पांच वर्ष के बाद ही शुरू हो बच्चों की स्कूली शिक्षा

भारत में बच्चों की उम्र साढ़े तीन साल होते ही स्कूली शिक्षा के लिए अभिभावकों में आपाधापी मचने लगती है लेकिन ब्रिटेन में दाख़िले की उम्र को बढ़ाने के लिए अभियान छिड़ा हुआ है.

यहां शिक्षा के एक समूह ने मांग की है कि छः या सात वर्ष से पहले बच्चों की औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू नहीं की जानी चाहिए.

डेली टेलीग्राफ़ को भेजे गए एक पत्र में उन्होंने कहा है कि बहुत जल्दी ही स्कूल में दाख़िला कराना बच्चों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है.

लेखकों, शिक्षकों, समाजसेवियों और विशेषज्ञों ने कहा है कि खेल के माध्यम से पढ़ाई के पाठ्यक्रम पर ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है.

हालांकि शिक्षा सचिव माइकल गोव के प्रवक्ता ने कहा है कि पत्र लिखने वाले लोग दिग्भ्रमित हैं.

छह-सात वर्ष हो दाख़िले की उम्र

हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा है कि वर्तमान व्यवस्था बहुत कम उम्र में ही औपचारिक शिक्षा पर ज्यादा केंद्रित है मसलन ''तीन आर (रीडिंग, राइटिंग, अर्थमेटिंक)''.

उन्होंने कहा है कि स्कैंडिनेविया की तरह शिक्षा व्यवस्था बनाने के लिए राष्ट्रीय नीति का पुनः आकलन किया जाना चाहिए.

पत्र के अनुसार, जो बच्चे छः या सात वर्ष की उम्र में स्कूल में दाख़िला लेते हैं, वे पढ़ाई में भी लगातार अच्छा प्रर्दशन करते हैं और स्वास्थ्य के मामले में भी बेहतर होते हैं.

इस पत्र में 127 विशेषज्ञों ने हस्ताक्षर किया है जिनमें लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के वेल बींग प्रोग्राम के निदेशक लॉर्ड लेयार्ड, कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शिक्षा मनोविज्ञान में वरिष्ठ प्रवक्ता डॉ. डेविड ह्वाइटब्रेड और प्ले इंगलैंड के निदेशक कैथेरीन प्रिस्क प्रमुख हैं.

फिनलैंड आदर्श

हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल एक अन्य व्यक्ति, इंग्लैंड के पूर्व चिल्ड्रेन कमिश्नर सर अल आइन्सिले ग्रीन ने कहा, ''यदि आप फ़िनलैंड जैसे देश को देखें तो वहां सात वर्ष से पहले बच्चों की औपचारिक शिक्षा शुरू नहीं की जाती.''

उन्होंने कहा कि ''मेरे विचार से, बेहतरीन प्रशिक्षण प्राप्त, बेहतर वेतन वाले और अत्यधिक शिक्षित स्टॉफ़ के निर्देशन में, ये अतिरिक्त वर्ष, बच्चों के बच्चे बने रहने का महत्वपूर्ण अवसर मुहैया कराते हैं.''

शोधकर्ताओं के अनुसार, यूरोप में सबसे कम उम्र, करीब चार वर्ष, में स्कूली दाख़िला नीदरलैंड में होता है.

यह पत्र सेव चाइल्डहुड मूवमेंट नाम से अभियान चलाने वाले एक समूह ने भेजा है. यह समूह बदलाव के लिए बृहस्पतिवार से ''टू मच, टू सून'' अभियान चलाने जा रहा है.

उन्होंने कहा कि शिक्षा में उच्च मानक और जवाबदेही चाहना कोई ग़लत बात नहीं है लेकिन निश्चित रूप से यह बहुत ग़लत है यदि यह प्राकृतिक रूप से विकास की क़ीमत पर हो.

दिग्भ्रमित समूह

गोव के प्रवक्ता ने टेलीग्राफ़ को बताया कि ये लोग ताक़तवर बुरी तरह दिग्भ्रमित उस लॉबी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो परीक्षा के अवमूल्यन और सरकारी स्कूलों की स्थिति में आई गिरवाट के लिए ज़िम्मेदार है.

उन्होंने कहा कि, ''हमें एक ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत है जो विद्यार्थियों को गणित के मुश्किल सवालों को हल करने या कवि या इंजीनियर बनने के लिए तैयार करे. एक ऐसी व्यवस्था जो उन लोगों के चंगुल से मुक्त हो जो ''स्व-छवि'' के बारे में झूठे पॉप साइकॉलजी उगलते फिरते हैं और जो ग़रीब बच्चों को न पढ़ने देने का बहाना है.

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