर आर्थिक मदद की तलाश में निकले.

उन्हें नीदरलैंड के प्रिंस क्लाउस फ़ाउंडेशन, जर्मनी के विदेश मंत्रालय और कुछ दूसरे लोगों से मदद मिली.

तलाशी की समस्या

सावधानी के तौर पर हैदर और दूसरे पुस्तकालयों के मालिक सरकारी अहमद बाबा इंस्टीट्यूट के अफ़सरों के साथ थे.

इन्होंने अपने संग्रह के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हटाकर निजी घरों में छिपा दिए थे.

देखें - तबाह हो रही है टिम्बकटू की विरासत

एक समस्या यह थी कि विद्रोही टिम्बकटू से बाहर जाने वाली हर गाड़ी की तलाशी लेते थे. इसमें किसी पांडुलिपि के पाए जाने पर वे उसे या तो ज़ब्त कर लेते थे या नष्ट कर देते थे.

हैदर बताते हैं वो पांडुलिपियों को कारों, गधा गाड़ियों और डोगिंयों में भरकर ले गए.

यह अभियान पिछले साल अक्तूबर में शुरू हुआ. वह बताते हैं कि धातु के बक्सों को सब्जियों और फलों की टोकरियों के नीचे छिपाकर ले जाया गया.

ये गाड़ियां मोप्टि होते हुए बामको की ओर बढ़ीं. इस्लामी कब्जे के दौरान बामको सरकार के नियंत्रण वाला अकेला शहर था. कुछ पांडुलिपियां डोंगियों में बामको भेजी गईं.

पांडुलिपियां

इस साल जनवरी में विद्रोही जब टिम्बकटू से पीछे हट रहे थे तो उन्होंने अहमद बाबा इंस्टीट्यूट के दो पुस्तकालयों में आग लगा दी.

उस समय तक यह अभियान आधा ही हो सका था और पुस्तकालय महीनों से खाली पड़े थे. हैदर के मुताबिक कार्रवाई में केवल कुछ सौ पांडुलिपियों को ही नुक़सान पहुंचा था.

देश के उत्तरी हिस्से में स्थितियां हिंसक बनी रहीं और विद्रोहियों के जाने के तीन महीने बाद तक यह अभियान तक चलता रहा.

इस दौरान 24 सौ बक्सों में भरकर दो लाख 85 हज़ार पांडुलिपियों को राजधानी के निजी घरों में पहुंचाया गया.

अब बामको में इन पांडुलिपियों को एक नए तरह के ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है.

सैकड़ों साल पुरानी

Image caption कुछ सौ पांडुलिपियां एक हादसे में जलकर नष्ट हो चुकी हैं

टिम्बकटू में यह दस्तावेज तब से रखे थे, जब वह 13वीं से 17वीं शताब्दी तक इस्लामी शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था.

ये पांडुलिपियां सैकड़ों सालों से रेगिस्तान की शुष्क जलवायु में रखी हुई थीं. अब वे उष्णकटिबंधीय मौसम में रखी गई हैं. वहां अब बरसात का मौसम शुरू होने वाला है.

इन पांडुलिपियों की देखभाल कर रहे ग्रेदा हेंकेल फाउंडेशन की डॉक्टर मिशेल हांसलर कहती हैं, ''ये घर वातानुकूलित नहीं हैं और बामकों में आर्द्रता भी टिम्बकटू के मुकाबले बहुत अधिक है.''

जब तक पांडुलिपियां बक्सों में रहेंगी तब तक उनमें हवा का पहुंचना असंभव है. 60 फ़ीसदी आर्द्रता पर फंफूदी विकसित होने लगती है और जुलाई-अगस्त के महीने में यहां आर्द्रता 80 फ़ीसदी तक पहुंच जाती है.

बामको में एक घर का पुनर्निमाण जारी है. इसमें पांडुलिपियों के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था होगी. पांडुलिपियों को सूर्य की रोशनी, कीड़ों और ताप से बचाने के लिए इसकी खिड़कियां ईंटों से ढंक दी गईं हैं.

वहाँ एक ऐसी जगह होगी जहाँ से विशेषज्ञ इन पाडुलिपियों को संरक्षित कर उन्हें डिजिटल फार्म में रखेंगे, जिससे दुनियाभर के विद्वान उनका अध्ययन कर सकें.

कागज़ात के रखरखाव की जर्मन विशेषज्ञ इवा ब्रोजोवस्की कहती हैं, ''अफ्रीका के बौद्धिक इतिहास पर काम कर रहे विद्वानों के लिए टिम्बकटू की ये पांडुलिपियां हमेशा से प्रेरणास्रोत रही हैं.'' इवा ने अप्रैल में छह पिटारों की जांच की थी.

अफ़्रीकी इतिहास

इवा ने जिन दो हजार दस्तावेज़ों को देखा वे उत्तर-पश्चिम इस्लामिक अफ़्रीका और मध्य पूर्व से संबंधित हैं.

इनमें व्यापार और राजनयिक संबंधों के साथ-साथ कुरान पर टिप्पणियां, न्यायशास्त्र और अरबी भाषा के बारे में हैं.

माना जाता है कि इन पांडुलिपियों का कागज इटली के वेनिस में बना हुआ है और काफ़ी पुराना है.

इस वजह से ये दस्तावेज कमजोर हो गए हैं और टूट गए हैं. इनमें से कुछ की लिखावट भी धुंधली पड़ चुकी है.

हैदर का मानना है कि क़रीब 20 फ़ीसदी पांडुलिपियां बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं और बहुत नाज़ुक स्थिति में हैं. वहीं 20 फ़ीसदी पांडुलिपियों को कम नुक़सान हुआ है.

वह कहते हैं कि माली में हालात अभी भी अनिश्चित बने हुए हैं. ऐसे में पांडुलिपियों को बामको में ही रखना चाहिए. लेकिन उन्होंने यह नहीं सुना है कि इन पांडुलिपियों को देश के बाहर ले जाया जा रहा है.

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