पाकिस्तान में पहचान का संकट

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Image caption पाकिस्तान में गोद लेने की परंपरा नहीं है.

पाकिस्तान में हज़ारों लोग ऐसे हैं जिन्हें पहचान के अधिकार से वंचित रखा गया है.

कई अनाथ बच्चे भी कानूनी दांव-पेंचों में फंसे होने के कारण अपने भविष्य की अनिश्चितता को लेकर डरे हुए हैं.

पाकिस्तान की एक कल्याणकारी संस्था 'ईदी फाउंडेशन' के गैराज में काम करने वाले रफीउल्लाह की ज़िंदगी को जैसे ब्रेक लग गए हैं.

18 साल के रफीउल्लाह गैराज की चारदीवारी को अपने लिए सबसे सुरक्षित जगह समझते हैं. अपनी सुबह और शाम गैराज में ही गुजारते हैं और बाहर निकलने से घबराते हैं.

रफीउल्लाह के पास पहचान पत्र नहीं है. वे कहते हैं, "पहचानपत्र के बिना बंदा यहां कहीं काम नहीं कर सकता. इसके बिना कोई बंदे का भरोसा नहीं करता. मैं ईदी में बचपन से ही काम करता हूं."

रफीउल्लाह अकेले नहीं हैं. ऐसे कई लोग हैं जिन्हें अभी तक पहचान नहीं मिली है.

अनाथ बच्चों को पहचान पत्र नहीं

पिछले दिनों पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को पहचान और विरासत का हक़ दिया लेकिन अभी तक कई और लोग पहचान पाने के इंतज़ार में हैं.

पाकिस्तान की किसी भी संस्था में नौकरी पाने, शैक्षणिक संस्था में दाखिला लेने या पासपोर्ट बनवाने के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र ज़रूरी होता है.

पहचान पत्र ही इस बात की पुष्टि करता है कि ये शख्स पाकिस्तान का नागरिक है.

पाकिस्तान में पहचान पत्र हासिल करने के लिए माता-पिता में से किसी एक का पहचान पत्र होना जरूरी है.

लावारिस या अनाथ बच्चों के पास माता-पिता का पहचान पत्र नहीं होता.

इसीलिए कल्याणकारी संस्थाओं में पल रहे बच्चे दुनिया और समाज से कट जाते हैं.

अपने देश में ही अजनबी

Image caption अनाथ बच्चों को पहचान मिले इसके लिए कल्याणकारी संस्थाएं प्रयास में लगी हैं.

सरकारी पहचान से वंचित बच्चों को पहचान यानि शिनाख्त दिलाने के लिए 'ईदी फाउंडेशन' ने कई संबंधित विभागों से संपर्क किया. और सरकार को नया कानून बनाने की सलाह दी.

ईदी फाउंडेशन के कर्मचारी अनवर काज़ी कहते हैं कि उनके पास आने वाले लावारिस और यतीम बच्चों का पूरा रिकार्ड मौजूद है. बस बच्चों के माता पिता की पहचान नहीं है.

काजी बताते हैं, "18 साल से बड़ी उम्र के कई बच्चे हमारे पास काम कर रहे हैं. फिलहाल उन्हें पहचान पत्र नहीं चाहिए लेकिन अगर वे बाहर काम करना चाहें तो शिनाख्त कार्ड की जरूरत है. ऊंची तालीम हासिल करना चाहें तो शिनाख्त कार्ड की ज़रूरत है. अब हालात ऐसे हैं कि रास्ते में हर जगह पुलिस को शिनाख्त कार्ड पेश करने की ज़रूरत पड़ती है. अगर ऐसा नहीं कर पा रहे तो फिर वे एक मुजरिम बन सकते हैं."

अपने देश में अजनबी बने बच्चों की पहचान का मामला पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया गया. अदालत ने इस्लामी मामलों से जुड़ी परिषद से राय मांगी.

परिषद ने पहचान पत्र में अभिभावक का नाम शामिल करने का प्रस्ताव दिया.

गोद लेने की परंपरा नहीं

अगर कोई नागरिक बच्चा गोद लेकर उसे अपना नाम देना चाहे तो ये मुमकिन नहीं.

बच्चों के अधिकार के लिए काम करने वाले जिया अहवान कहते हैं, "गोद लेने के लिए संसद में खुल कर बहस होनी चाहिए. आमतौर पर इसे यह कह कर खारिज कर दिया जाता है कि मुसलमानों में गोद लेने की परंपरा नहीं है, और चूंकि उनको विरासत नहीं मिल सकती, जायदाद में हिस्सा नहीं मिल सकता. तो इसलिए मुसलमानों में गोद लेने की परंपरा नहीं है. लेकिन व्यवहारिक स्तर पर ऐसा नहीं है."

यहां लावारिस बच्चों को या तो झूलों में छोड़ दिया जाता है, या सड़कों पर फेंक दिया जाता है. कल्याणकारी संस्थाएं इनका पालन पोषण करती हैं.

संस्थाओं के पास इन बच्चों का रिकॉर्ड मौजूद है. ये रिकार्ड किसी हद तक सरकार की औपचारिकताएं पूरी कर सकता है.

सड़कों पर ज़िंदगी गुजारने वाले हज़ारों बच्चे ज़मीन पर तो मौजूद हैं लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इनका कोई अस्तित्व नहीं है.

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