ब्रिटेन से बर्मा तक के जेलों में शांति ला रहा है योग

  • 30 सितंबर 2013
ब्राज़ील जेल योग

दुनिया भर की जेलों में कैदियों का तनाव कम करने के लिए योग का सहारा लिया जा रहा है. जेल प्रशासन भी इसके फ़ायदों को देखते हुए शांत और सकारात्मक माहौल तैयार करने के लिए योग की कक्षाएं शुरू कर रहा है.

पश्चिमी लंदन के एक छोटे से योग स्टूडियो में 40 साल के निक ब्रूअर पूरी दक्षता से योगासन कर रहे हैं.

उन्होंने ब्यूनस आर्यस, अर्जेंटीना, के विला डेवोटो जेल में योग को साधा था. वह कहते हैं, "यह छह साल जेल में रहने की वजह से है."

80 जेलों में योग

निक को कोकीन की तस्करी में दस साल की कैद हुई थी. तस्करी से वह करोड़पति बन गए थे.

लेकिन 2004 में एक दिन वो पकड़े गए और जेल पहुंच गए. वह बताते हैं कि जेल की परिस्थितियां बहुत ख़राब थीं.

पहले एक साल उन्हें एक बड़े खंड में करीब 100 से 400 कैदियों के बीच रहना पड़ा, जहां ज़मीन पर सोना होता था.

जेल में रोज़ हिंसा होती थी और वहां मौत होना कोई अनहोनी नहीं थी.

एक साल बाद उन्हें अलग कोठरी में रखा गया जहां पहली बार उन्होंने योग के बारे में जाना.

निक कहते हैं, "यह एक मुश्किल वक्त था. हम लोग अचानक भारी भीड़-भड़क्के से एकांत में पहुंच गए थे. जहां कुछ भी नहीं था. एक कोठरी में दो बिस्तर थे और एक टेबल थी."

जेल में ही उन्हें योग पर एक किताब मिली और फिर योग उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया.

ब्रिटेन में जेलों में योग और ध्यान के लिए 1988 में एक धर्मार्थ संस्था- प्रिज़न फ़ीनिक्स ट्रस्ट- का गठन किया गया था.

आज यह संस्था करीब 80 जेलों में या तो योग कक्षा लगाती है या फिर कैदियों को किताबें और सीडी भेजती है.

ट्रस्ट के निदेशक सैन सेटल कहते हैं, "कैदी जिस भारी मानसिक दबाव और तनाव से जूझ रहे होते हैं हम उससे दूर करने में मदद कर रहे हैं. "

कोई दिक्कत नहीं

प्रिज़न फ़ीनिक्स ट्रस्ट पूरी तरह अनुदान पर चलता है तो स्वीडन में योग जेल प्रणाली का आधारभूत हिस्सा बन गया है.

स्वीडिश जेल प्रणाली में एक राष्ट्रीय योग संयोजक की नियुक्ति की जाती है. बाकी चीज़ों के अलावा उसकी ज़िम्मेदारी जेल के पहरेदारों को योग शिक्षक बनाना भी होती है.

दक्षिण स्वीडन में देश की पांच महिला जेलों में से एक है. इसमें 65 कैदी हैं जो एक-दो महीने से लेकर उम्रकैद तक की सज़ा काट रही हैं.

चालीस साल की अनिका यहां 20 महीने की कैद काट रही हैं.

वह कहती हैं, "यहां भर्ती 90% लोगों को नशे की समस्या है. अगर आप उनका नशा उसी दिन बंद कर दो तो समझा जा सकता है कि कैसी स्थिति होगी. उन्हें नशीली दवा नहीं मिलती तो वो बीमार पड़ जाते हैं, पागल हो जाते हैं और अपना आपा खो देते हैं."

गवर्नर, विक्टोरिया रीढोलम बताती हैं कि नशे की आदी कैदी डॉक्टरों की दी गई दवाई में ही हल ढूंढते हैं.

वह कहते हैं, "यहां दर्द निरोधक दवाओं की बहुत खपत है. पेट और बाकी सब चीजों की दवाइयों की भी बहुत खपत होती है. ये महिलाएं अपनी बेचैनी को ख़त्म करने के लिए कुछ न कुछ चाहती हैं."

वह कहती हैं कि योग से जेल कर्मचारियों के लिए इन महिलाओं को अपना व्यवहार सुधारने की प्रेरणा देना आसान हो गया है.

"अक्सर झगड़ा भी होता है लेकिन योग के दौरान कभी भी कोई दिक्कत नहीं हुई. इतने सालों में एक बार भी नहीं."

खुल गए दरवाज़े

बर्मा जैसी जगहों में ध्यान का भी जेलों पर व्यापक प्रभाव नज़र आ रहा है.

राजनीतिक वजहों से गिरफ़्तार कलाकार टीन लिन को सात साल की सज़ा मिली थी.

म्योंग म्या जेल में भी परिस्थितियां बहुत ख़राब थीं. उन्हें भी निक की तरह एक किताब मिली लेकिन यह योग नहीं ध्यान पर थी.

दूसरे कैदियों की ध्यान भंग करने की कोशिशों के बावजूद उन्होंने ध्यान सीखना शुरू कर दिया.

शुरू-शुरू में जेल के पहरेदार भी उन्हें लेकर संशकित रहते थे लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं और कैदियों ने ध्यान में रुचि लेना शुरू कर दिया.

कुछ समय बाद लिन जेल प्रशासन को इस बात पर मनाने में कामयाब हो गए कि ध्यान करते वक्त जेल की कोठरियों के दरवाज़े खुले रखे जाएं..

इससे पहले कोठरियों के दरवाज़े हमेशा बंद रखे जाते थे वरना कैदी एक-दूसरे की हत्या कर देते.

अब कोठरियों के दरवाज़े दिन भर खुले रहते हैं और सिर्फ़ रात में ही बंद होते हैं.

दुपहिया और मुस्कान

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के दो शोधार्थियों का कहना है कि जेलों में योग और ध्यान के भारी फ़ायदे हैं.

उनके ब्रिटेन के सात जेलों के कैदियों के पर किए गए शोध के परिणाम हाल ही में प्रकाशित हुए हैं.

विला डेवोटो में छह साल गुज़ारने वाले निक के पास कोई वैज्ञानिक सबूत तो नहीं है लेकिन उन्हें यकीन है कि योग से उनकी ज़िंदगी बच गई है.

किसी वक्त नशे के सौदागर रहे निक के पास महंगी गाड़ियां, स्पीड बोट, नाइट क्लब सब कुछ था.

आज वह पश्चिमी लंदन में एक योग स्टूडिया चलाते हैं.

अब वह पोर्श नहीं बल्कि एक दोपहिया स्कूटर चलाते हैं लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कान खिली रहती है.

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