सीरिया पर और कसा शिकंजा, ब्रिटेन ने तैयार किया खाका

सीरिया के विद्रोही

ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पेश करेगा जिसमें सीरिया में 'नागरिकों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने' की बात कही गई है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने ट्विटर पर लिखा है कि ये प्रस्ताव सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों की बैठक में रखा जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा है कि सुरक्षा परिषद को कार्रवाई लेनी चाहिए.

पिछले हफ्ते कथित रासायनिक हमले के बाद सीरिया का संकट और गहरा गया है.

अमरीका और उसके सहयोगी देश सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं जबकि कुछ देश इसका विरोध कर रहे हैं.

आइए जानते हैं कि इस मुद्दे पर मध्य पूर्व क्षेत्र और दुनिया के अन्य देशों की क्या राय है.

सीरिया के पड़ोसी

तुर्की

तुर्की की सरकार सीरिया में मार्च 2011 में बगावत शुरू होने के बाद से ही राष्ट्रपति बशर-अल-असद की मुखर आलोचक रही है.

तुर्की के विदेश मंत्री अहमत दावतोगुलू ने सोमवार को तुर्की के अख़बार 'मिल्लियत' से कहा था कि वे सीरिया के खिलाफ़ किसी अंतरराष्ट्रीयकार्रवाई में शामिल होने के लिए तैयार हैं, भले ही इस बारे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कोई समझौता न हो.

सउदी अरब और खाड़ी क्षेत्र

बताया जाता है कि खाड़ी क्षेत्र के शासक राष्ट्रपति असद के खिलाफ लड़ रहे विद्रोहियों को वित्तीय मदद और हथियार मुहैया कराने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

सऊदी अरब वर्षों से सीरियाई सरकार के साथ तनातनी रही है. इसीलिए वो असद के खिलाफ कार्रवाई के लिए खास तौर से जोर डाल रहा है.

अमरीका में सऊदी अरब के पूर्व राजदूत प्रिंस बांदार बिन सुल्तान हाल के दिनों में विद्रोहियों के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा रहे थे.

इसराइल

शुरुआत में इस विवाद में शामिल होने से बचने के बाद भी इसराइल ने इस साल सीरिया में तीन ठिकानों पर हमले किए. कहा जा रहा है कि उसने ऐसा लेबनानी संगठन हिजबुल्लाह तक हथियारों की खेप पहुँचने से रोकने के लिए किया.

सीरिया की तरफ से हुई गोलाबारी में इसराइल के कब्जे वाले गोलान हाइट्स इलाके में भी नुक़सान हुआ है. इसके जवाब में इसराइल ने भी कार्रवाई की.

इसराइली अधिकारियों ने सीरियाई सुरक्षा बलों द्वारा कथित रासायनिक हथियारों के प्रयोग की निंदा की है. उन्होंने सीरिया पर सैन्य कार्रवाई के समर्थन का भी संकेत दिया है.

इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने रविवार को कहा था, ''हमारी उंगलियां निश्चित रूप से हमेशा नब्ज़ पर होनी चाहिए, हमारी उंगलियां ज़िम्मेदार हैं. और अगर जरूरी हो तो उन्हें ट्रिगर पर भी होना चाहिए.''

हालांकि इसराइली अधिकारियों को यह पता होगा कि सीरिया के खिलाफ पश्चिमी देशों की कोई भी कार्रवाई 1991 में हुए पहले खाड़ी युद्ध जैसे हालात पैदा कर सकती है, जब इराक़ ने तेल अवीव पर स्कड मिसाइलें दाग दी थीं.

उसका मक़सद इसराइल को इस विवाद में घसीटना था ताकि इस युद्ध से अरब देश पीछे हट सकें.

खबरों में कहा गया है कि सैन्य कार्रवाई की आशंका को देखते हुए इसराइल में गैस मास्क की बिक्री बढ़ गई है.

लेबनान

लेबनान के विदेश मंत्री अदाना मंसूर ने सोमवार को लेबनानी रेडियो से कहा कि वो सीरिया पर हमले के विचार का समर्थन नहीं करेंगे. उन्होंने कहा, ''मुझे नहीं लगता कि हमला इस इलाके में शांति, स्थायित्व और सुरक्षा लाएगा.''

इस महीने हुए दो बम धमाकों में लेबनान में करीब 60 लोग मारे गए थे. इन धमाकों को सीरिया विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है.

लेबनान के शिया चरमपंथी संगठन हिजबुल्लाह ने सीरिया में सरकार की ओर से लड़ाई में भाग लिया. ऐसे भी खबरें हैं कि वहाँ के कुछ सुन्नी संगठन विद्रोहियों की ओर से लड़ रहे हैं.

इसके अलावा सीरियाई शरणार्थी किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे अधिक लेबनान में ही हैं.

ईरान

सीरिया में संकट शुरू होने से बहुत पहले से ईरान इस क्षेत्र में ईरान राष्ट्रपति असद का मुख्य समर्थक रहा है. इसीलिए वो वहां किसी के तरह के सैन्य हस्तक्षेप का आलोचक है.

संयुक्त राष्ट्र के उच्च अधिकारी के तेहरान दौरे पर मंगलवार को ईरान ने कहा था कि सीरिया में किसी भी सैन्य कार्रवाई के गंभीर परिणाम होंगे.

समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्बास अराकची ने एक बार फिर इन दावों को दोहराया कि रासायनिक हथियारों का प्रयोग विद्रोहियों ने किया था.

इलाके से बाहर के देश

अमरीका

रासायनिक हमले की खबरों पर शुरू में सधी हुई प्रतिक्रिया देने के बाद हाल के दिनों में इसे लेकर अमरीकी बयानबाजी में कठोरता आई है.

विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सीरियाई सरकार ने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया और यह नैतिक बेशर्मी है.

हाल के दिनों में अमरीका ने पूर्वी भूमध्यीय सागर में नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा दी थी, जिसे हमले की तैयारी के तौर पर देखा गया. विश्लेषकों का मानना है कि अमरीका क्रूज मिसाइलों से सीरिया के सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बना सकता है.

ब्रिटेन

प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के कार्यालय ने कहा है कि ब्रिटेन सैन्य कार्रवाई की आपात योजना बना रहा है. प्रधानमंत्री कार्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि कोई भी कार्रवाई 'उचित', कानूनी और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के सहमित के मुताबिक़ ही होगी.

विदेश मंत्री विलियम हेग ने सोमवार को बीबीसी से कहा था कि सीरिया पर कूटनीतिक दबाव विफल हो गया है और ब्रिटेन, अमरीका और फ्रांस सहित कई अन्य देश इस बात पर सहमत हैं कि 21वीं सदी में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल के विचार को इजाज़त नहीं दी जा सकती.

फ्रांस

दमिश्क के पास रासायनिक हमले की ख़बर आने के अगले ही दिन फ्रांस के विदेश मंत्री लौरें फैबियस कहा कि अगर रासायनिक हमले की बात प्रमाणित हो जाती है तो सैन्य कार्रवाई होनी चाहिए.

उन्होंने सुझाव दिया था कि कुछ ख़ास परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को नजरअंदाज भी किया जा सकता है.

फ्रांस पश्चिम के उन प्रमुख आक्रामक देशों में से था जिसने सबसे पहले सीरिया के विद्रोहियों को देश वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी थी.

मई में फ्रांस ने ब्रिटेन के साथ मिलकर विद्रोहियों को हथियारों की आपूर्ति पर लगी यूरोपीय संघ की रोक को हटवाने के लिए पैरवी की थी.

रूस

रूस बशर अल असद के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समर्थकों में से एक है. रूस ने सीरियाई संकट के राजनीतिक समाधान पर जोर दिया है.

उसने सीरिया पर पश्चिमी देशों के हमले की संभावना की आलोचना की थी.

उसने कहा है कि अगर सुरक्षा परिषद की अनदेखी करके सीरिया में कोई कार्रवाई की गई तो इसके मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के देशों के लिए विनाशकारी परिणाम होंगे.

चीन

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आए सीरिया विरोधी कड़े प्रस्ताव का चीन ने रूस के साथ मिल कर रास्ता रोका.

उनसे सीरिया पर किसी भी तरह के हमलों की संभावना की भी आलोचना की है.

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कहा है कि रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किसने किया, इस बारे में संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों की जांच पूरे हुए बिना ही पश्चिमी देश जल्दबाजी में नतीजा निकाल रहे हैं.

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