'लालू की साख पर कोई ज़्यादा असर नहीं'

चारा घोटाले मामले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव को सुनाई गई सज़ा से उनके व्यक्तिगत करियर पर कोई ख़ास नहीं पड़ने वाला है.

अदालत ने उन्हें पांच साल की सज़ा सुनाई गई. अब वो चुनाव नहीं लड़ पाएंगे भले ही आगे अपील होगी और मामला चलता रहेगा.

उनकी पार्टी तो चलती ही रहेगी. पार्टियां बंद नहीं होती हैं जहां तक उनकी साख का सवाल है उसमें भी ख़ास फ़र्क नहीं पड़ेगा.

17 साल पुराना मामला है लोग अपना मन इधर या उधर बना चुके हैं. उनके चुनाव क्षेत्र सारण में कुछ लोगों का जाना हुआ और लोगों से बातचीत हुई तो पता चला कि उनका जो समर्थक वर्ग है वो भावनात्मक तौर पर उनसे और ज़्यादा जुड़ गया है.

बिहार में इस समय राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है. सिर्फ़ राजद ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार और भाजपा के बीच जो टूट हुई है उसके बाद से जनता दल यूनाइटेड और भाजपा में ज़बरदस्त लड़ाई छिड़ी हुई है.

एक नई प्रतिस्पर्धा तो चल ही रही है और यह कहना बड़ा मुश्किल है कि मतदाताओं का रूख़ क्या होगा. ये कहना कि पिछड़ा वर्ग एक तरह से वोट करता है तो अति पिछड़ा दूसरी तरह से या मुसलमान एक तरह से वोट करते हैं और सवर्ण कैसे करते हैं, ये अभी बता पाना बहुत मुश्किल है कि किसका वोट किसे जाएगा. बिहार में इस वक़्त ये खलबली मची हुई है.

लालू का दम

Image caption तेजस्वी यादव को लेकर अक्सर ये सवाल उठता है कि क्या वह पार्टी में कोई भूमिका निभाएंगे

बहुत लोग ये मान रहे हैं कि उधर वो जेल गए और इधर एक स्थान रिक्त हो गया. मेरे ख़्याल से रिक्त कुछ नहीं हुआ.

लालू यादव बहुत बड़े नेता हैं. 90 के दशक में जिन लोगों ने उनको देखा है उन्हें मालूम है कि लोगों के बीच उनका क्या असर था.

हम लोग बिहार की रिपोर्टिंग किया करते थे उस वक़्त और ऐसा लगता था कि लालू को हरा पाना असंभव है.

लालू यादव हार कर भी विपक्ष में होकर भी 18 से 20 फ़ीसदी वोट अपने पास रखते हैं. ये जो इमेज या छवि की बात है यह सब शहरी मध्य वर्ग के लिए मायने रखती है लेकिन शहरी मध्य वर्ग उनका वोटर नहीं है.

लालू के बाद कौन

ये बता पाना बड़ा मुश्किल है. लालू यादव अपने बाद पार्टी में रोज़मर्रा का कामकाज किसके हाथ में सौंपते हैं ये देखना होगा.

उनकी पार्टी में कई वरिष्ठ नेता हैं, जगदानंद सिंह जैसे नेता हैं, अब्दुल बारी सिद्दीक़ी हैं जो पिछले कुछ समय तक बिहार में विपक्ष के नेता थे. रघुवंश बाबू हैं, उनकी अपनी छवि है, बड़े ईमानदार नेता माने जाते हैं.

एक तरफ़ तो ये लोग हैं और दूसरी तरफ़ है लालू यादव का अपना परिवार. राबड़ी देवी मुख्यमंत्री रह चुकी हैं लेकिन उनके बारे में सबको मालूम है, जब मुख्यमंत्री थी भीं तब भी केवल रबर स्टैंप थीं.

तेजस्वी यादव को लाने की कोशिश ज़रूर की गई लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ करके नहीं दिखाया है जिससे लगे कि वे लोगों में विश्वास पैदा कर रहे हैं.

अगर राजद में पारिवारिक उत्तराधिकार होगा तो पार्टी में अंदरूनी खलबली ज़रूर होगी. एक असंतुष्टि होगी वरिष्ठ नेताओं के अंदर की पार्टी में इतने साल गुज़ारने के बाद भी उन्हें इतना अनुभवी नहीं माना जाता कि पार्टी की बागडोर सौंपी जाए.

राष्ट्रीय राजनीति पर असर

Image caption नीतिश कुमार और भाजपा के बीच टूट ने बिहार की राजनीति में नए समीकरणों के लिए ज़मीन तैयार की है

हालांकि ये तुरंत कहना मुश्किल है लेकिन लगता है कि जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस के बीच नज़दीकियां बढ़ रही हैं.

आज कांग्रेस जिस स्थिति में है उसके लिए बड़ा मुश्किल है कि मुजरिम क़रार दिए गए लालू यादव के साथ गठजोड़ किया जाए क्योंकि छवि का सवाल है.

लेकिन मैं इस बात की संभावना से भी बिल्कुल इंकार नहीं करूंगा कि अगर नरेन्द्र मोदी बिहार में बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हुए दिखाए दिए तो कांग्रेस, राजद, जदयू और रामविलास पासवान दूरियां भुलाकर साथ आ जाएंगे.

मैं ये नहीं कहता कि ये लोग एक औपचारिक गठबंधन कर लेंगे लेकिन एक अनौपचारिक सी समझ ज़रूर बन सकती है कथित सांप्रदायिक ताक़तों को दूर रखने के मक़सद से.

(बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह से बातचीत पर आधारित)

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