अरब क्रांति से मिले ये चार सबक़

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अरब क्रांति केवल एक छलावा थी क्योंकि जो क्रांति लोकतंत्र का सुखद संदेश लेकर आने वाली थी, वो असल में अव्यवस्था के अलावा कुछ न लेकर आई.

लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अरब या मुसलमान जगत सांप्रदायिक भावना में इस कद्र फंसा हुआ है कि वो लोकतंत्र लाने में समर्थ ही नहीं हैं.

इन दोनों ही दावों पर बहस तो बनती है.

ये तो साफ़ है कि साल 2011 के वो दिन अब भूले-बिसरे से लगते हैं जब अरब जनता सड़कों पर उतर आई थी और तीन तानाशाहों को सत्ता से निकाल बाहर किया था.

जिन लोगों ने उन दिनों इन विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया था, वो आज बेहद निराश हैं. उनकी ज़िंदगी बेहतर होने के बजाय बदतर हो गई है.

ऐसे में ये सवाल पूछना ज़रूरी है कि इस पूरी क्रांति से क्या सीख ली जाए.

1. क्रांति आसानी से या तुरंत नहीं आने वाली थी

Image caption अरब क्रांति से लोगों को जवाब इतने नहीं मिल पाए जितने कि नए सवाल खड़े हुए

पहली सीख तो ये कि अरब क्रांति एक प्रक्रिया थी, घटना नहीं.

जिन अरब शासकों और उन्हें शह देने वाले अमीरज़ादों से लोग छुटकारा पाना चाहते थे, वे पद छोड़ने के बाद मर तो नहीं जाते,

और फिर पश्चिमी देशों की भूमिका भी डांवाडोल सी थी.

पश्चिमी देशों ने लोकतंत्र की ओर मुहिम का साथ तो दिया, लेकिन उन्होंने पुराने शासकों को पूरी तरह से दरकिनार भी नहीं किया.

जिस समाज में लंबे समय तक तानाशाहों का राज रहा हो, वहां रातों-रात बदलाव आने वाला नहीं था.

ऐसे संघर्ष तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं

2. इस क्रांति का स्वरूप समान नहीं था

Image caption लीबिया में गद्दाफ़ी के जाने के बाद जश्न मनाया गया था

दूसरी सीख ये कि अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग परिणाम निकल कर आते हैं.

ट्यूनिशिया में सेना ने तानाशाह का साथ छोड़ दिया था और फिर राजनीतिक स्टेज से भी दूर हो गई थी.

उधर मिस्र में इसके विपरीत, विरोध प्रदर्शनों के बाद सेना ने दखल दिया और शासक को सत्ता से निकाल दिया.

लेकिन सत्ता हाथ में आने के बाद सेना ने इसका इस्तेमाल ठीक से नहीं किया. इस धारणा पर हमेशा से ही प्रश्नचिन्ह लगे रहे कि सेना लोकतंत्र को रास्ता दिखा सकती है या नहीं.

लीबिया में तो मामला बिल्कुल ही अलग था. वहां पश्चिमी देशों के दखल के बाद तानाशाह के नसीब का फ़ैसला हुआ.

सीरिया में अब तक पश्चिमी देश दखल देने से कतरा रहे हैं.

इससे ये साबित होता है कि इस क्रांति का स्वरूप एक-सा नहीं है और इसलिए इसका परिणाम भी एक-सा नहीं हो सकता.

3. दोराहे पर इस्लामी ताकतें

Image caption अलग-अलग देशों में इस क्रांति के अलग-अलग परिणाम देखने को मिले

तीसरी सीख ये कि पूरे क्षेत्र में इस्लामी ताकतों ने सत्ता का स्वाद चखा है, लेकिन उसका इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से किया है.

ट्यूनिशिया में उन्हें समझ आ गया था कि वे अकेले शासन नहीं चला सकते.

इसके विपरीत मिस्र में इस्लामी गुटों ने अपने विरोधियों के साथ छत्तीस का आंकड़ा रखने की ग़लती की.

उन्हें विरोधी पार्टी के हर कदम में साज़िश की बू आती थी और फिर सेना की ताकत को कम आंकने की ग़लती उन्हें बहुत भारी पड़ी.

इस्लामी गुट भले ही फिलहाल पीछे हट गए हों, लेकिन ये कहना ग़लत नहीं होगा कि बदले की आग अब भी उनके भीतर ज़िंदा है.

मिस्र, सीरिया और दूसरे इस्लामी देशों में कुछ लोगों को लग रहा होगा कि लोकतंत्र का कोई भविष्य नहीं है और हिंसा के ज़रिए ही इस्लामी राज्य स्थापित हो सकता है.

4. जनता की ताकत ही काफ़ी नहीं है

Image caption इस क्रांति में महिलाओं व पुरुषों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया.

आख़िरी बात ये कि अरब क्रांति ने जनाक्रोश की ताकत के साथ-साथ उसकी कमज़ोरियों को भी उजागर किया है.

सोशल मीडिया और सैटेलाइट टीवी के ज़रिए मिलने वाली ताकत का नमूना सबने देखा. लेकिन कोई भी देश दोषमुक्त नहीं होता.

अरब क्रांति ने क्षेत्रीय सत्ता का संतुलन भले ही न बिगाड़ा हो, लेकिन उसने लोगों की उम्मीदों को बेतहाशा बढ़ा दिया.

ये एक दिमागी क्रांति है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी सीख ये है कि लोगों की ताकत ही काफ़ी नहीं है.

बड़ी चुनौती ये है कि जनाक्रोश को असल और दूरदर्शी बदलाव में कैसे तबदील किया जाए.

अगर ऐसा नहीं हो पाता है, तो अरब क्रांति के वायदे पूरे नहीं हो पाएंगें.

(रॉजर हार्डी लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स और किंग्स कॉलेज में विज़िटिंग फ़ेलो हैं. उन्होंने 2010 में एक किताब भी लिखी, जिसका नाम है – 'द मुस्लिम रिवोल्ट: अ जर्नी थ्रू पॉलिटिकल इस्लाम'. लेख में प्रस्तुत किए गए विचार उनके निजी विचार हैं.)

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