चीन-ब्रिटेन व्यापार संबंधों के बदलते समीकरण

  • 16 अक्तूबर 2013
george osborne, boris johnson

ब्रिटेन के वित्त मंत्री जॉर्ज ऑस्बॉर्न और लंदन के मेयर बॉरिस जॉनसन इन दिनों चीन के दौरे पर हैं.

ये दोनों उस ब्रितानी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं जो चीन की और ज़्यादा कंपनियों को ब्रिटेन में निवेश के लिए राज़ी करने के लिए वहां पहुंचा है.

इन कोशिशों के तहत जॉर्ज ऑस्बॉर्न ने कई कदमों की घोषणा की है. इनमें ब्रिटेन आने वाले चीनी लोगों के लिए वीज़ा प्रक्रिया आसान कर दी गई है.

पिछले 200 साल में दोंनो देशों के व्यापार संबंधों में बहुत उतार-चढ़ाव आए हैं.

इतिहास

वैसे इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जितना प्यार ब्रितानियों को अपने इतिहास से है उतना ही प्यार चीन के लोग अपने इतिहास से करते हैं.

चीन की अर्थव्यवस्था को पश्चिमी दुनिया के लिए खोलने में ब्रिटेन ने 18वीं और 19वीं सदी में पहल की थी.

चीन में पहला ब्रितानी व्यापार मिशन लॉर्ड जॉर्ज मैक्कार्टनी की अगुवाई में साल 1793 में गया था. उस व्यापार दौरे का मक़सद तत्कालीन शक्तिशाली चीनी साम्राज्य को ब्रितानी व्यापारियों को ज़्यादा आज़ादी देने के लिए मनाना था.

उस वक्त चीन और ब्रिटेन का दुनिया के बारे में नज़रिया काफ़ी अलग और विपरीत था. दो सौ साल से अधिक समय बीत जाने के बाद काफ़ी कुछ बदल चुका है लेकिन दोंनो का दुनिया के बारे में नज़रिया अब भी एक मुद्दा है.

साल 1793 में दोनों देशों के अलग-अलग नज़रिए, सांस्कृतिक ग़लतफ़हमियों और चीनी सम्राट के सामने लॉर्ड मैक्कार्टनी के झुकने से इनकार की वजह से उनका दौरा विफल रहा.

उस विफल दौरे के बाद के 150 सालों में चीन पर विदेशी आक्रमण हुआ, अफ़ीम युद्धों में ब्रिटेन ने चीन को हराया, चीन को आर्थिक तबाही का सामना करना पड़ा और चीन ने माओ के प्रति दीवानगी का युग भी देखा. चीन को ब्रिटेन से घातक परिणामों के बावजूद अफ़ीम लेते रहने को मजबूर होना पड़ा. और यह ख़तरनाक व्यापार चीन में वामपंथी शासन आने तक जारी रहा.

उतार-चढ़ाव

लेकिन आज चीन उन देशों में से एक है जिसकी सरकार के पास दुनिया भर में निवेश के लिए बहुत बड़ा कोष है. और इस वक्त बीजिंग में एक और ब्रितानी व्यापार मिशन पहुंचा हुआ है जिसका मक़सद बिलकुल अलग है.

ब्रितानी वित्त मंत्री जॉर्ज ऑस्बॉर्न ने कहा, "चीनी अर्थव्यवस्था बदल रही है. जो लोग सोचते हैं कि चीन सिर्फ़ एक कम मज़दूरी देने वाली, तकनीक के लिहाज़ से पिछड़ी अर्थव्यवस्था है, वो ग़लती कर रहे हैं. चीन तकनीक जैसे क्षेत्रों में एक अहम देश बनता जा रहा है और यहां ब्रिटेन के लिए बहुत मौके हैं."

Image caption चीन ब्रिटेन के इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहा है.

लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे और थेम्स वॉटर कंपनी में चीन पहले ही बड़ा निवेश कर चुका है. अब उसकी कई कंपनियां निर्माण, परमाणु ऊर्जा, अक्षय ऊर्जा, संचार और संपत्ति में निवेश कर रही हैं. इनमें से कई चीन की सरकारी कंपनियां हैं.

ये बिलकुल नई बात है. दो सदियों तक ब्रिटेन और चीन के बीच आर्थिक संबंध सिर्फ़ व्यापार तक सीमित था. शुरुआत में ब्रिटेन चीन की चाय, रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन चाहता था लेकिन बदले में उसके पास ऐसा कुछ नहीं था जिसकी ज़रूरत चीन को हो.

18वीं सदी के मैक्कार्टनी मिशन के बाद चीनी सम्राट छियानलॉन्ग ने ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज तृतीय को लिखा था, "जैसा कि आपके राजदूत खुद ही देख सकते हैं कि हमारे पास सब कुछ है. मेरे लिए अनजान या अजीबोग़रीब चीज़ों का कोई महत्व नहीं है और इसलिए बदले में आपके देश में बनी चीज़ें मेरे किसी काम की नहीं हैं."

इसलिए ब्रिटेन ने चीन में अफ़ीम बेचने का तरीका अपनाया जिसके चलते दोंनो देशों में दो युद्ध हुए और जिससे चीन को अपनी अर्थव्यवस्था खोलने पर मजबूर होना पड़ा.

1950 के दशक में चेयरमैन माओ ने एक बार फिर चीन के दरवाज़े बाकी दुनिया के लिए बंद कर दिए जो बीस साल बाद 70 के दशक के आखिरी सालों और 80 के दशक के शुरुआती सालों में डेंग शियाओपिंग के शासन में जाकर खुले.

तब चीन को पता चला कि उनके पास नकद के साथ ही जानकारी की किस हद तक कमी थी. ब्रिटेन चीन को ये दोनों चीज़ें दे सकता था और ये वो अपनी कॉलोनी हॉन्ग कॉन्ग के ज़रिए आसानी से कर सकता था.

चीन का दबदबा

लेकिन 30 साल बाद एक बार फिर हालात बदल गए हैं. चीन को ब्रितानी निर्यात उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ा है जितनी तेज़ी से ब्रिटेन में चीनी कपड़ों, खिलौनों, लैपटॉप और मोबाइल फ़ोनों की मांग बढ़ रही है.

Image caption ब्रिटेन और चीन के बीच आर्थिक नज़दीकियां बढ़ रही हैं.

चीन के साथ ब्रिटेन का व्यापार घाटा इस वक्त सालाना 20 अरब पाउंड है. इसकी एक वजह ये है कि ब्रिटेन की निपुणता सेवा क्षेत्र में है जबकि चीन में कच्चे माल और मशीनों की मांग है.

चीन की सरकार के पास इस वक्त निवेश के लिए 400 अरब डॉलर का कोष है. वहीं अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा ब्रिटेन निवेश के लिए निजी और देशों की सरकार के कोषों की तरफ़ देख रहा है.

इसके चलते पिछले 18 महीने में ब्रिटेन में जितना चीनी निवेश हुआ है उतना पिछले 30 साल में नहीं हुआ था.

लंदन में चीनी दूतावास में अधिकारी, झू शियाओमिंग कहते हैं, "हम कह सकते हैं कि ब्रिटेन दुनिया का सबसे खुला बाज़ार है, ख़ासकर विकास के ढांचे से जुड़े क्षेत्र में और ये चीन के लिए व्यापार के लिए बड़ा मौका है."

लेकिन ब्रिटेन की विकास के ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को चीनी निवेश की ज़रूरत नहीं है.

झू कहते हैं, "ब्रिटेन विचारकों का देश है. जब चीनी उत्पादक और व्यापारी यहां आते हैं तो वे बहुत यहां बहुत कुछ सीख सकते हैं."

इस सप्ताह जब जॉर्ज ऑस्बॉर्न और बॉरिस जॉनसन चीन के साथ व्यापार के मौके ढूंढ रहे हैं और समझौते कर रहे हैं, पिछले दो सौ सालों में चीन और ब्रिटेन के व्यापार संबंधों में उतार-चढ़ावों को इतिहास की विडंबना ही कहा जा सकता है.

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