मंगल की मिट्टी में पानी के संकेत

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के क्यूरियोसिटी रोवर ने मंगल पर पानी की मौजूदगी के संकेत दिए हैं. रोवर ने जब मंगल की धरती की मिट्टी को गर्म किया तो उससे अच्छी-खासी मात्रा में भाप निकला, जो एच2ओ यानी पानी था.

क्यूरियोसिटी की शोधकर्ता लॉरी लेशिन और उनके साथियों ने 'साइंस मैगजीन' को बताया कि इस लाल ग्रहके धूल में दो फीसदी पानी है. यह भविष्य के अंतरिक्षयात्रियों के लिए उपयोगी हो सकता है.

डॉ. लेशिन ने कहा, ''यदि आप एक घन फुट धूल को कुछ सौ डिग्री तक गर्म करते हैं तो आपको दो पाइंट यानी करीब एक लीटर पानी मिलेगा.''

उन्होंने कहा, ''मंगल पर यह मिट्टी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि आप जहां कहीं भी जाते हैं वहां पर ये मिट्टी मिलती है. शोधकर्ताओं के लिए यह एक अच्छी खबर है क्योंकि वे करीब-करीब हर जगह से आसानी से पानी निकाल लेंगे.''

न्यूयार्क स्थित रेनसेलर पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट में विज्ञान की डीन लेशिन ने क्यूरियोसिटी से जुड़े अपने कामों के बारे में बीबीसी के साइंस इन एक्शन प्रोग्राम में बातचीत की.

जानकारियों पर शोधपत्र

मंगल पर क्यूरियोसिटी से मिली जानकारियों के बारे में पांच शोध पत्रों की सिरीज़ का यह एक छोटा सा हिस्सा है.

डॉ. लेशिन और उनके साथियों ने हालांकि मंगल की सतह पर क्यूरियोसिटी के उतरने की जगह से करीब 400 मीटर की दूरी पर मिले 'रॉकनेट' के विश्लेषण के बाद कुछ चिंता जताई है.

दरअसल, क्यूरियोसिटी ने अपने टूल्स के जरिए मंगल की मिट्टी को परीक्षण के लिए इसी रोबोट में छिपे सैम नामक उपकरण को भेजा था. इस जांच में कार्बन डाय ऑक्साइड की अच्छी मात्रा देखी गई. इसमें ऑक्सीजन और क्लोरीन भी पाया गया.

डॉ. लेशिन ने कहा, ''ये परक्लोरेट नामक खनिज़ से अलग किए गए तत्व हैं और मिट्टी में ये करीब आधा फीसदी है.''

उन्होंने कहा, ''यदि अंतरिक्षयात्रियों के लिए पानी एक अच्छी खबर है तो यह खराब खबर भी है. क्योंकि परक्लोरेट थायराइड पर असर करता है और अगर मंगल पर इंसान के शरीर में ये घूल-मिट्टी चले गए तो समस्या हो सकती है.''

साइंस मैगजीन में प्रकाशित तीन और शोधपत्रों में भी मंगल की मिट्टी को लेकर चिंताएं जाहिर की गई है.

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