कतर में तालिबान के दफ़्तर को लेकर विवाद जारी

  • 21 जून 2013

क़तर में तालिबान के हाल ही में खुले दफ़्तर के दर्जे को लेकर जारी विवाद से अफ़ग़ान शांति वार्ता शुरु करने की कोशिशों पर असर पड़ रहा है.

क़तर द्वारा फटकारे जाने के बाद तालिबान ने दफ़्तर के बाहर से एक नेमप्लेट और झंडा हटाया लेकिन बाद में एक छोटे डंडे पर फिर से सफ़ेद और काले रंग का झंडा लगा दिया गया.

अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अपने राजनयिकों को एक निर्देश भेजा है जिसे बीबीसी ने देखा है.

इस निर्देश के मुताबिक तालिबान अपने दफ़्तर को दूतावास का दर्जा दे रहा है जो कि अमरीकी सरकार के साथ हुए समझौते का उल्लंघन है. मंत्रालय का ये भी कहना है कि इस बारे में तुरंत कार्यवाई होनी चाहिए और दफ़्तर को बंद किया जाना चाहिए.

अमरीका शांति वार्ता की मध्यस्थ्ता कर रहा है.

विवाद

बुधवार को अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई को बताया था कि झंडा और ''इस्लामिक एमिरेट ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान'' वाली नेमप्लेट को हटा दिया जाएगा. लेकिन अफ़ग़ान अधिकारियों ने इन कदमों को अपर्याप्त कह कर ठुकरा दिया था.

लेकिन तालिबान के दफ़्तर को लेकर उठा विवाद इस ओर इशारा करता है कि इस बातचीत की प्रक्रिया में कितनी दिक्कतें आएंगी.

उधर संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की उप स्थाई प्रतिनिधि रोज़मेरी डिकार्लो ने अफ़ग़ान तालिबान के क़तर में अपने दफ़्तर का स्वरूप बदने की कोशिश पर अमरीका की चिंता को दोहराया है.

न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में अमरीकी प्रतिनिधि ने कहा कि दफ़्तर का खुलना एक अहम कदम था लेकिन तालिबान को अपने दफ़्तर को ग़लत ढंग से पेश नहीं करना चाहिए.

रोज़मेरी डिकार्लो ने कहा, "अफ़ग़ान शांति परिषद और तालिबान के आधिकारिक प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के उद्देश्य से पिछले साल जनवरी में राष्ट्रपति करज़ई और राष्ट्रपति ओबामा ने मिलकर क़तर की सरकार से वहां तालिबान के दफ़्तर की स्थापना की बात कही थी. इसलिए अमरीका भी अफ़ग़ान तालिबान के राजनीतिक दफ़्तर की स्थापना का समर्थन करता है. लेकिन जैसा कि हमने कल साफ़ किया था कि हम ''इस्लामिक एमिरेट ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान'' को मान्यता नहीं देते और हमें खुशी है कि क़तर की सरकार ने दफ़्तर के दरवाज़े से ग़लत नाम वाली नेमप्लेट हटवा दी है."

अफ़ग़ानिस्तान की नाराज़गी

क़तर में मौजूद बीबीसी संवाददाता अलीम मक़बूल कहते हैं कि तालिबान सार्वजनिक वैधता चाहता है और संगठन अपने दफ़्तर को एक बड़ी सफलता मानता है. वहीं अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को लगता है कि उसे बातचीत की प्रक्रिया में उसकी भूमिका के लिए पर्याप्त श्रेय नहीं मिला.

Image caption दोहा में अपने दफ़्तर को तालिबान एक बड़ी सफलता मानता है.

बुधवार को अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कहा था कि अगर ''विदेशी ताक़तों'' ने शांति प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी अफ़ग़ानिस्तान को नहीं सौंपी तो अफ़ग़ान वार्ताकार बातचीत का बहिष्कार कर देंगे.

करज़ई ने अगले साल नैटो सुरक्षाबल के अफ़ग़ानिस्तान से जाने के बाद वहां अमरीकी सेना की मौजूदगी के बारे में अमरीका के साथ सुरक्षा बातचीत को भी स्थगित कर दिया है.

गुरुवार को अफ़ग़ान विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य में कहा, "अगर दोहा में तालिबान का दफ़्तर अमरीकी सरकार द्वारा हमें दिए गए लिखित आश्वासनों के दायरे में वापस लाया जाता है, तो अफ़ग़ान सरकार अमरीका के साथ बातचीत के बारे में अपने फैसले पर फिर से विचार करेगी."

अमरीका और तालिबान प्रतिनिधियों के बीच पहली आधिकारिक बातचीत आने वाले दिनों में होने की उम्मीद थी लेकिन अभी ये साफ़ नहीं है कि इसमें अफ़ग़ान अधिकारियों की क्या भूमिका होगी.

नैटो की वापसी

साल 2011 में अमरीका और तालिबान के बीच क़तर में गुप्त मुलाक़ात हुई थी लेकिन खुले तौर पर बातचीत का ये पहला मौका होगा.

दोहा में तालिबान का दफ़्तर उसी दिन खुला जिस दिन नेटो ने अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सरकार को सौंपी.

विश्लेषकों का कहना है कि शांति वार्ता की संभावना को सच्चाई में बदलने के लिए ये ज़रूरी था. लेकिन तालिबान की लंबे समय से शर्त रही है कि वो विदेशी सुरक्षाबलों के पूरी तरह से अफ़ग़ानिस्तान से जाने के बाद ही बातचीत में शामिल होगा.

नेटो बल साल 2014 के आखिर तक अफ़ग़ानिस्तान से चली जाएंगे. लेकिन इसके बाद भी एक द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते के तहत वहां कुछ हज़ार अमरीकी सैनिकों की तैनाती की योजना है. इस समझौते के विभिन्न पहलुओं पर अभी दोंनो देशों के बीच सहमति होनी बाकी है.

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