लंदन डायरी: क्या बिना पासपोर्ट वाले इंसान नहीं होते?

इस महीने के शुरू में इटली के टापू लेम्पेडूसा में 360 लोग डूबकर मर गए लेकिन उनकी मौत पर आँसू बहाने वाला शायद ही कोई था.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए यह ख़बर तो थी लेकिन वैसी नहीं जैसी पक्के पासपोर्ट-वीज़ा वालों के इतनी बड़ी तादाद में मरने पर होती.

बिना पासपोर्ट और वीज़ा के विदेशी ज़मीन पर मौजूद लोगों के लिए यही साबित करना मुश्किल हो जाता है कि वे इंसान हैं.

यहाँ ब्रिटेन में बड़ी तादाद में लोग ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से रहते हैं, सरकार ये बात अच्छी तरह जानती है, अफ्रीकी देशों और दक्षिण एशिया से आए ऐसे हज़ारों लोग हैं जिन्हें यहाँ 'इल-लीगल इमिग्रेंट' कहा जाता है.

ऐसे लोगों को देश से बाहर निकालना एक महँगा और मुश्किल काम है, पिछले दिनों लंदन में एक प्रयोग के तौर पर विवादास्पद गाड़ियाँ घुमाई जा रही थीं जिन पर लिखा था-- ' इफ़ यू आर इल-लीगल इमीग्रेंट, गो होम ऑर फ़ेस अरेस्ट.'

अब ब्रिटेन की गृह मंत्री टेरेसा मे स्वीकार कर रही हैं कि यह प्रचार अभियान एक ग़लती थी और इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया है.

इन गाड़ियों को ख़ास तौर पर उन इलाक़ों में घुमाया जा रहा था, जहाँ भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोगों की आबादी सबसे अधिक है, देश के वाणिज्य मंत्री विंस केबल ने इसे 'मूर्खतापूर्ण हरकत' कहते हुए इसकी आलोचना की थी, कई लोगों ने इसे देश में फूट डालने वाला बताया था.

क़ानूनी इमिग्रेशन है बड़ा मुद्दा

ब्रिटेन के पिछले आम चुनाव में ग़ैर-क़ानूनी ही नहीं, बल्कि क़ानूनी इमिग्रेशन भी एक बड़ा मुद्दा था, तीनों प्रमुख पार्टियों ने घोषणा की थी कि वे बाहर से आकर ब्रिटेन में बसने वाले लोगों की तादाद में कमी लाने के लिए क़दम उठाएँगे.

पिछले दो-तीन सालों में ब्रिटेन में आकर बसना पहले के मुक़ाबले काफ़ी कठिन हो गया है, वीज़ा नियमों में लगातार सख़्ती बढ़ती जा रही है.

लेकिन यह मामला इतना सीधा-सरल नहीं है, अर्थव्यवस्था की हालत ख़राब होते ही, रोज़गार के अवसरों में कमी आते ही, लोगों की नज़र सबसे पहले आप्रवासियों पर जाती है, दूसरी ओर बहुत सारे काम धंधे ऐसे हैं जो आप्रवासियों के दम पर चलते हैं.

अहम बात ये भी है कि ब्रिटेन उन देशों में है, जिसने अपनी अर्थव्यवस्था को चलाए रखने के लिए इमिग्रेशन को लगातार बढ़ावा दिया है, अब लंदन एक ऐसा शहर है जहाँ मूल निवासी गोरे आप्रवासियों की तुलना में अल्पसंख्यक हो चुके हैं.

टाटा इस देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियाँ देने वाली सबसे बड़ी कंपनी है, इस देश के सबसे अमीर लोगों में कई भारतीय शामिल हैं, ऐसे में आप्रवासियों के बारे में धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल का विरोध होना स्वाभाविक है.

विवाद की मुख्य वजह ये है कि देश को चलाने में अहम योगदान देने वाले क़ानूनी अप्रवासियों को बुरा न लगे, जिनके पास वीज़ा पासपोर्ट पक्का नहीं है उनसे निबटने का कोई और ठोस तरीक़ा खोजा जा रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार