क्या पश्चिमी देश मिस्र में नाकाम हो गए हैं?

  • 23 अगस्त 2013
काहिरा प्रदर्शन

हालांकि मिस्र में आपातकाल लगा हुआ है लेकिन पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के समर्थकों का विरोध जारी है.

इन प्रदर्शनों ने सुरक्षा बलों की बुधवार की कार्रवाई के बाद फिर से ज़ोर पकड़ लिया है. इस कार्रवाई में 638 लोगों की मौत हो गई थी.

हुकूमत ने पुलिस को इस बात की इजाज़त दे रखी है कि वो आत्मरक्षा के लिए हथियारों का इस्तेमाल कर सकती है.

सेना ने तीन जुलाई को मोर्सी का तख़्तापलट कर दिया था. हालांकि अमरीका और दूसरे देशों ने इसे तख़्तापलट नहीं माना था.

अमरीका ने मिस्र के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास को रद्द कर दिया है लेकिन उसने मिस्र को दी जाने वाली आर्थिक सहायता पर रोक नहीं लगाई है.

बीबीसी ने कुछ विश्लेषकों से बात की और पूछा कि क्या पश्चिमी मुल्क मिस्र में जारी संकट को रोकने में असमर्थ रहे हैं.

डॉ. केटरिना डालाकुरा, लेक्चरर, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स

मेरा मानना है कि अमरीका और यूरोपीय संघ मिस्र के मामले में बेबस हैं.

अगर अमरीका मिस्र की सेना को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को बंद भी कर देता है तो वहां का संकट इतना गहरा है कि इसका अभी कोई ख़ास असर नहीं होगा. हालांकि लंबे समय में ये सेना के लिए परेशानी ज़रूर पैदा करेगा.

मिस्र पर किसी तरह का नीतिगत फैसला लेने के मामले में यूरोपीय संघ के पास तो साधन और भी सीमित हैं.

पिछले कुछ हफ्तों में ये बात साफ़ हो गई है कि मिस्र की हुकूमत ने इस्लामवादियों और ख़ास तौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थकों के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपनाने का फैसला लिया है.

इसकी वजह ये हो सकती है कि सेना बल प्रयोग के अलावा किसी और रास्ते से वाक़िफ़ नहीं है.

या फिर ये एक सोची समझी नीति हो सकती है और सेना को मालूम है कि हालांकि इसमें जाने जाएंगी लेकिन हिंसक बल प्रयोग के बाद इस्लामवादी इतने दबाव में आ जाएंगे कि फिर वो सेना का सामना करने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे.

हाल की घटनाओं की जिस तरह से निंदा हो रही है उससे मिस्र की हुकूमत को ये तो मालूम हो गया है कि दुनिया की नज़र उस पर है.

अमरीका का नैतिक रोष ढोंग लग सकता है लेकिन ये बात यहीं नहीं ख़त्म हो रही. बल्कि वाशिंगटन में ऐसे काफ़ी लोग है जो ये मानते हैं कि किसी तरह की राजनीतिक प्रक्रिया में इस्लामवादियों को ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए.

सरकारों के दरमियान पर्दे के पीछे किसी तरह की बातें हो सकती हैं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के हनन को लेकर ही कुछ बातें बार-बार कही जा रही हैं तो वे ख़ुद में बहुत अहम हैं.

पश्चिमी देश इससे अधिक और कुछ नहीं कर सकते हैं.

मोना अल-क़ज्ज़ाज़, प्रवक्ता, मुस्लिम ब्रदरहुड

मिस्र की नागरिक के तौर पर मुझे लगता है कि हमें अपने आंतरिक मामले ख़ुद सुलझाने चाहिए. हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए कि हम इसे ख़ुद से सुलझा लें.

मिस्र के नागरिक के तौर पर इस बात की ज़रूरत है कि हमारे पास इस तरह का लोकतांत्रिक मंच हो जहां हम अपनी दिक्क़तों का निपटारा कर सकें.

लेकिन सेना ने सत्ता हथिया ली है. इससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई है. साथ ही लगातार मानवधिकारों का हनन किया गया है.

इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप रहा है और बहुत कमज़ोर निंदा की है. हमने ऐसा नहीं सोचा था.

जैसे ही सत्तापलट हुआ अफ्रीकी संघ ने इसकी निंदा की लेकिन पश्चिम को इसे तख़्तापलट कहने में भी झिझक हो रही है.

आप फल को देखकर दरख़्त के बारे में बता सकते हैं और क़त्लेआम से तख़्तापलट का पता चलता है.

अलग-अलग देशों में मानवता के ख़िलाफ़ हुए अपराध को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय साथ खड़ा रहा है. मिस्र में जो कुछ हो रहा है वो अब मुस्लिम ब्रदरहुड का मामला नहीं है, बल्कि ये मानवाधिकार का मामला है. यहां मानवता के मूल्यों का हनन हो रहा है.

उन्हें हिंसा की निंदा करनी चाहिए, इस क़त्लेआम को रोकना चाहिए और जो लोग इन हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार हैं उन्हें दोषी ठहराया जाना चाहिए. निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के ज़रिये अपराधियों को इन घटनाओं के लिए जवाबदेह बनाया जाए.

हमने देखा है कि हिंसा घंटों जारी रही है लेकिन दुनिया खामोश तमाशबीन बनी रही है.

दूसरे दिन कुछ दुर्बल सी आवाज़ें उठीं. लेकिन ये पहला हमला नहीं है. सेना के सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद से इसी तरह के पांच हमले हुए हैं.

हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग करते हैं कि वो इस सरकार से किसी तरह का कोई तालुक्क न रखें. उन्हें प्रजातांत्रिक तरीक़े से स्थापित संस्थाओं के साथ बातचीत करनी चाहिए.

लेकिन पश्चिमी देश इस मामले में दोहरी नीति अपनाते हैं. इस मामले में उसका झुकाव एक पक्ष की तरफ़ है. पश्चिमी मुल्कों ने उन लोगों की अनदेखी कर दी है जो इन सबके विरोध में सड़कों पर हैं. उन्हें प्रजातांत्रिक मूल्यों के मामले में निष्पक्ष होना चाहिए.

डेविड बटर, चैटहम हाउस में एसोसिएट फ़ेलो

मिस्र के संकट पर पश्चिम की प्रतिक्रिया को फ़ाइनेंशियल टाइम्स के एक स्तंभकार, “गिडिओन रशमैन” ने “असंगत बड़बड़ाहट” कहा है.

एक उलझी हुई और तेजी से बदलती परिस्थिति में अमरीका और यूरोप की सरकारों की भूमिका पर यह एक कड़ी लेकिन सही टिप्पणी है.

अमरीकी और यूरोपीय राजनयिक दिन-रात मेहनत कर रहे थे कि उस हिंसा को और न भड़कने दिया जाए जो 14 अगस्त को मुस्लिम ब्रदरहुड के शिविरों में सशस्त्र पुलिस और सेना को भेजे जाने के फ़ैसले के बाद शुरू हुई थी.

लेकिन उनकी यह कोशिशें बेकार ही साबित हुई क्योंकि नए सैन्य शासकों को समझ आ गया था कि पश्चिमी देश उन पर सही ढंग से दबाव बनाने में नाकाम हैं.

इसका प्रमाण मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति पद से हटाने के साथ ही 8 जुलाई और 27 जुलाई को प्रदर्शनकारियों की सामूहिक हत्या के बाद हुई कमज़ोर प्रतिक्रिया से मिला.

अमरीका ने सीधे सैन्य सहायता बंद क्यों नहीं कर दी? 80.14 अरब रुपये की सैन्य सामग्री की कई साल तक बिक्री से प्रभावशाली अमरीकी हथियार निर्माताओं के हित जुड़े हुए हैं.

इसराइल संतुलन बनाए रखते हुए सिनाई क्षेत्र से पैदा ख़तरे से निपटने के लिए अमरीकी सामान से लैस मिस्र की सेना के साथ मिलकर काम करना पसंद करता है.

सऊदी अरब अमरीकी हथियारों का बड़ा ख़रीददार है. वह तब भौंचक्का रह गया था जब अमरीका ने हुस्नी मुबारक की सरकार को गिर जाने और मुस्लिम ब्रदरहुड को सत्ता में आने दिया था.

यूरोपीय संघ हथियारों पर प्रतिबंध लगा सकता है और आर्थिक सहायता को निलंबित कर सकता है लेकिन उसकी हथियार कंपनियों के हाथ से व्यापार निकल जाएगा. और यूरोपीय यूनियन की इसमें कोई रुचि नहीं होगी कि वह अपने दक्षिणी किनारे पर और गरीबी बढ़ाए.

ऐसा नहीं कि इन वजहों से अमरीका और यूरोपीय यूनियन कोई कदम उठा ही नहीं सकते लेकिन इनकी वजह से एक राजनीतिक रुकावट तो पैदा होती ही है.

पश्चिमी देश मिस्र के शासकों को यह समझाने की कोशिशें जारी रख सकते हैं कि राजनीतिक समाधान सीरिया के लिए सबसे अच्छा है. अगर यह हाथ मरोड़ने की हास्यास्पद कोशिश साबित होता है तो फिर बहुत ज़्यादा व्यवहारिक विकल्प नहीं हैं.

विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय (एफ़सीओ) के प्रवक्ता

पिछले कुछ महीनों से इस गतिरोध का एक शांतिपूर्ण समाधान ढूंढने के लिए ब्रिटेन गंभीर कूटनीतिक प्रयास कर रहा है. हमने सभी पक्षों से गहन बातचीत की है.

विदेश मंत्री एलेस्टेयर बर्ट ने 24 जुलाई को मिस्र का दौरा किया था और अंतरिम सरकार के साथ ही मुस्लिम ब्रदरहुड से भी बात की थी.

रक्षा सचिव फ़िलिप हेमंड ने भी जनरल अल-सीसी से 13 अगस्त को बात की थी और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई रोकने के लिए जोर दिया था.

हमारे साथ ही अंतरराष्ट्रीय जगत की कोशिशों ने समझौते का माहौल बनाने में मदद की है. कल हमने मिस्र के राजदूत को बुलाकर मिस्र में बढ़ रही हिंसा पर गहरी चिंता ज़ाहिर की है.

एफ़सीओ के राजनीतिक निदेशक साइमन गास ने प्रदर्शनकारियों पर बलप्रयोग की निंदा की है और मिस्र के प्रशासकों को सब्र से काम लेने को कहा है.

मिस्र में हमारे राजदूत ने यह संदेश मिस्र के गृह मंत्री और उप रक्षा सचिव को दिए हैं.

लक्ष्य यही है कि लोकतांत्रिक मिस्र का निर्माण हो जो आर्थिक पुनर्जीवन की राह पर मजबूती से आगे बढ़े.

मिस्र को ब्रिटेन का सहयोग दरअसल मिस्र के लोगों के लिए कई संस्थाओं के माध्यम से किया जाता है. मिस्र को सारी मदद और द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की जा रही है.

यह एक मुश्किल और बदलती परिस्थिति है और हम इस बारे में चिंतित हैं. हमने सभी से इस पर गंभीर चर्चा की है.

यूरोपीय यूनियन, अमरीका, कतर और संयुक्त अरब अमीरात की मध्यस्थता टीम ने समझौते के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए हैं.

हालांकि यह निराशाजनक है कि अभी तक किसी समझौते पर पहुंचा नहीं जा सका है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि सभी पक्ष फिर से कोशिशें करें.

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