अफ़्रीका में चीन के सामने धराशायी भारत

हाल के वर्षों में भारत और चीन के बीच अफ़्रीका नया रणक्षेत्र बनकर सामने आया है. एशिया के बाद अफ़्रीका दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला बाज़ार है और सभी की नज़र इस महाद्वीप पर है. साथ ही अफ़्रीका प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ है, इसलिए सभी देशों के एजेंडों में अफ़्रीका सबसे ऊपर है.

चीन और भारत भी अफ़्रीका के साथ व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कई जानकारों का मानना है कि चीन की आर्थिक शक्ति के सामने भारत धराशायी सा दिखता है.

चीन के पास अथाह धन है. चीन ने अफ्रीकी देश ज़ांबिया में तांबे की खान, गैबॉन में कच्चे लोहा के खनन और अंगोला में तेल साफ़ करने के संयंत्र आदि में निवेश किया है. इसके अलावा चीन ने अफ़्रीका में कई पुलों, भवनों, सड़कों और खेल स्टेडियमों का निर्माण किया है.

अमरीका को पीछे छोड़ते हुए चीन अफ़्रीका का नंबर एक व्यापारिक साझीदार बन गया है. अफ़्रीका के साथ चीन का व्यापार 200 अरब डॉलर के आसपास है. इसमें चीन की सरकार की मुख्य भूमिका रही है.

भरपूर संभावनाएं

अफ़्रीका के साथ भारत का व्यापार करीब 60 अरब डॉलर का ही है, हालांकि भारत की कोशिश इसमें और तेज़ी लाने की है.

रफ़्तार से बढ़ते दूसरे अफ़्रीकी देशों की तरह मोज़ांबिक की कहानी भी भिन्न नहीं है.

यहाँ की अर्थव्यवस्था करीब आठ प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ रही है. राजधानी मपूटो में पिछले कुछ सालों में दर्जनों नई इमारतें खड़ी हुई हैं. लेकिन देश की 70 प्रतिशत से ज़्यादा जनसंख्या अभी भी ग्रामीण इलाकों में खेती पर निर्भर है लेकिन मोज़ांबिक के मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ है और नौकरियों की कमी है.

मोज़ांबिक के लिए खुशखबरी ये है कि यहाँ कोयले की भरमार है और गैस के नए कुओं की खोज ने दुनिया का ध्यान इसकी ओर खींचा है.

विकास की दौड़ में शामिल मोज़ांबिक को आधारभूत सुविधाओं में नए निवेश की सख्त ज़रूरत है और चीन की मदद मोज़ांबिक के लिए महत्वपूर्ण है.

चीन ही चीन

मपूटो में हर जगह चीन का असर दिखता है. वहां भारतीय दूतावास के निकट ही चीन राष्ट्रपति भवन को नया रूप दे रहा है.

मपूटो की खाड़ी पर चीन पुल के निर्माण कार्य की तैयारी में है. मपूटो की सड़कें खुदी हुई हैं जहाँ चीन की कंपनियाँ नई जल पाइपलाइन पर काम कर रही हैं. इसके अलावा मोज़ांबिक में कोयले, तेल और गैस के भंडार पर चीन की नज़र है. इस दौ़ड़ में भारत कहाँ है?

मपूटो में एडिफिस टाइम स्क्वेयर पर स्थित अपने शानदार दफ़्तर में भारतीय कंपनी जिंदल की अफ़्रीकी शाखा जिंदल अफ़्रीका के प्रमुख मनोज गुप्ता चिंतित हैं.

2009 में मोज़ांबिक में काम शुरू करने वाली जिंदल अफ़्रीका यहाँ 20 करोड़ डॉलर का निवेश कर चुकी है. कंपनी के पास मोज़ांबिक के उत्तरी प्रांत टेट में कोयले की खान है.

झारखंड के ज़िले हज़ारीबाग के रहने वाले मनोज गुप्ता कहते हैं, “जहाँ भारतीय कंपनियाँ खतरों के आकलन पर ध्यान देती हैं, वहीं चीन की कंपनियाँ तुरंत निर्णय लेकर मैदान में कूद पड़ती हैं. चीन की कंपनियाँ बहुत ज़्यादा मुनाफ़े और नुकसान की परवाह नहीं करतीं. उनके सिर पर चीन सरकार का हाथ होता है.”

मोज़ांबिक अफ़्रीका के उन देशों में से है जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की दौड़ में भारत चीन से थोड़ा आगे है, लेकिन चीन की कंपनियाँ मोज़ांबिक में निर्माण कार्य में बढ़त बनाए हुए हैं.

चिंता

चीन के बढ़ते कदमों से भारतीय अधिकारी चिंतित हैं.

भारतीय आयात-निर्यात बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ़ कहा कि चीन ने भारत को बहुत पीछे छोड़ दिया है.

मपूटो के 100 साल से ज़्यादा पुराने केंद्रीय बाज़ार में हमारी मुलाकात गुलाम रसूल से हुई. इस बाज़ार में घरों में इस्तेमाल होने वाले सामान के अलावा सजावट की चीज़ें भी मिलती हैं.

गुलाम रसूल का परिवार 1876 में गुजरात के काठियावाड़ से मोज़ांबिक आया था.

वो कहते हैं, “चीन का सामान सस्ता है और अच्छी गुणवत्ता का भी है. स्पेन और ब्राज़ील की तरह भारत सरकार और व्यापार संगठनों को भी मोज़ांबिक में सिर्फ़ गैस और कोयले में ही नहीं, पर्यटन, होटल सहित दूसरे सेक्टरों में निवेश करना चाहिए.”

भारतीय कंपनियों की इस बात को लेकर आलोचना होती रही है कि उनकी नज़र सिर्फ़ मोज़ांबिक के गैस और कोयला भंडारों पर है.

गुलाम रसूल की दुकान के नज़दीक है कराची के मोहम्मद इक़बाल की सौंदर्य प्रसाधनों की दुकान.

वो कहते हैं, “पिछले दो-तीन सालों से काम अच्छा है. चीन के व्यापारियों ने हमारी बहुत मदद की है. पहले हम 100 किलोमीटर दूर दक्षिण अफ़्रीका जाकर माल खरीदते थे लेकिन चीन की कंपनियाँ हमें यहाँ आकर माल देती हैं, साथ में वो हमें कर्ज़ की सुविधा भी देती हैं.”

तो आखिर भारत क्या करे? मोज़ांबिक में भारतीय मूल के व्यापारी जेविन ओज़ा कहते हैं, “चीन के पास बहुत पैसा है. भारत चीन के साथ मुक़ाबला नहीं कर सकता. भारत उन सेक्टरों में निवेश करे जहाँ चीन नहीं आ रहा है तो शायद कुछ अच्छा हो.”

आलोचना

ऐसा नहीं है कि अफ़्रीकी देशों में चीन के आलोचकों की कमी है. चीन पर आरोप लगते है कि वो स्थानीय मज़दूरों की बजाए अपने मज़दूरों को चीन से लाता है.

साथ ही अफ़्रीका में काम करने वाली चीन की कंपनियाँ अपने कामकाज में गोपनीयता बरतती हैं. अफ़्रीका की अपनी यात्रा में मैंने चीन की कंपनियों और बैंकों के कई अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया.

अभी तक ये भी साफ़ नहीं है कि अफ्रीका में चीन ने कितना निवेश किया है. चीन के एक सरकारी अधिकारी के साथ काम करने वाली एक स्थानीय अफ़्रीकी महिला ने बातचीत में बताया कि चीन की ज़्यादातर निजी कंपनियों को अफ़्रीका में मिलने वाले कांट्रैक्ट चीन सरकार की मदद से मिलते हैं इसलिए मीडिया से बात करके कोई भी खतरा मोल नहीं लेना चाहता. हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है ये साफ़ नहीं है.

मपूटो में अर्थशास्त्री जोआकिम टोबियास दाई कहते हैं कि अफ़्रीकी देशों को सिर्फ़ चीन की निंदा नहीं करनी चाहिए बल्कि उससे फा़यदा उठाना चाहिए.

वो कहते हैं, “चीन अपने लोगों को दूसरे देशों में भेज रहा है. अगर अफ़्रीका में स्थानीय लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी तो उन्हें तकनीकी जानकारी कौन देगा? चीन के लोगों के वापस चले जाने के बाद स्थानीय लोगों का क्या होगा? चीन को अपने विकास के लिए कुकिंग कोल और लकड़ी आदि की ज़रूरत है जिसके कारण उसके लिए अफ़्रीका महत्वपूर्ण है.”

दाई के मुताबिक अफ़्रीकी देशों को चीन की ज़रूरतों को समझना होगा तभी वो चीन से निपट पाएंगे.

वो कहते हैं, “ये सच है कि चीन की अफ़्रीका नीति में गोपनीयता है और अफ़्रीका में ये चिंता का विषय है कि धन कहाँ खर्च हो रहा है. हमें पता है कि चीन की कंपनियाँ बेहद मज़बूत हैं और इसलिए वो अफ़्रीका की राष्ट्रीय संपदा का इस्तेमाल करने यहाँ आ रही हैं.”

लेकिन मोज़ांबिक के नेताओं और आम लोगों से बात करें तो वो भारत और चीन की कंपनियाँ के बीच स्पर्धा से खुश हैं.

मपूटो रेलवे स्टेशन के सामने मेरी मुलाकात फ़ातिमा से हुई.

वो कहती हैं, “हमारी अर्थव्यवस्था तेज़ी से फल-फूल रही है. भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा से मैं चिंतित नहीं हूँ. ये हमारे देश के लिए अच्छा है."

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