अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान ला सकता है शांति: अफ़ग़ान जनरल

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का हमला

अफ़ग़ानिस्तान के सेना प्रमुख जनरल शेर मोहम्मद करीमी ने कहा है कि अगर पाकिस्तान तालिबान से कह दे तो उनके देश में लड़ाई एक हफ़्ते में रुक सकती है.

उन्होंने कहा कि तालिबान के नेताओं पर पाकिस्तान का नियंत्रण है और वह उन्हें अपने यहाँ शरण देता है लेकिन पाकिस्तान चरमपंथी गुटों पर नियंत्रण से इनकार करता रहा है.

तालिबान की 1994 में शुरुआत और 2001 में तालिबान के सत्ता से हटने तक पाकिस्तान उसका मुख्य समर्थक था.

पाकिस्तान में शरण

ख़बरों के मुताबिक तालिबान के अधिकांश नेता भागकर पाकिस्तान पहुँच गए हैं. यह संगठन बहुत हद तक अब भी पाकिस्तान के कुछ संगठनों के समर्थन पर निर्भर है.

बीबीसी के 'हार्ड टॉक' कार्यक्रम में जनरल करीमी ने कहा, ''तालिबान पाकिस्तान के नियंत्रण में है. उनका नेतृत्व पाकिस्तान में है.''

जनरल करीम ने कहा कि अगर अमरीका और पाकिस्तान चाह लें तो अफ़ग़ानिस्तान में शांति आ सकती है.

इस साल अप्रैल में लीक हुई नैटो की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान को इस बात की जानकारी थी कि तालिबान चरमपंथी उसकी सीमा में शरण ले रहे हैं.

'स्टेट ऑफ़ दि तालिबान' नाम की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ नसीरूद्दीन हक्कानी जैसे तालिबान नेता इस्लामाबाद में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के मुख्यालय के पास रह रहे थे.

यह रिपोर्ट 27 हज़ार गिरफ़्तार तालिबान, अल क़ायदा और विदेशी लड़ाकों और नागरिकों से पूछताछ के आधार पर तैयार हुई थी.

लेकिन पाकिस्तान बार-बार इस बात से इनकार करता रहा है कि तालिबान पर उसका प्रभाव है. उसका कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी प्रांत कुनार की सीमा पर चरमपंथियों के ठिकाने हैं और वे उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान में हमले करते रहते हैं.

चुनौती है खुली सीमा

दोनों देशों की लंबी और खुली हुई सीमा को सुरक्षित बनाए रखना अधिकारियों के लिए बड़ी चुनौती है.

Image caption अफ़ग़ानिस्तान का कहना है कि तालिबान के नेता पाकिस्तान में शरण लेते हैं

इस्लामाबाद में मौजूद बीबीसी संवाददाता रिचर्ड गैल्पिन का कहना है कि जनरल करीमी का यह बयान बहुत संवेदनशील समय पर आया है.

अमरीका तालिबान के साथ शांति वार्ता के लिए दबाव डाल रहा है और नैटो सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से हट रहे हैं. इस प्रक्रिया को अगले साल तक पूरा होना है.

तालिबान ने पिछले महीने कतर की राजधानी दोहा में अपना पहला विदेशी कार्यालय खोला है. इसे शांति वार्ता की दिशा में पहला क़दम माना जा रहा है.

अमरीका और अफ़ग़ानिस्तान चाहते हैं कि शांति कायम करने के लिए तालिबान अफ़गान सरकार में शामिल हो.

उनका कहना है कि शांति वार्ता तभी सफल होगी जब तालिबान अल क़ायदा से अपने सभी संबंध तोड़ ले, हिंसा का दौर खत्म हो और वह अफ़ग़ानिस्तान के संविधान को स्वीकार करे.

पाकिस्तान का हित

पाकिस्तान के अधिकारी पर्दे के पीछे होने वाली बातचीत में शामिल हैं. कहा जाता है कि पाकिस्तान एक दोस्ताना, शांतिपूर्ण और संप्रभु अफ़ग़ानिस्तान चाहता है लेकिन सच्चाई यह है कि वह चाहता है कि अफ़गानिस्तान से नैटो सुरक्षा बलों की वापसी के बाद उसके हितों का पूरा ध्यान रखा जाए.

दोहा में तालिबान का दफ़्तर खुलने के बाद अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने इस बात पर चिंता जताई थी कि यह प्रक्रिया अफ़ग़ानिस्तान के नेतृत्व में नहीं है. उन्होंने अफ़ग़ान अधिकारियों की तालिबान के साथ होने वाली बैठक रद्द कर दी थी.

तालिबान चरमपंथियों ने कहा था कि उनका अफ़ग़ानिस्तान की सरकार में विश्वास नहीं है. वे उसे अमरीका की कठपुतली मानते हैं.

तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक सहमति के लिए विदेशी सेनाओं को हटाने की मांग पर ज़ोर दे रहा है.

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