बढ़ रहा है ऑनलाइन कुरान सीखने का चलन

  • 27 जून 2013

ब्रिटेन में रहने वाले बहुत से मुस्लिम माता-पिता अपने बच्चों की इस्लामिक शिक्षा के लिए ऑनलाइन माध्यमों का रुख़ कर रहे हैं.

मगर इसकी वजह से ये चिंता पैदा हो गई है कि स्काइप के ज़रिए कुरान पढ़ना सीखने वाले बच्चों को ब्रिटेन से बाहर मौजूद चरमपंथी गुट कट्टरवादी विचारधारा सिखा सकते हैं.

हालांकि अभी इसके कोई आधिकारिक आंकड़े तो मौजूद नहीं हैं कि ऑनलाइन के ज़रिए कितने लोग कुरान पढ़ रहे हैं.

लेकिन ये माना जा रहा है कि पांच से 16 साल की आयु वाले कम से कम सौ बच्चे ऑनलाइन माध्यम से इस्लामी शिक्षा हासिल कर रहे हैं.

परंपरागत तौर पर बच्चों को स्कूल के बाद मदरसा भेजा जाता रहा है, जहां वे अरबी लिखना-पढ़ना सीखते हैं. उसके बाद कुरान पढ़ना सीखते हैं.

ऑनलाइन कुरान की पढ़ाई

इसके लिए कई बार उन्हें मस्जिद और इस्लामिक केंद्रों से संबद्ध किया जाता है, कई बार घर पर ट्यूशन लगाकर इसकी शिक्षा दी जाती है.

मोटा-मोटा आकलन है कि ब्रिटेन में क़रीब ढाई लाख मुस्लिम बच्चे ऐसी दो हज़ार से ज़्यादा शैक्षणिक संस्थानों में अपनी पढ़ाई करते हैं.

आठ साल का हमज़ा हर साल अपने कमरे में कंप्यूटर के ज़रिए क़ुरान पढ़ना सीख रहा है. उसकी मां उसकी देखरेख करती हैं. उसने तीन साल पहले फैज़-ए-कुरान ऑनलाइन अकादमी के पाठ्यक्रम में नामांकन लिया था.

हमज़ा को हर सप्ताह आधे-आधे घंटे के तीन सेशनों में शामिल होना पड़ता है. उसे अकेले में ऑनलाइन शिक्षा देने वाले मौलवी लाहौर स्थित केंद्र से उसे तालीम देते हैं.

स्काइप के ज़रिए पढ़ाई तो होती है लेकिन इसमें कोई वीडियो नहीं होता. इसमें ऐसा सॉफ्टवेयर ज़रूर है जो कुरान के पन्नों को दिखाता है. हमज़ा उसे देखते हुए पढ़ता है, जब वह ग़लत उच्चारण करता है तो मौलवी उसे ठीक करते हैं.

हमज़ा के पिता फ़वाद राना के मुताबिक़ ये एक बेहतरीन सेवा है. यह परिवार बर्मिंघम के बाहरी इलाक़े में रहता है और नज़दीकी इस्लामी केंद्र इनके घर से कई मील दूर है.

बेहतर शिक्षा सेवा

Image caption ब्रिटिश मुसलमानों के कुरान पढ़ना सीखना चुनौती से कम नहीं

फ़वाद राना कहते हैं, “अगर हम उसे मदरसा ले जाते तो ट्रैफिक में दो घंटे लगते. जब वह वापस लौटता तो खाने का समय हो जाता. ऐसे में ये सेवा अच्छी है. पैसे भी ज़्यादा नहीं देने पड़ रहे हैं और हम उसकी उस समय देखरेख भी कर लेते हैं.”

फ़वाद राना ख़ुश हैं कि उनका पांच साल का बेटा मौलवी बन चुका है. वे अपने बेटे की प्रगति से बेहद ख़ुश हैं.

हमज़ा कुरान को अरबी में पढ़ चुका है.

सायमा बीबी शेफ़ील्ड में रहती हैं. उन्होंने अपनी दस साल की बेटी के लिए ऑनलाइन माध्यम को तरजीह दी है.

सायमा बीबी कहती हैं, “मैं अपनी बेटी को परंपरागत केंद्रों में नहीं भेजना चाहती थी. वहां बच्चों के साथ मारपीट के बारे में आपने सुना ही होगा. उसमें समय भी काफी लगता है. आपको बच्चे को स्कूल से घर लाना होता है और फिर उसे मदरसा लेकर जाना होता है. मैं कामकाजी हूं, ऐसे में मुझे लगता है कि घर में उसे शिक्षा देना कहीं ज़्यादा आसान है.”

आशंका भी कम नहीं

हालांकि एक आशंका ये भी है कि इस्लामी शिक्षा देने वाले सैकड़ों शिक्षक पाकिस्तान, सीरिया, मिस्र जैसी जगहों के हैं जो वैचारिक स्तर पर अपने शिष्यों को कट्टरपंथी बना सकते हैं.

ऐसे एक ऑनलाइन शिक्षा देने वाली सर्विस ‘इजी कुरान मेमोराइजिंग’ को प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन का सदस्य चलाता है. मियां शाहज़िब पाकिस्तान में जमात-उद-दावा के छात्र कार्यकर्ता थे.

Image caption ऑनलाइन इस्लामी शिक्षा कईयों पसंद आ रही है

हालांकि लाहौर से फ़ोन पर बात करते हुए उन्होंने इनकार किया कि वो अभी भी संगठन में सक्रिय हैं.

उन्होंने कहा, “मैं किसी चरमपंथ के बारे में बात नहीं करता, किसी संगठन के बारे में नहीं. मैं कुरान पढ़ाता हूं और कुछ भी नहीं. मैं एक सामान्य गुरू हूं.”

हालांकि शाहज़िब ने ये माना है कि जब वे युवा थे तो चरमपंथी संगठन के कार्यकर्ता थे, लेकिन अब उनका उस संगठन से कोई लेना देना नहीं है.

इमाम सलीम घीसा प्रेस्टन में इक़रा इस्लामिक सेंटर चलाते हैं. ये पूरी तरह एक आधुनिक मदरसा है, जहां बाक़ायदा कुर्सियां-मेजें, स्मार्ट बोर्ड के ज़रिए पढ़ाई होती है. कई मदरसों की तरह ये मदरसा भी परंपरागत शिक्षा को आधुनिक तरीक़े से देने की कोशिश कर रहा है.

सलीम घीसा कहते हैं, “ज्यादातर इस्लामिक शिक्षा के साथ दिक्क़त ये है कि उनका अलग-अलग लोग अलग-अलग मतलब निकालते हैं. चरमपंथियों के लिए उनका अलग मतलब होता है और कुरान की उसी आयत का एक आधुनिक शख्स के लिए अलग मतलब होता है और एक परंपरावादी के लिए अलग.”

बढ़ता कारोबार

पाकिस्तान के लाहौर में ऑनलाइन कोर्स कराने वाली एक और कंपनी फैज़-ए-क़ुरान की सेवाएं फ़वाद राना अपने बेटे के लिए लेते हैं. इसे सेना के पूर्व कर्नल चलाते हैं. इनके यहां 47 ब्रिटिश छात्र भी पढ़ते हैं. सुल्तान चौधरी का कहना है कि वो लगातार अपने स्टाफ़ पर नज़र रखते हैं.

सुल्तान चौधरी कहते हैं, “जो भी कुछ कहा जाता है, वो हमारे सर्वर के ज़रिए जाता है और उसे लगातार रिकॉर्ड किया जाता है. इसके अलावा वो सभी के सामने कुरान पढ़ाते हैं. हम माता-पिता को भी प्रेरित करते हैं कि वे अपने बच्चे की प्रगति में दिलचस्पी दिखाएं.”

ब्रिटेन के क़रीब 500 मस्जिदों और इमामों पर नज़र रखने वाली संस्था नेशनल एडवाइजरी बोर्ड(मीनाब) है. संस्था ब्रिटेन के क़रीब आधे मस्जिदों पर निगरानी रखती है.

इसके निदेशक मुस्तफा फ़ील्ड कहते हैं, “इस वक्त इस बात के बहुत कम सबूत हैं कि इन कोर्सों के ज़रिए चरमपंथ की शिक्षा मिलती है. हम बच्चों को शिक्षा के सभी पहलुओं से परिचित कराना चाहते हैं. ताकि वो उनमें सोच समझ पैदा हो. वो सवाल कर सकें कि जो वो पढ़ सुन रहे हैं वो सही है या ग़लत.”

कईयों को नापसंद

ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के बारे में लोग बाग एक दूसरे को जानकारी देते हैं. मसलन लैंकाशायर के लेलैंड में रहने वाले उस्मान हफ़ीज़ को ऐसे पाठ्यक्रम की जानकारी अमरीका में रहने वाले अपने एक संबंधी से मिली.

उनके घर के पास लेलैंड में कोई मदरसा नहीं है. इसलिए उन्होंने अपनी 10 साल से छोटी तीनों बेटियों का दाख़िला एक ऑनलाइन कोर्स में कराया था. लेकिन अब वो इससे बहुत दुखी हैं.

उस्मान हफ़ीज़ बताती हैं, “अंग्रेजी में दिक्क़त होती है. कभी-कभी जब वो अंग्रेजी बोलते हैं तो हमारे बच्चे समझ नहीं पाते. तो हमने इस कोर्स को बंद करने का फैसला किया.”

उनके बच्चे अब रोज़ 20 मील दूर प्रेस्टन में शाम की क्लासों में इस्लामी शिक्षा लेने जाते हैं.

अभी तक ये पता नहीं कि किसी ब्रिटिश युवा को इन ऑनलाइन सर्विसेज के ज़रिए चरमपंथ के रास्ते पर धकेला गया हो लेकिन फिर भी मुस्लिम समुदाय के बहुत के लोग इसे लेकर आशंकित हैं क्योंकि ये कभी भी हो सकता है.

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