मिस्र: मुबारक के बाद कब क्या हुआ

  • 15 अगस्त 2013

साल 2011 के फरवरी महीने में होस्नी मुबारक के राष्ट्रपति का पद छोड़ने के बाद मिस्र में कई राजनीतिक गतिविधियां हुईं. साल 2012 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र का पहला स्वतंत्र राष्ट्रपति चुनाव जीता तो इसी साल जुलाई महीने में राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी को सेना ने उनके पद से डटा दिया.

आइए एक नज़र डालते हैं मिस्र में होस्नी मुबारक के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद कब क्या हुआ.

साल 2011, फरवरी – राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने पद छोड़ा और सेना की एक समिति को सत्ता सौंप दी.

साल 2011, मार्च – मिस्र में स्वतंत्र चुनाव कराए जाने के लिए संविधान के सुधार पर आम राय बनी.

साल 2011, अप्रैल – भ्रष्टाचार के संदेह में पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक और उनके बेटे, अला और गमल को गिरफ्तार किया गया.

साल 2011, अप्रैल से अगस्त – राजनीतिक प्रक्रिया की धीमी गति के विरोध में काहिरा के तहरीर चौक पर विरोध प्रदर्शन जारी रहे. इस्लामिक गुटों ने इनमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. सेना ने अगस्त में प्रदर्शनकारियों को तितर बितर कर दिया.

साल 2011, अगस्त – राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों की हत्या के आदेश देने के मामले पर काहिरा में सुनवाई शुरु हुई.

साल 2011, अक्तूबर – ईसाइयों और सुरक्षाकर्मियों के बीच हुई झड़पों में 24 लोगों की मौत हो गई. इसराइल ने 25 मिस्री नागरिकों को वापस मिस्र भेजा जिसके एवज़ में मिस्र ने एक अमरीकी-इसराइली नागरिक को इसराइल भेजा, जिस पर जासूसी का आरोप था.

साल 2011, नवंबर – काहिरा के तहरीर चौक में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुईं. प्रदर्शनकारियों ने सेना पर ‘सत्तामोही’ होने का आरोप लगाया. जवाब में राष्ट्रपति एसाम शर्राफ़ ने अपना पद छोड़ दिया.

साल 2011, दिसंबर – नए प्रधान मंत्री कमाल अल-गंज़ौरी के नेतृत्व में राष्ट्रीय एकता सरकार ने कार्यभार संभाला.

साल 2012, जनवरी – बराबरी पर खत्म हुए संसदीय चुनावों में इस्लामिक दलों की जीत.

साल 2012, मार्च – कॉप्टिक चर्च के पोप शेनॉडा त्रितीय की मृत्यु.

साल 2012, अप्रैल – सउदी अरब में मिस्र के एक वकील को हिरासत में लिए जाने पर सउदी अरब और मिस्र के रिश्तों पर संकट. सउदी अरब ने मिस्र को वित्तीय मदद रोकने की धमकी दी.

पहला स्वतंत्र राष्ट्रपति चुनाव

साल 2012, मई – मुस्लिम ब्रदरहुड के उम्मीदवार मोहम्मद मुर्सी को पहले दौर के मतदान में बढ़त मिली.

साल 2012, जून – मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मुहम्मद मुर्सी की राष्ट्रपति चुनाव में जीत.

अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति मुबारक को साल 2011 में प्रदर्शनकारियों की मौत के लिए ताउम्र क़ैद की सज़ा सुनाई.

साल 2012, नवंबर - बिशप टवादरोस को मिस्र के कॉप्टिक ईसाइयों का नया पोप चुना गया.

राष्ट्रपति मुर्सी ने एक आदेश जारी कर न्यायपालिका के उस अधिकार को ख़त्म कर दिया जिसके तहत न्यायपालिका राष्ट्रपति के फ़ैसलों को चुनौती दे सकती थी. लेकिन विरोध प्रदर्शनों के बाद मुर्सी को आदेश वापस लेना पड़ा.

साल 2012, दिसंबर- इस्लामी प्रभुत्व वाली संवैधानिक परिषद ने संविधान के मसौदे को मंज़ूरी दी जिसमें इस्लाम की भूमिका को महत्व दिया गया था. इस मसौदे में बोलने की आज़ादी और परिषद की महत्ता पर रोक लगाई गई थी.लोगों ने एक रायशुमारी में इसे माना लेकिन इसके बाद विपक्षी नेताओं ने ज़बर्दस्त प्रदर्शन किए. इसमें ईसाई समूहों और महिला संगठनों ने भी हिस्सा लिया.

सरकार का कामकाज ठप हो गया जिससे मुद्रा कमज़ोर हो गई और आईएमएफ ने 4.8 अरब डॉलर देने में देर लगाई.

साल 2013, जनवरी - हिंसक प्रदर्शनों में कम से कम 50 लोगों की मौत हो गई. सेनाध्यक्ष ने चेतावनी दी कि राजनीतिक तनाव के कारण देश टूटने के कगार पर पहुंच गया है.

साल 2013, मार्च - एक अदालत ने राष्ट्रपति मुर्सी की उस योजना पर रोक लगा दी जिसके तहत अप्रैल में संसदीय चुनाव होने थे. मुर्सी का मानना था कि चुनाव संबंधी क़ानून को संवैधानिक अदालतों तक नहीं लाया जा सका है इसलिए नए चुनाव होने चाहिए. इससे पहले मुख्य विपक्षी दल नेशनल साल्वेशन फ्रंट ने चुनाव के बहिष्कार की घोषणा कर दी थी.

साल 2013, जून - राष्ट्रपति मुर्सी ने 27 गवर्नरों में से 13 में इस्लामी सहयोगियों की नियुक्ति की. क्षेत्रीय नेताओं के रुप में. इसमें सबसे अधिक विवादित थी एक पूर्व इस्लामी हथियारबंद गुट के एक सदस्य की नियुक्ति क्योंकि उनका संबंध 1997 में लक्ज़र में पर्यटकों की हत्या से जोड़ा जा चुका था. इसके बाद फिर प्रदर्शन हुए और सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष भी हुए.

साल 2013, जुलाई - व्यापक प्रदर्शनों के बाद सेना ने मुर्सी को पद से हटा दिया. मुस्लिम ब्रदरहुड में मुर्सी के समर्थकों ने नए चुनावों के लिए दी गई समय-योजना को ख़ारिज कर दिया. यह योजना अंतरिम राष्ट्रपति एदली मंसूर की थी. मुस्लिम ब्रदरहुड के मुर्सी समर्थकों के अनुसार ये योजना अवैध थी और वो लगातार प्रदर्शन करते रहे. सेना के साथ झड़पें जारी

साल 2013, अगस्त- पूर्व राष्ट्रपति मुर्सी के समर्थकों ने काहिरा में कैंप बनाए और प्रदर्शन शुरु किए. सेना के साथ झड़पों में सैकड़ों समर्थकों की मौत. मुस्लिम ब्रदरहुड के अनुसार मरने वालों की संख्या 2200 के ऊपर. देश में आपातकाल की घोषणा और देश के कई शहरों में कर्फ़्यू लगा.

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