अमरीकी कामबंदीः अब भी नहीं निकली राह

अमरीका कामबंदी

अमरीका में कर्ज़ सीमा बढ़ाने के लिए जारी गतिरोध को खत्म करने के लिए राष्ट्रपति बराक ओबामा और उप-राष्ट्रपति जो बाइडन दोनों पार्टियों के कांग्रेस से संबंधित नेताओं से मिलेंगे.

कर्ज़ की सीमा बढ़ाने की समयसीमा नज़दीक आने के बाद हाउस ऑफ़ रिप्रंज़ेटेटिव्स और सीनेट के नेताओं से मिलने का कार्यक्रम तय किया गया है.

अमरीकी सरकार की कामबंदी और राजनीतिक गतिरोध को अब तीन हफ़्ते हो गए हैं.

सरकार ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही किसी समझौते पर नहीं पहुंचा जाता है तो अमरीका कर्ज़ चुकाने में अक्षम हो सकता है.

व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, "कर्ज़ की सीमा बढ़ाने के लिए कुछ ही दिन बचे हैं और राष्ट्रपति कांग्रेस के सामने ये साफ़ कर देंगे कि सरकार के बिल चुकाने और सरकारी कामकाज शुरू करने की कितनी ज़रूरत है."

सुधारों के ख़िलाफ़

Image caption कामबंदी की वजह से अमरीका में महत्वपूर्ण स्मारक भी बंद हो गए हैं.

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता हैरी रीड, सीनेट में रिपब्लिकन नेता मिट मैक्कोनेल, रिपब्लिकन सभापति जॉन बॉह्नर और डेमोक्रेट नेता नैन्सी पेलोसी से मुलाकात हो सकती है.

अमरीकी कांग्रेस के नेताओं के बीच हफ़्ते भर तक चली बातचीत के बाद भी देश की कर्ज़ सीमा बढ़ाने पर कोई सहमति नहीं हो सकी है. इसकी समयसीमा गुरुवार को है.

रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सीनेट नेताओं के बीच बातचीत रविवार को भी जारी रही और दोनों सोमवार को अमरीकी वित्तीय बाज़ार की प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रहे थे ताकि अपना रुख तय कर सकें.

रीड ने मैक्कोनेल के साथ हुई बातचीत को "उपयोगी" बताया लेकिन दोनों नेता 167 खरब अमरीकी डॉलर के कर्ज़ को लेकर किसी समाधान पर पहुंचने में नाकाम रहे.

पिछले कुछ सालों से कर्ज़ की सीमा बढ़ाने पर संसद की सहमति को विपक्षी दल विरोध जताने के मौके के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं.

इस बार वो राष्ट्रपति ओबामा के स्वास्थ्य सेवा में लाए जाने वाले सुधारों के खिलाफ हैं और इसलिए कर्ज़ की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव पर अपनी मुहर नहीं लगा रहे हैं.

बाज़ार की आशंका

सरकार मई के बाद से किसी तरह से धन जुटाकर प्रशासन का काम जारी रखने की कोशिश कर रही है लेकिन समझा जाता है कि अक्तूबर के बाद वो ऐसा करने में भी सक्षम नहीं रह पाएगी.

अगर कर्ज़ की सीमा बढ़ाने पर अमरीकी संसद की मुहर नहीं लग पाती है तो अक्तूबर के बाद से ऐसी स्थिति पैदा हो जाएगी जिसमें अमरीका को अपने कर्ज़ पर ब्याज देने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

दुनिया भर में सबसे सुरक्षित निवेश माने जाने वाले अमरीकी बांड का भी ब्याज नहीं भरा जाएगा तो दूसरे देशों के बांड वगैरह को लेकर वित्तीय बाज़ार की शंका और बढ़ जाएगी.

इसका मतलब होगा ब्याज दर का बढ़ना और विश्व भर में महंगी ब्याज दर किस तरह की परेशानियां पैदा कर सकती है इसे लेकर वित्तीय बाज़ार में परेशानी है.

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