ख़ामोशी जिसने दुनिया को परमाणु हमले से बचाया

  • 29 सितंबर 2013
स्टानिस्लाव पेत्रोव
Image caption स्टानिस्लाव पेत्रोव के एक फैसले ने अमरीका और रूस के बीच परमाणु युद्ध को टाल दिया था.

26 सितंबर 1983 को तड़के तत्कालीन सोवियत संघ की आरंभिक चेतावनी प्रणाली ने अमरीका से मिसाइल हमले की पहचान की. कंप्यूटर गणना के नतीजों से पता चला कि कई मिसाइलें छोड़ी गई हैं.

ऐसे में सोवियत रूस की सेना का प्रोटोकॉल था कि जवाबी हमले में उसकी तरफ़ से परमाणु हमला किया जाए.

लेकिन उस समय ड्यूटी पर मौजूद अधिकारी स्टानिस्लाव पेत्रोव ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इस अलर्ट की सूचना न देने का फ़ैसला लिया. उन्होंने उसे मिथ्या अलार्म बताकर खारिज़ कर दिया.

यह उनको मिले निर्देशों का उल्लंघन था यानी कर्तव्य की अवहेलना. उनके लिए सुरक्षित तरीका था कि ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल दो.

पेत्रोव का काम शत्रु की तरफ से किसी मिसाइल हमले के बारे में समय रहते जानकारी हासिल कर वरिष्ठ अधिकारियों को देना था. लेकिन शायद उनके इस निर्णय ने दुनिया को बचा लिया.

हमले की आशंका

उन्होंने बीबीसी की रूसी सेवा को बताया, "मेरे पास सभी आंकड़े थे (जो बता रहे थे कि मिसाइल हमला होने जा रहा है). अगर मैं अपनी रिपोर्ट कमांड में ऊपर भेज देता, तो कोई नहीं कह सकता था कि यह ग़लत है."

पेत्रोव लेफ्टिनेंट कर्नल पद से सेवानिवृत्त हुए और इस समय मॉस्को के पास एक छोटे से क़स्बे में रह रहे हैं.

1983 के राजनीतिक माहौल में किसी हमले की आशंका हमेशा बनी रहती थी.

उन्होंने बताया कि सायरन ने आवाज़ दी, लेकिन मैं कुछ सेकेंड तक बैठा रहा. लाल स्क्रीन पर 'लॉन्च' शब्द लिखा हुआ था.

उन्होंने बताया कि सिस्टम के मुताबिक अलर्ट की विश्वसनीयता काफी अधिक थी. इसमें कोई संदेह नहीं था कि अमरीका ने मिसाइल हमला कर दिया है.

सिस्टम की गलती

Image caption सोवियत रूस की सेना का प्रोटोकॉल था कि उस पर मिसाइल हमले की चेतावनी मिलने के बाद जवाब में परमाणु हमला किया जाए.

उन्होंने बताया, "एक मिनट के बाद सायरन बंद हो गया. दूसरी मिसाइल लॉन्च हुई. फिर तीसरी और चौथी और पांचवीं. कंप्यूटर ने अपने अलर्ट को 'लॉन्च' से बदलकर 'मिसाइल हमला' कर दिया था."

वह जानते थे कि सोवियत संघ की सेना और राजनीतिक नेतृत्व को तुरंत यह ख़बर मिलनी चाहिए, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

सोवियत प्रोटोकॉल के मुताबिक ऐसी स्थिति में उसे प्रतिक्रिया में परमाणु हमला करना चाहिए था.

मगर पेत्रोव को अलर्ट पर संदेह था, लेकिन यह केवल उनका संदेह ही था. उन्होंने सोवियत सेना के मुख्यालय में ड्यूटी अधिकारी को फोन किया और कहा कि सिस्टम की ग़लती के चलते ऐसा हुआ.

अगर वह ग़लत होते तो पहला परमाणु विस्फोट कुछ ही मिनट में हो सकता था.

पेत्रोव बने नायक

उन्होंने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, "23 सेकेंड बाद मुझे लगा कि कुछ नहीं हुआ है. अगर हमला असली होता, तो मुझे इसके बारे में अब तक पता चल गया होता. यह काफ़ी राहत की बात थी."

घटना के क़रीब 30 साल बाद पेत्रोव को लगता है कि कुछ भी हो सकता था. वह स्वीकार करते हैं कि उन्हें कभी भी इस बात का पूरा भरोसा नहीं था कि अलर्ट ग़लत है.

क़रीब दस साल तक वो खामोश रहे. उन्होंने बताया, "मैंने सोचा कि यह सोवियत सेना के लिए शर्मनाक है कि हमारी प्रणाली इस तरह से असफल हो गई."

मगर सोवियत संघ के विघटन के बाद यह ख़बर प्रेस में आ गई. उसके बाद पेत्रोव को कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले.

पर वे खुद को नायक नहीं मानते. वे कहते हैं कि "वह मेरी नौकरी का हिस्सा था लेकिन वो भाग्यशाली थे क्योंकि उस रात शिफ़्ट पर मैं था."

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