सूडानः हिंसा में 24 की मौत

सूडान में हिंसा

सूडान की राजधानी खारतूम में तेल सब्सिडी में कटौती के कारण हो रहे विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 24 लोग मारे गए हैं.

ओमदुरमन अस्पताल के निदेशक ने बीबीसी की अरबी सेवा को बताया कि मारे गए लोगों को गोली लगी है.

उन्होंने कहा कि गोली लगने से घायल 80 अन्य लोगों का इलाज चल रहा है. खारतूम के कुछ हिस्सों में हिंसा भड़क जाने से पुलिस की प्रदर्शनकारियों से झड़प हो गई थी.

प्रदर्शनकारियों में से कुछ राष्ट्रपति उमर अल बशीर के इस्तीफे के मांग कर रहे थे. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ कई पेट्रोल पंपों को आग लगा दी गई और हवाई अड्डे की तरफ जाने वाली मुख्य सड़क को अवरुद्ध कर दिया गया.

शहर में स्कूल बंद हैं और अख़बारों का कहना है कि उन्हें प्रकाशन ना करने के आदेश दिए गए हैं. कई घंटों तक सूडान की इंटरनेट सेवा भी प्रभावित रही.

खारतूम में अमरीकी दूतावास ने सभी पक्षों को हिंसा से बचने को कहा है.

अर्थव्यवस्था संकट

Image caption प्रदर्शनकारियों में से कुछ राष्ट्रपति उमर अल बशीर के इस्तीफे के मांग कर रहे थे.

2011 में दक्षिण सूडान के अलग होने के बाद से सूडान की अर्थव्यवस्था संकट में है.

खारतूम के एक अस्पताल के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि उन्हें बुधवार को ही गोली लगे तीन शव मिले.

ओमदुरमन अस्पताल के निदेशक डॉ. ओसामा मोर्तादा ने बताया, "बुधवार शाम आठ बजे तक हमारे पास 21 मरे हुए और 81 घायल लोगों को लाया गया था. सभी को गोलियाँ लगीं थीं. कुछ को सीने में, कुछ को सिर में. हमने सीने, पेट और सिर के 30 से ज्यादा ऑपरेशन किए."

इससे पहले राजधानी के कई भागों में हिंसा भड़कने पर पुलिस ने पथराव कर रहे प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस छोड़ी.

'तेल संपन्न देश था'

Image caption पिछले साल भी तेल सब्सिडी में कटौती के बाद कई हफ़्तों तक विरोध प्रदर्शनों का दौर चला था.

दक्षिणी सूडान के अलग होने तक सूडान को एक तेल संपन्न देश माना जाता था.

स्वतंत्र दक्षिणी सूडान में अविभाजित सूडान के 75 प्रतिशत तेल भंडार चले गए हैं.

सूडान के मीडिया सेंटर ने खारतूम के दक्षिण में स्थित गेज़िरा के राज्यपाल अल जुबैर बशीर ताहा के हवाले से बताया कि हिंसा में पुलिस स्टेशनों के अलावा बिजली और गैस केंद्रों, बैंकों, दुकानों और निजी संपत्तियों को भी निशाना बनाया गया.

सूडान में इससे पहले जुलाई 2012 में तेल सब्सिडी में कटौती हुई थी जिसके बाद कई हफ़्तों तक विरोध प्रदर्शनों का दौर चला था.

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