अमरीका ने जर्मनी की फ़सलें बर्बाद कीं?

पोटैटो बीटल्स
Image caption कई देशों ने इस तरह की योजना बनाई थी.

23 मई, 1950 को पूर्वी जर्मनी के एक गांव में मैक्सट्रोजर नाम के एक किसान ने देखा कि दो अमरीकी हवाई जहाज़ उसके खेतों पर उड़ान भर रहे हैं.

दूसरे दिन जर्मनी सरकार ने बयान जारी किया कि अमरीका ने जर्मनी की खेतों पर कोलोराडो पोटैटो बीटल्स नामक कीट-पतंगों की बौछार की है, जिनमें आलू की फ़सल बर्बाद करने की क्षमता थी.

पूर्वी जर्मनी के अख़बारों में ऐसे कई दूसरे मामले भी छपे.

इसका नतीजा ये हुआ कि पूर्वी जर्मनी में लोग अमरीका की तरफ़ से किए जाने वाले इस नए हमले के विरोध में एकत्रित होने लगे.

जर्मनी के अख़बारों में इन्हें अमरीकी सिपाही या 'आमिकाफ़ेर' कहा जाने लगा.

छात्रों को स्कूल के बाद ख़ासतौर से उन कीट-पतंगों को चुनने के लिए भेजा जाता था.

इंगो मटरना जो उस समय 18 साल के थे, उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ''हमलोग आलू के खेत में जाते थे और हम में से हर एक आदमी एक दिन में 20-25 कीट-पतंग पकड़ते थे. लड़कियां तो इसे बिल्कुल पसंद नहीं करतीं थीं. हम भी उन्हें छूना नहीं चाहते थे लेकिन हमारे पास चारा ही क्या था.''

Image caption स्कूली बच्चों को खेतों में जाकर कीट-पतंगों को पकड़ने के लिए कहा जाता था.

जर्मनी में जैविक युद्ध के विशेषज्ञ माने जाने वाले अर्हर्ड गिसलेर कहते हैं कि 1950 में जर्मनी की खेतों में बहुत सारे कीट-पतंग पाए जाते थे लेकिन उसके कई दूसरे कारण थे.

लेकिन तत्कालीन पूर्वी जर्मनी के कई लोग यही मानते थे कि अमरीका ही इसके लिए ज़िम्मेदार है.

'अमरीका का हाथ'

इंगो मटरना की राय इससे अलग है.

मटरना के अनुसार, ''ये कहना कि इसके पीछे अमरीका का हाथ है, बिल्कुल बकवास है.''

मटरना का कहना है कि शीत युद्ध के दौरान पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच बहुत अविश्वास था.

पूर्वी जर्मनी की सरकार अमरीका को बदनाम करने का कोई भी मौक़ा गंवाना नहीं चाहती थी.

कीट-पतंगों की बौछार की वजह चाहे जो भी हो लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने पूर्वी जर्मनी की फ़सलों के लिए बड़ी समस्या पैदा कर दी थी.

गिसलेर कहते हैं, ''उस समय हमलोग मुख्य रूप से आलू ही खाते थे. मेरे माता-पिता और मैं केवल एक आलू से ही नाश्ता कर लेते थे. ये सुनते ही हमलोग भौंचक्का रह गए कि हमारा खाद्य सामग्री ख़तरे में है.''

Image caption इस बारे में आधिकारिक तौर पर कुछ कहना मुश्किल है.

लेकिन दुश्मन के खेतों पर कीट-पतंगों की बौछार करना ऐसा भी नहीं था जिसे पूरी तरह से नकारा जा सकता हो.

अमरीकी हवाई जहाज़ कई बार पूर्वी जर्मनी के खेतों के ऊपर उड़ान भरते हुए देखे गए थे.

'सरकार की विफलता'

अर्हर्ड गिसलेर कहते हैं कि उस समय की कई सरकारें पोटौटो बीटल्स को हथियार की तरह इस्तेमाल करने पर विचार कर रही थीं, हालांकि इस बात के कोई सुबूत नहीं हैं कि उन्हें सचमुच में इस्तेमाल में लाया गया था या नहीं.

ब्रिटेन पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी पर कीट-पतंगों की बौछाह करने के बारे में विचार कर रहा था. हिटलर ने हालांकि जैविक हथियारों की शोध पर पाबंदी लगा दी थी लेकिन कुछ जर्मन वैज्ञानिकों ने 1943 में इस तरह के प्रयोग किए थे.

1950 में पूर्वी जर्मनी की कृषि मंत्रालय ने इस बारे में जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया था.

गिसलेर के अनुसार वैज्ञानिकों की जगह राजनेता उस आयोग के सदस्य थे और इसलिए ये सबकुछ फ़सलों की बर्बादी को रोकने में तत्कालीन सरकार की विफलता को छिपाने के लिए किया गया था.

गिसलेर कहते हैं कि ख़ुद जर्मनी की सरकार को भी इस बात पर विश्वास नहीं था कि अमरीका इसके लिए ज़िम्मेदार है.

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