जिहादियों के लिए सूअर की चर्बी वाली गोलियां

pig ammo
Image caption जिहाग नाम जिहाद और हॉग (सूअर) को मिलकर बनाया गया है.

सूअर की चर्बी में लिपटी गोलियों ने भारत में ब्रितानी साम्राज्य के ख़िलाफ़ पहले विद्रोह को जन्म दिया था.

अब अमरीका के आईदाहो राज्य की एक छोटी सी कंपनी “जिहादी चरमपंथियों” को ख़त्म करने के लिए सूअर की चर्बी से रंगी गोलियां बेच रही है.

कंपनी के मालिक ब्रैंडन हिल का कहना है कि उनके मिशन का मूलमंत्र है “पीस थ्रू पोर्क” यानी सूअर के मांस के ज़रिए शांति. इन गोलियों का नाम रखा गया है 'जिहाग ऐमो'. इसमें जिहाग दो शब्दों जिहाद और हॉग (सूअर) को जोड़कर बना है.

बीबीसी से टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत में उन्होंने कहा, “जिहाग ऐमो से आप न केवल इस्लामी चरमपंथियों को मारते हैं, आप उन्हें नर्क में भी पहुंचाते हैं. जन्नत पहुंचने की चाह लेकर हमला करने वाले इन चरमपंथियों को ये बात सोचने के लिए मजबूर कर देगी.”

बढ़ती मांग

इन गोलियों की बिक्री शुरू हुए एक महीना भी नहीं हुआ है और मांग इतनी आ रही है कि ब्रैंडन उसे पूरी नहीं कर पा रहे हैं. उनका कहना है कि बिक्री इंटरनेट के ज़रिए तो हो ही रही है, अब छोटी दुकानें जिन्हें अमरीका में मॉम ऐंड पॉप स्टोर्स कहा जाता है, वे इसकी मांग कर रही हैं ताकि इन्हें ग्राहकों को सीधे ही बेच सकें.

कंपनी ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किए अपडेट में लिखा है, “मैं और मेरी पत्नी इस कंपनी की मालिक हैं. हम मिलकर जी जान से जुटे हैं कि मांग पूरी की जा सके. आप सबने इसमें साथ दिया इसका बहुत शुक्रिया और हमारी पूरी कोशिश होगी कि हम जल्द से जल्द इन ऑर्डरों को पूरा कर दें.”

उनका फ़ेसबुक पन्ना अब तक लगभग दस हज़ार लोगों ने लाइक किया है.

पति-पत्नी की ये टीम टीशर्ट और टोपियां भी बेच रही है जिन पर लिखा हुआ है, "72 हूरों की मदद करो—जिहाग ऐमो का इस्तेमाल करो.”

ब्रैंडन हिल का कहना है कि न्यूयॉर्क के ग्राउंड ज़ीरो पर मस्जिद बनाने की मांग सुनकर उन्हें बेहद ग़ुस्सा आया और तकलीफ़ हुई जिसके बाद उन्होंने इस योजना पर काम शुरू किया और एक साल तक रिसर्च के बाद वो इसे अमल में ला सके.

रक्षात्मक तरीका

Image caption अमरीका में मॉम ऐंड पॉप स्टोर्स में इन गोलियों की मांग बढ़ रही है.

वो कहते हैं “कोई हमें इस तरह से ज़लील करे, ये हम बर्दाश्त नहीं कर सकते."

ब्रैंडन हिल इस बात पर काफ़ी ज़ोर डालते हैं कि उन्हें मुसलमान या इस्लाम विरोधी नहीं समझा जाए.

उनका कहना है, “ये गोलियां उन लोगों के लिए हैं जिन्हें बेगुनाहों का गला काटना अच्छा लगता है. ये तो रक्षात्मक तरीका है शांति लाने के लिए.”

लंदन की सड़कों पर एक ब्रितानी सिपाही की हत्या की मिसाल देते हुए वो कहते हैं कि हत्यारा पुलिस के आने तक रूका रहा क्योंकि उसे लंदन पुलिस की गोलियों का कोई ख़ौफ़ नहीं था.

वो कहते हैं, “इन्हें डराकर रखने के लिए एक दीवार की ज़रूरत है और मेरे कारतूसों का हर डब्बा इस दीवार की ईंट बनेगा.”

बिक्री रोकने की अपील

इस्लाम के जाने माने जानकार अकबर अहमद का कहना है कि जो व्यक्ति ये कारतूस बना और बेच रहा है वो उसी सोच का हिस्सा है जिसके तहत पश्चिम में माना जाता है कि इस्लाम और अमरीका के बीच जंग छिड़ी हुई है और ये दो सभ्यताओं की लड़ाई है.

उनका कहना है “इस तरह के कदमों से आतंकवादी डरेंगे नहीं बल्कि उनका ग़ुस्सा और उत्साह और बढ़ेगा.”

अकबर अहमद कहते हैं कि सूअर के मांस को इस्लाम ही नहीं, यहूदी धर्म में भी हराम माना जाता है लेकिन उसकी एक ऐतिहासिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि है.

वो कहते हैं, “लेकिन भूख से मर रहे मुसलमान अगर सूअर का मांस खाते हैं या ग़लती से खा लेते हैं या फिर उन्हें जबरन खिलाया जाता है तो ऐसा नहीं है कि अल्लाह की अनुकंपा उन पर नहीं होगी.”

आईदाहो के कुछ गुटों ने अब वहां के गवर्नर से इन गोलियों की बिक्री रोकने की अपील की है.

लेकिन फ़िलहाल इनकी बिक्री आसमान छू रही है.

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