दो पाटों के बीच फंसी इमरान की पार्टी

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आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तान के जिन इलाकों में जहां सशस्त्र संघर्ष चल रहा है, वहीं चरमपंथियों के ख़िलाफ़ बोलने पर जान का ख़तरा होता है.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान से लगते ख़ैबर पख़्तून ख़्वाह प्रांत के क़ानून मंत्री सरदार इसरारुल्लाह गंदरपुर की हत्या के बाद यह सच नहीं लगता. उन्होंने पाकिस्तानी तालिबान या किसी अन्य चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कभी कुछ नहीं बोला.

इसके बावजूद एक आत्मघाती बम विस्फ़ोट में उन्हें 16 अक्टूबर को मार डाला गया, जब कुर्बानी का त्यौहार ईद-उल-अज़हा मनाया जा रहा था.

दक्षिणी वज़ीरिस्तान के संघर्षरत कबाइली इलाके से लगते डेरा इस्माइल ख़ान ज़िले में जब 38 साल के इसरारुल्लाह हुजरा (पुरुष अतिथिगृह) में मेहमानों का स्वागत कर रहे थे, तब आत्मघाती हमलावर ने उनके गले लगकर विस्फोट कर लिया.

रहस्यमयी चरमपंथी समूह अंसार-उल-मुजाहिदीन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है. इसके प्रवक्ता अबु बशीर ने अज्ञात स्थान से पत्रकारों को किए गए फ़ोन में गंदरपुर की हत्या के लिए तीन अलग वजहें बताईं.

पश्चिमी सूट

पहली यह कि हमला जुलाई 2013 में डेरा इस्माइल ख़ान की केंद्रीय जेल में मारे गए लोगों का बदला है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ हमलावरों ने जेल पर धावा बोलकर 200 से ज़्यादा कैदियों को छुड़ा लिया था जिनमें कई दर्जन चरमपंथी भी थे.

दूसरा गंदरपुर एक 'धर्मनिरपेक्ष' राजनेता थे जो पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेटर इमरान खान की 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ से जुड़े हुए थे.

Image caption इसरारुल्लाह को चरमपंथी धर्मनिरपेक्ष मानते थे और उनकी हत्या की एक वजह यह भी थी.

तीसरा, चरमपंथी तब तक सुरक्षा बलों, कानून लागू करने वाली संस्थाओं और सरकारी अधिकारियों पर हमले करते रहेंगे जब तक कि अमरीकी ड्रोन पाकिस्तान के कबाइली इलाक़ों में मिसाइल हमले नहीं रोक देते.

अगर पाकिस्तान के आम चुनाव के लिहाज से देखा जाए तो ज़्यादातर पाकिस्तानी धर्मनिरपेक्ष हैं क्योंकि चुनावों में धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों की जीत हुई है.

अगर चरमपंथियों को धर्मनिरपेक्ष होना एक अपराध लगता है तो उन्हें उन सभी को ख़त्म करना होगा.

गंदरपुर इसी नाम के पाकिस्तानी कबीले से थे और दिवंगत मुख्यमंत्री सरदार इनायतुल्लाह गंदरपुर के बेटे थे. राजनीति में होने के बावजूद बड़े गंदरपुर अपने विरोधी लोनी कबीले के साथ सालों तक खूनी जंग लड़ते रहे थे.

डेरा इस्माइल ख़ान और पेशावर में गोलीबारी के कई निशानों वाली उनकी बुलेट प्रूफ़ टोयोटा जीप कभी भी देखी जा सकती थी.

पश्चिमी सूट और हैट के साथ वो सलवार-कमीज़ और कभी-कभी पगड़ी पहने पठानों के बीच अलग नज़र आते थे.

अब दिवंगत हो चुके उनके बेटे भी कभी-कभी पश्चिमी सूट पहनते थे, ज़ाहिर है चरमपंथी इससे भड़कते थे और इसे उनके धर्मनिरपेक्ष होने का सबूत मानते थे.

निशाने पर पीटीआई

गंदरपुर को कानून और संसदीय मामलों की अच्छी जानकारी थी और यही वजह है कि पीटीआई ने ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें मंत्री बना दिया था हालांकि 13 मई, 2013 को उन्होंने चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा था और चुनाव के बाद इमरान ख़ान की पार्टी में शामिल हुए थे.

Image caption इमरान ख़ान और उनकी पार्टी चरमपंथियों पर हमले रोकने और उनसे वार्ता की पैरोकार है

इमरान ख़ान मोहम्मद और फ़रीद ख़ान के बाद वो तीसरे विधायक हैं, जिनकी पिछले पांच महीने में चरमपंथ प्रभावित इस प्रांत में हत्या कर दी गई है.

विडंबना यह है कि तीनों ही निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे और बाद में पीटीआई में शामिल हो गए थे ताकि वह अपने क्षेत्र के विकास के लिए सरकार का समर्थन और विकास निधि हासिल कर सकें.

इमरान ख़ान चरमपंथियों से वार्ता और कबाइली इलाकों में सैन्य अभियान रोकने के मजबूत पैरोकार हैं. लेकिन उन पर और उनकी पार्टी पर चरमपंथियों के प्रति नरम रवैये के आरोप के बावजूद पीटीआई पाकिस्तानी तालिबान के निशाने पर है.

पीटीआई यकीकन दुविधा में है क्योंकि चरमपंथी उसे धर्मनिरपेक्ष मानते हैं और इसलिए उस पर हमले कर रहे हैं जबकि वह केंद्र की नवाज़ शरीफ़ सरकार पर एक दशक लंबे संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए वार्ता करने पर ज़ोर डाल रही है.

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