जो बिकता है, वही दिखता है!

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भारतीय मीडिया पर अक्सर आरोप लगता है कि वह 'ट्रिपल सी' यानी क्रिकेट, क्राइम और सिनेमा को ज़रूरी मुद्दों से ऊपर रखता है.

सोमवार रात और मंगलवार सुबह लंदन में जो दिखा, वो भारत से बहुत अलग नहीं था.

सत्ताधारी कंज़रवेटिव पार्टी अपनी नीति में बड़ा बदलाव करके राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने पर विचार कर रही है. यह ख़बर बीबीसी के ‘न्यूज़नाइट’ कार्यक्रम में फुटबॉल खिलाड़ियों के ट्रांसफ़र पर विस्तृत चर्चा के बाद दिखाई गई.

वैसे इस दौड़ में बीबीसी बाक़ी ब्रितानी मीडिया से पीछे ही था. रेडियो, टीवी, अख़बार हर जगह गैरेथ बेल की चर्चा थी, जिन्हें स्पेन के फुटबॉल क्लब रियाल मैड्रिड ने इंग्लैंड के क्लब टॉटनहैम से साढ़े आठ करोड़ पाउंड यानी लगभग साढ़े आठ अरब रुपए में ख़रीदा है.

दीवानों का देश

ये किसी फुटबॉल खिलाड़ी के लिए अब तक चुकाई गई सबसे ऊँची क़ीमत है. इंग्लैंड फुटबॉल के दीवानों का देश है. भारत में आईपीएल खिलाड़ियों की नीलामी की जैसी कवरेज होती है, उससे कहीं अधिक जोश यहाँ दिख रहा था.

एक एफएम स्टेशन पर फ़ोन करके एक चिढ़े हुए श्रोता ने कहा कि “मेरी फुटबॉल में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन फिर हर जगह गैरेथ बेल की ख़बर सुन-सुनकर पक गया हूँ”. इस पर डीजे ने कहा, "फुटबॉल में भले आपकी दिलचस्पी न हो, पैसों में तो होगी. इतनी क़ीमत इससे पहले किसी खिलाड़ी की नहीं लगाई गई इसीलिए हम इस ख़बर को अहमियत दे रहे हैं."

स्पेन एक ऐसा देश है जो दीवालिएपन के कगार पर है. ब्रिटेन भी मंदी से उबरने के लिए हाथ-पाँव मार रहा है. उनके दो फुटबॉल क्लबों के बीच एक खिलाड़ी के लिए इतना बड़ा सौदा हुआ है.

मेरी बात सुनकर रियाल मैड्रिड के फ़ैन शायद मेरा गला दबा देंगे, लेकिन बार-बार मेरे मन में सवाल उठ रहा है कि अगर गैरेथ बेल के पैरों में चोट लग गई और वो खेलने लायक नहीं रहे तो क्या होगा?

टीवी पर आए एक ज्ञानी ने बताया कि फुटबॉल के खेल पर किसी आर्थिक मंदी का कभी कोई असर नहीं हुआ है. "दिस बिज़नेस इज़ रिसेशन प्रूफ़." भारत में भी क्रिकेट के मामले में यही सच है.

कमाई

Image caption बेल को रियाल मड्रिड ने साढ़े आठ करोड़ पाउंड में ख़रीदा है.

स्पेनी सरकार अपने कर्ज़ चुकाने के लिए जूझ रही है वहीं रियाल मैड्रिड की कमाई पिछले छह साल में दोगुनी हुई है. कुछ बड़े फुटबॉल क्लबों का सालाना कारोबार कई छोटे देशों के सकल घरेलू उत्पाद से अधिक है.

ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था जहाँ एक प्रतिशत का विकास दर हासिल करने के लिए तरस रही है वहीं इंग्लिश प्रीमियर लीग की कमाई हर साल 15 प्रतिशत बढ़ रही है.

एक टीवी एंकर ने एक्सपर्ट से जानना चाहा कि एक खिलाड़ी की दो टाँगों पर इतना बड़ा दाँव लगाने वाला क्लब यह पैसा कैसे वसूल करेगा. जवाब मिला-"यह क्लब की प्रोफ़ाइल बढ़ाने वाला इनवेस्टमेंट है. पूरी दुनिया को पता चला कि रियाल मैड्रिड कितना बड़ा क्लब है, जो ऐसे सौदे कर सकता है. इसके अलावा बेल के नाम वाली टी-शर्ट बिकेंगी. मैचों के टीवी राइट्स बिकेंगे और अच्छे खिलाड़ी ही तो मैच जिताते हैं."

जहाँ तक टीवी कवरेज की बात है, आजकल यह मुहावरा काफ़ी चल निकला है-‘जो दिखता है वो बिकता है’, लेकिन मुझे कई बार लगता है कि टीवी चैनल, चाहे भारत हो या ब्रिटेन, इस नीति पर चलते हैं कि ‘जो बिकता है, वही दिखता है’.

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