भूकंप के बाद बीमारियों की चपेट में बलूचिस्तान

पाकिस्तान के प्रांत बलूचिस्तान में पिछले दिनों आए भूकंप से प्रभावित लोगों को कई तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि प्रशासन की तरफ़ से अभी तक उन्हें बुनियादी सुविधाएँ भी मुहैया नहीं कराईं गई हैं.

बलूचिस्तान के शहर मस्का से मिली ख़बरों के मुताबिक़ लोगों ने ख़ुद पहल करते हुए राहत शिविर लगाए हैं, लेकिन सरकार या दूसरी किसी बड़ी संस्था की तरफ़ से अभी तक कोई मदद सामने नहीं आई है.

भूकंप प्रभावित इलाक़ों में मरने वालों की कुल संख्या 450 से अधिक हो चुकी है.

स्थानीय लोगों की मदद से चलाए जा रहे राहत शिविरों के डॉक्टरों ने बताया कि इस समय बच्चों और महिलाओं को सबसे ज़्यादा दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

महिलाओं की दिक्क़तें

भूकंप की वजह से वहां के ज़्यादातर कुएँ मिट्टी से भर गए हैं और लोग अब बरसाती नालों और नदियों का पानी पी रहे हैं, जो काफ़ी प्रदूषित है.

इस वजह से उनमें डायरिया तेज़ी से फैल रहा है.

चूंकि सारे घर टूट चुके हैं, इसलिए लोग बाहर खुले में सोने को मजबूर हैं. ऐसे में वहां मलेरिया के मामले भी समाने आ रहे हैं.

राहत शिविर में मौजूद एक महिला चिकित्सक ने बताया कि उनके शिविर में तीन ऐसी महिलाएँ हैं, जिनका भूकंप से गर्भपात हो गया था. अब उनके शरीर से ख़ून निकलना बंद नहीं हो पा रहा है.

इसके अलावा उनके पास इस क़िस्म के भी मामले आ रहे हैं जिसमें गर्भवती महिलाएं कह रही हैं कि उनका बच्चा हिलडुल नहीं रहा है.

शिविरों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं है. इस कारण अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है कि बच्चा ज़िंदा है या मर चुका है.

सुविधाओं का अभाव

Image caption भूकंप से अभी तक 450 से अधिक जानें जा चुकी हैं.

मस्का से क़रीबी अस्पताल आवारान है, जहां तक पहुंचने के लिए लगभग पांच घंटे का सफ़र तय करना पड़ता है, जबकि सड़क एकदम ख़स्ताहाल है.

इस अस्पताल में भी सिर्फ़ एक महिला डॉक्टर ही है. वहां एक्सरे और पैथोलॉजी की कोई सुविधा नहीं है.

हालात ऐसे हैं कि पूरा शहर ही मलबे का ढेर नज़र आता है. भूकंप के वक़्त एक मदरसे में पढ़ रही क़रीब 22 बच्चियों की मौत हो गई.

क़रीब 27 साल पुराना यह मदरसा एकदम कच्चा था. शाम के समय वहां पर बच्चियाँ पढ़ रहीं थीं.

इस्लामिक परंपरा के मुताबिक़ कफ़न के लिए सफ़ेद रंग के कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन वहां कपड़े की इतनी कमी थी कि उन्हें अलग-अलग रंगों के कफ़न पहनाकर उनका अंतिम संस्कार किया गया.

सरकारी लापरवाही

राहत और बचाव में ख़ामियों की शिकायत पर बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री डा. अब्दुल मलिक ने कहा कि सप्लाई लाइन बहाल नहीं हो सकी थी, इसलिए देर हुई थी. लेकिन अब आपूर्ति शुरू कर दी गई है.

बलूचिस्तान का यह इलाक़ा पहले से ही काफ़ी पिछड़ा हुआ रहा है और वहां सरकार की तरफ़ से कोई बुनियादी ढांचा नज़र नहीं आता है.

सरकारी अस्पतालों में भूकंप से पहले भी सुविधा नहीं के बराबर थी. सरकारी इमारतें भी काफ़ी जर्जर थीं.

ऐसे में भूकंप ने हालात बहुत ही मुश्किल कर दिए हैं.

सड़क नहीं होने के चलते बड़े ट्रक वहां जा नहीं सकते हैं और केवल छोटी गाड़ियों से ही काम चलाया जा रहा है.

सरकार के इसलिए भी दिक्क़तों का सामना करना पड़ा रहा है क्योंकि वहां चरमपंथी गुटो ने कहा है कि वो सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल से पहुंचाई गई मदद का विरोध करेंगे. जबकि सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के दल को प्रभावित इलाक़ों में जाकर राहत और बचाव कार्य शुरू करने की इजाज़त नहीं दी है.

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