अफ़गानिस्तानः पुलिसवाली औरतों की कहानी

  • 15 सितंबर 2013
अफगानिस्तान में महिला पुलिस कर्मी

सुबह का वक्त है और क़ाबुल के एक मुख्य पुलिस स्टेशन में निरीक्षण चल रहा है.

नीली वर्दी और नीली टोपियों में पुलिसकर्मी पंक्तिबद्ध होकर खड़े हैं. ख़ास बात यह है कि ये सब के सब पुरुष हैं. तालिबान के प्रभाव के दौरान महिलाओं की पुलिस में भर्ती पर रोक लगा दी गई थी लेकिन उसके बाद हालात बदले हैं. हालांकि अभी भी पुलिस की वर्दी में दिखने वाली महिलाएं महज़ एक फ़ीसदी ही हैं.

वाणिज्य दूतावास के बाहर हमला

ब्रिटिश चैरिटी संस्था ऑक्सफ़ैम की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि पाँच हज़ार महिलाओं को पुलिस में भर्ती करने का अफ़ग़ानिस्तान सरकार का लक्ष्य लगभग असंभव सा नज़र आता है. पारोगल सुराज एक महिला पुलिसकर्मी हैं. उनके पास हथियार है. वे वर्दी पहनती हैं और शहर एक बेहद व्यस्त सड़क पर ड्यूटी निभाती हैं. उनकी तनख्वाह ब्रिटिश जनता के टैक्स के पैसे से आती है.

वे कहती हैं, "परंपरागत तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में लोग महिलाओं का पुलिस में काम करना पसंद नहीं करते. अगर औरतें पुलिस में काम नहीं करेंगी तो उनकी समस्याएं कौन सुलझाएगा."

पारोगल का काम महिलाओं की सुरक्षा जांच करना है क्योंकि आत्मघाती हमलावर अक्सर पकड़े जाने से बचने के लिए महिलाओं का रूप धर लेते हैं. इस बात के भी उदाहरण मौजूद हैं कि जब अलग पहचान रखने वाली महिला पुलिस कर्मियों को चिन्हित किया गया. जैसे इस साल जुलाई के महीने में हेलमन्ड प्रांत की एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की घात लगाकर हत्या कर दी गई.

यौन शोषण

क़ाबुल पुलिस अकादमी में नई महिला पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है लेकिन सरकार अपना लक्ष्य हासिल करने के आसपास भी नज़र नहीं आ रही है. सरकारी इच्छाशक्ति की कमी, निरक्षरता और पुलिस महकमें में पुरूष सहकर्मियों के खिलाफ़ यौन-दुर्व्यवहार कुछ ऐसे कारण हैं जो महिलाओं को पुलिस की नौकरी करने से रोकते हैं.

जनरल अयूब सलंगी हाल तक क़ाबुल के पुलिस चीफ़ थे जिन्हे अब उप-आंतरिक मंत्री बना दिया गया है.

अफगानिस्तान में नेटो हमला

अयूब पुलिस पर लगने वाले आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहते हैं, "जहां तक पुलिस पर यौन-शोषण के आरोपों का सवाल है मैं उसे ख़ारिज करता हूं. हालांकि मैं ये ज़रूर स्वीकार करता हूं कि समस्याएं हैं. हमारे पास महिलाओं को सुविधाएं देने की योजना हैं जो उन्हें पुलिस में शामिल होने के लिए प्रेरित करेगी. मैं उम्मीद करता हूं कि हम भविष्य में सारी समस्याएं सुलझा लेंगे लेकिन इसमें वक्त तो लगता है. कुछ छिटपुट प्रगति हुई है लेकिन यौन शोषण की घटनाएं भी बढ़ी हैं."

एक सेफ़ हाउस में मेरी मुलाक़ात एक 15 साल की लड़की से हुई. घर से भागी हुई ये लड़की पुलिस को सड़क पर घूमते हुए मिली थी.

वह कहती है, "पुलिस ने मुझसे कहा कि मैं सुबह तक कार के भीतर सो जाऊं. उन्होंने मुझसे वायदा किया कि वो सुबह मेरी मां को ढूंढने की कोशिश करेंगे. मैं पूरी रात कार के अंदर रोती रही. एक पुलिसवाला कार के अंदर आ गया. मैं उससे डर गई थी. मुझे समझ नहीं आया कि वो क्या चाहता है."

'शर्मिंदगी'

इसके बाद उस पुलिसकर्मी और उसके दो साथियों ने इस लड़की के साथ बलात्कार किया. महिलाओं के लिए काम करने वाली एक चैरिटी संस्था के दख़ल के बाद ही इन तीनों पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया और अब वो जेल में सज़ा काट रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा के ऊंचे ग्राफ़ की वजह से भी ज़्यादा महिला पुलिसकर्मियों की ज़रूरत है ताकि क़ानूनों को लागू कराया जा सके. ऐसा नहीं है कि सभी महिला कर्मियों को तुरंत मुख्यधारा की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां सौंप दी जाएंगी लेकिन महिलाओं के लिए अभियान चलाने वाली कार्यकर्ता कहती हैं कि उन्हें दरकिनार भी नहीं किया जाना चाहिए.

क्यों डर रहे हैं अफगान

एलिज़ाबेथ कैमरन चैरिटी संस्था ऑक्सफ़ैम अफ़ग़ानिस्तान में नीतिगत सलाहकार हैं. वह कहती हैं, "अफ़ग़ान पुलिस में महिलाओं को बहुत नीची नज़र से देखा जा सकता है क्योंकि उनका वास्ता रोज़ाना पुरूषों से होता हैं. ज़्यादातर पुलिस स्टेशनों में महिलाओं के लिए अलग से सुविधाएं नहीं हैं जबकि आम धारणा ये है कि महिलाओं के कपड़े बदलने, खाने और उठने बैठने की जगह अलग होनी चाहिए."

पुलिसकर्मी पारोगल सुराज घर में अपने छह बच्चों के साथ काफ़ी ख़ुश हैं. हालांकि उनके पति हमसे बात करने से कतराते रहे क्योंकि वो पारोगल के पुलिस की नौकरी करने पर शर्मिंदगी सा महसूस करते हैं. उनके रिश्तेदारों ने तो पारोगल से तभी बोलना बंद कर दिया था जब उन्होने पुलिस सेवा में क़दम रखा था.

लेकिन ड्यूटी से इतर पारोगल ख़ुद बहुत ही बेबाक़ी से इस बात का जवाब देती हैं कि किन वजहों से अफ़ग़ानिस्तान में औरतें पुलिस में शामिल नहीं होतीं. वह कहती हैं, "पुलिस में होने की वजह से मुझे अक्सर आधी रात को फ़ोन आते हैं. जिसकी वजह से लोग बातें बनाते हैं. औरतों का देर रात बाहर जाना अच्छा नहीं माना जाता. मुझे बहुत बुरा लगता है जब वो मेरी बारे ग़लत बातें करते हैं."

पुलिस सुधारों की धीमी गति काफ़ी निराशाजनक है. एक धारणा ये भी है कि अगले साल जब अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका की अगुआई वाली सेनाओं की वापसी होती तो समानता की दिशा में हो रही कोशिशें थम सी जाएंगी.

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