पाकिस्तानी मदरसे के कर्मचारियों की नाराज़गी

  • 27 अगस्त 2013
Image caption मदरसा के प्रिंसिपल कारी मोहम्मद इब्राहिम का कहना है कि हमारे पास कक्षाओं के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, तो हम आतंवादी प्रशिक्षण केंद्र कहाँ से चलाएँगे.

पाकिस्तान के पेशावर स्थित एक मदरसे पर अल-क़ायदा और तालिबान को समर्थन देने का आरोप लगाते हुए अमरीका ने इस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं.

हाल ही में वहाँ का जायज़ा लेकर लौटे बीबीसी संवाददाता मोहम्मद इलियास ख़ान के मुताबिक़, "मदरसे की स्थिति को देखकर इसका किसी भी संदेहास्पद गतिविधि में शामिल होने का अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है."

बीबीसी संवाददाता के मुताबिक़ 500 वर्ग गज़ में बना यह मदरसा एक तीन मंज़िला इमारत में चलता है, तंग गली में बसे इस मदरसे में परेड और शूटिंग रेंज के लिए कोई खुली जगह भी नहीं है.

घुमावदार और कभी ना ख़त्म होने वाली तंग गलियों में वाहनों का पहुँचना भी बहुत मुश्किल है.

इलियास ख़ान के मुताबिक़ पेशावर के उत्तर पश्चिमी शहर के पूर्वी बाहरी इलाक़े में स्थित यह धार्मिक मदरसा कहीं से भी 'आतंकवादी' प्रशिक्षण केंद्र नहीं लगता है.

मंगलवार को अमरीका ने कहा था कि इस मदरसे में छात्रों को धार्मिक पढ़ाई की जगह 'आतंकवादी' और विद्रोही गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

'ज्ञान का अपमान'

लेकिन मदरसे के अधिकारी अमरीका के इस आरोप को पूरी तरह नकार रहे हैं.

मदरसा के प्रिंसिपल क़ारी मोहम्मद इब्राहिम का कहना है, ''हमारे दरवाज़े खुले हैं हम कुछ भी छिपकर नहीं करते, आप ख़ुद ही देख लो, और हम अमरीकियों को भी यहाँ आने का न्योता दे रहे हैं. हमारे पास कक्षाओं के लिए पर्याप्त जगह नहीं है, तो हम आतंवादी प्रशिक्षण केंद्र कहाँ से चलाएँगे."

इस संकीर्ण मदरसे के निचले तल पर एक मस्जिद है और हाथ-पाँव धोने और नेमाज़ के लिए स्थान बना हुआ है. पहली मंज़िल अपनी चार दीवारों की लंबाई के बराबर एक लकड़ी की अलमारी और एक लंबा हाल बना हुआ है.

हॉल के पूर्वी भाग के एक कोने में, गद्दे, तकिए और कंबल एक दीवार से सटे हुए रखे हैं. दिन के समय इस हाल में कक्षा चलती है, जबकि रात में यह हॉल छात्रावास का कम करता है.

इमारत की सबसे ऊपरी मंज़िल पर उच्च कक्षाओं के लिए चार कमरे बने हुए हैं. मदरसा अधिकारियों के अनुसार यहाँ पढ़ने वाले 120 में से 40 छात्र यहाँ के स्थानीय निवासी हैं. इनमें से ज्यादातर की उम्र 10 से 18 साल के बीच है.

Image caption यहाँ पढ़ने वाले 120 में से 40 छात्र यहाँ के स्थानीय निवासी हैं. इनमें से ज्यादातर की उम्र 10 से 18 साल के बीच है.

मदरसे के संस्थापक 83 वर्षीय आलम शेर कहते हैं, "यह धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाला संस्थान है, और इसे आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र बताना यहाँ पढ़ने वाले लोगों का अपमान करने जैसा है.''

'पहले भी रहा है सुर्ख़ियों में'

ऐसी अटकलें हैं कि पेशावर में सलफ़ी मुसलमानों का मुख्य केंद्र होने की वजह से अमरीका ने इस मदरसे पर प्रतिबंध लगाए हैं. अन्य संप्रदायों की अपेक्षा यह संप्रदाय जिहाद या युद्ध को अपनी विचारधारा में शामिल कर ज़्यादा कट्टरपंथी है.

पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के बाद सलफी समूह भारत में कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर सबसे प्रभावित संगठन के तौर पर उभरा है.

इस मदरसे ने 2009 में पहली बार उस समय सुर्ख़िया बटोरी, जब इसके तीन मुख्य मौलवियों में से एक शेख़ अमीनुल्लाह पेशावरी को संयुक्त राष्ट्र संघ और अमरीका दोनों ने ही अल-क़ायदा और तालिबान समर्थित सामग्री को बढ़ावा देने के लिए आरोप लगाया.

अमीनुल्लाह के बारे में पूछे जाने पर मदरसे के छात्र और अध्यापक दोनों ही कोई जवाब न देते हुए चुप्पी साधे हुए हैं.

Image caption मदरसे के संस्थापक हाजी आलम शेर किसी भी तरह की आतंकी गतिविधियों में शामिल होने से साफ इंकार करते हैं

'प्रभावशाली सलफी'

आलम शेर के मुताबिक़ पेशावरी आठ महीने पहले ही इस्तीफ़ा देकर यहाँ से जा चुके हैं, लेकिन कई दूसरे लोगों का मानना है कि वह यहीं आसपास रह रहे हैं.

हमारे संवाददाता के यह पूछने पर कि पेशावरी ने कितने समय तक इस मदरसे में अपनी सेवाएँ दीं? आलम शेर अनिच्छा से जवाब देते हैं, ''यह तो सिर्फ़ अल्लाह ही बता सकते है, मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.''

लेकिन एक अन्य अधिकारी के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान के उत्तर पूर्वी प्रांत कुनार के मूल निवासी पेशावरी 1980 में बने इस मदरसे के सह-संस्थापक रहे हैं, 40 वर्ष की उम्र में वह सलफी सोच वाले अफ़ग़ान मुजीहिद्दीन के सदस्य बन गए.

सलफी विचारक होने के बावजूद वह सलफी संप्रदाय के साथ धार्मिक मतभेद वाले और तालिबान के क़रीबी माने जाने वाले इस्लाम के देवबंदी संप्रदाय के क़रीबी भी माने जाते हैं. अमरीका ने भी उन्हें तालिबान समर्थित विद्यालयों को दान देने और दिशा-निर्देश देने का दोषी पाया था.

अपना नाम सार्वजनिक न किए जाने की शर्त पर इस अधिकारी ने कहा, '' पिछले महीने ही पेशावरी सऊदी अरब से लौटे हैं और नौ अगस्त को ईद के मौक़े पर उन्होंने रावलपिंडी की एक मस्जिद में उपदेश भी दिए.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)

संबंधित समाचार