तालिबानियों के बीच पुरुषों पर भारी महिला कमांडर

कैप्टन ऐश्ले कोलेट अफ़ग़ान सीमा पर तैनात अपनी टुकड़ी में शामिल इकलौती महिला थीं जिन पर यूनिट संभालने की जिम्मेदारी भी थी.

कनाडाई सेना में हर नौकरी महिलाओं को बराबरी के मौके देती है, जहां महिलाएं बराबरी से पुरुषों के साथ खड़ी और मुस्तैद नज़र आती हैं.

कैप्टन ऐश्ले कोलेट और उनकी 60 पुरुषों की टुकड़ी को जब कंधार के नजदीक नाखोने में तैनात किया गया, उसके पहले ही दिन से उन्हें लगातार चरमपंथियों के हमले का सामना करना पड़ा.

वह बताती हैं, "हमारी मौजूदगी दुश्मनों को पसंद नहीं आई."

हालाँकि उन्हें पहले ही दिन अंदाज़ा हो गया था कि अगले कुछ महीनों तक उनकी दिनचर्या कैसी रहने वाली है.

फर्स्ट रॉयल कनाडाई रेजीमेंट की बहादुर कंपनी पर दिन में दो हमले तो होते ही थे. कई बार सैनिकों पर पेट्रोलिंग करने के दौरान हमले होते थे तो कई बार उनके कैंप पर.

हमले इतने नियमित अंतराल पर होते कि इन सैनिकों का निकनेम 'कॉन्टैक्ट ओक्लॉक' पड़ गया था.

इन हमलों के बारे में बात करते हुए कोलेट कहती हैं, "गोलियां आसमान और पहाड़ों से चमकती हुई हमारी ओर आती थीं. कई हमले इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस से हुए तो कई बार आत्मघाती दस्तों का सहारा भी लिया गया."

ख़ास दोस्त की मौत

इसी साल 21 जून को पलटन में तैनात इंजीनियर जिम्मी मैकनिल तब मारे गए जब वह पैदल गश्त लगा रहे थे. वह अपनी टुकड़ी में बेहद लोकप्रिय थे, दयालु थे और कोलेट के नजदीकी दोस्त थे.

मैकनिल की मौत के वक्त कोलेट बेहद व्यस्त थीं और उन्हें दिन भर में वक्त ही नहीं मिल पाया, अपने दोस्त के खोने का गम सीने में उन्होंने दबाए रखा. दिन बीतने के बाद वह कैंप के बाहर रेत पर जाकर बैठ गईं.

उस अनुभव के बारे में कोलेट ने बताया, "तब छह महीने बाक़ी थे, मैं सोच रही थी कि मैं ख़ुद को कैसे संभालूँ और उन साठ लोगों को कैसे संभालूँ जो इस हादसे से टूट चुके थे."

तब उनकी टुकड़ी के दो सैनिक भी उनके पास जाकर बैठे. कोलेट के दोनों तरफ उनके साथी बैठे थे लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा था.

कोलेट को मालूम था कि उन्हें भी कुछ बोलने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनके साथी उनका दुख समझ रहे थे.

सेना का उच्च सम्मान

मगर कोलेट ने अपनी यूनिट को संभाले रखा. जब वह अफ़ग़ानिस्तान से लौटीं तो उन्हें कनाडा कs सबसे उच्च सैनिक सम्मानों में से एक मेडल ऑफ़ मिलिट्री वेल्यूर से सम्मानित किया गया.

उन्हें अपनी यूनिट के नेतृत्व के लिए सम्मानित किया गया था, हालांकि वह इसका श्रेय अपनी पूरी यूनिट को देती हैं.

कनाडा की सेना में करीब 12 फ़ीसदी सैनिक महिलाएं हैं और उन्हें 1989 से ही युद्ध क्षेत्र में तैनात किया जाता रहा है.

मौजूदा समय में ब्राज़ील और अमरीका में इस बात की कोशिश हो रही है कि महिलाओं को भी युद्ध क्षेत्र में तैनात करने की व्यवस्था हो.

ब्रिटेन में अभी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है लेकिन अगले पांच साल के दौरान यहां भी सैन्य नीति की समीक्षा होगी.

युद्ध क्षेत्र में महिला सैनिकों की तैनाती का विरोध करने वाले कई लोग यह तर्क देते हैं कि महिलाएं अपने घायल सैनिकों को उठाकर सुरक्षित बाहर नहीं निकल सकतीं.

किसी से कमतर नहीं

कोलेट कहती हैं कि उन्हें भी हर साल सैनिकों को उठाने वाले या खींचने वाले अभ्यास से गुजरना होता था.

वैसे किसी भी सैन्य टुकड़ी की सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है टीम में सामंजस्य पैदा करने की. परंपरागत तौर पर इसके लिए एक साथ प्रशिक्षण, एक साथ खाना और एक ही कमरे में सोने की तरकीबों को अपनाया जाता है.

कनाडाई महिला सैनिकों को जब सैन्य क्षेत्र में तैनात किया गया तो पहले वे पुरुषों से अलग रहती थीं.

लेकिन इससे टीम में सामंजस्य पैदा नहीं हुआ. अब हालात बदल गए हैं. अब पुरुष और महिला सैनिक एक दूसरे के साथ घुले-मिले नज़र आते हैं और एक ही बोर्डिंग में सोते हैं.

वैसे यह इतना आसान भी नहीं होता लेकिन इन मुश्किलों का सामना कोलेट ने सहजता से किया. जब यूनिट के पुरुष साथी शॉर्ट पैंट पहनते थे, तब वो पायजामा पहना करतीं थीं.

कनाडा में ट्रेनिंग के दौरान कोलेट अलमारी में जाकर कपड़े बदलती थीं, कई बार स्लीपिंग बैग के अंदर जाकर कपड़े बदलती थीं.

इन अनुभवों के बारे में कोलेट व्यंग्यात्मक अंदाज़ में बताती हैं, "यूनिट में सामान्य तौर पर मैं इसी तरकीब को अपनाती थी."

वो हादसा

लेकिन एक वाकया ऐसा हुआ जिसका जिक्र करते हुए कोलेट बताती हैं, "एक दिन स्लीपिंग बैग मेरे हाथ से फिसल गया और मैं अपनी ब्रा और निकर में स्तब्ध खड़ी रह गई. ऐसी सूरत में किसी ने पीछे से कहा कि ऐश्ले को देखो. और सारे पुरुष हंसने लगे."

कोलेट बताती हैं, "मुझे भी उनके साथ हंसना पड़ा, मैं क्या कर सकती थी. मैंने स्लीपिंग बैग उठाया और कपड़े बदले. बाकी सब भी अपने-अपने काम में लग गए क्योंकि हमारी दूसरी चिंताएं ज़्यादा थीं."

अफ़गानिस्तान में कोलेट 10 फीट गुना 15 फीट के कमरे में दस सैनिकों के साथ रहतीं थी, इनमें जब किसी को निजी पल चाहिए होते थे, तो उन्हें अपने साथियों से कहना होता था.

कोलेट कहती हैं कि जब आप छोटे से कमरे में कई पुरुषों के साथ लंबे समय तक रहते हैं तो वे भाई जैसे हो जाते हैं.

हालांकि कई बार दूसरी टुकड़ी के सैनिक आते तो वे कुछ ना कुछ कमेंट कर देते, ऐसी स्थिति में कोलेट की टुकड़ी के सैनिक उन्हें टोकते हुए कहते कि अपने कमेंट अपने पास रखो, कोलेट हमारी कमांडर हैं.

सेना में वापसी का इरादा

जब कोलेट अफ़ग़ानिस्तान लौटीं तो कई पुरुषों ने उनसे आकर कहा कि शुरुआत में वे उन्हें लेकर चिंतित थे लेकिन अब वे कहीं भी उनके नेतृत्व में जाने को तैयार हैं.

अपने काम के बारे में कोलेट कहती हैं, "मैं हमेशा दूसरा मौका देने में यकीन रखती हूं और काफी लोकतांत्रिक हूं और अपने निम्नतम रैंक वाले सैनिकों की बात भी सुनती हूं."

हालांकि तुरंत कोलेट कहती हैं कि जरूरत पड़ने पर वह सख्ती दिखाना भी जानती हैं.

अफ़गानिस्तान में स्थानीय नेताओं से तालमेल बिठाने में कोलेट को बहुत मुश्किल हुई. वह कहती हैं, "वे लोग तो मेरी सुनते भी नहीं थे. वे मेरा मज़ाक उड़ाते थे."

कोलेट पंजवाई के उस जिले में तैनात थीं जहां तालिबान की शुरुआत हुई लेकिन कोलेट स्थानीय बच्चों, ख़ासकर लड़कियों में काफी लोकप्रिय थीं.

अफ़गानिस्तान से लौटने के बाद कोलेट ने शादी की और अभी छुट्टियों पर हैं. इस दौरान वे सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर कर रही हैं लेकिन उनका इरादा जल्द ही मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के तौर पर सेना में वापसी करना है.

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