बच्चे जिन्होंने कर दिया चीनियों को हैरान

जैकी बाल्डविन
Image caption जैकी भी रिचमॉन्ड वेस्ट स्कूल में पढ़ती है

ऑस्ट्रेलिया में राजनेता हमेशा एशिया के साथ बेहतर रिश्ते कायम करने पर ज़ोर देते हैं. सभी सरकारें ऐसे स्कूलों की संख्या बढ़ाने का वादा करती हैं जहां एशियाई भाषाएं पढाई जाएं, इसके बावजूद हाई स्कूल स्तर पर एशियाई भाषा सीखने वाले छात्रों की संख्या घट रही है. बीबीसी संवाददाता जॉन डोनिसन पहुंचे ऑस्ट्रेलिया के चंद बहुभाषी स्कूलों में से एक में.

अपनी क्लास में बैठी पांच साल की जैकी बाल्डविन किसी गहरी सोच में है. सुनहरे बालों और गुलाबी चश्मे वाली इस बच्ची के हाथ तभी उसकी नोटबुक पर बड़े सधे हुए अंदाज में चलते हैं और आपको कागज पर चीनी भाषा में लिखी एक लाइन देखने को मिलती है.

मैं इसमें सिर्फ बीबीसी पहचान पाया क्योंकि सिर्फ यही अंग्रेजी में लिखा था.

जैकी मेरे लिए उस लाइन का अनुवाद करती है, “आज हमारे स्कूल में बीबीसी वाले आए हैं.”

जैकी मेलबर्न के रिचमॉन्ड वेस्ट प्राइमरी स्कूल के अंग्रेजी और चीनी कार्यक्रम का हिस्सा हैं.

जैकी अपनी क्लास के 23 बच्चों में से ज्यादातर की तरह कुछ ही महीनों से चीनी भाषा सीखने लगी है, लेकिन जब आप उसे अपने दोस्तों के साथ चीनी और अंग्रेजी मिक्स भाषा में बोलते और खेलते देखते हैं तो आपको इस बात का अहसास ही नहीं होता है.

किम लिम को इस स्कूल में पढ़ाते हुए लगभग 20 साल हो गए हैं. उनका कहना है, “जिनती छोटी उम्र में वो दूसरी भाषा के तौर पर चीनी सीखना शुरू करते हैं, इसे सीखना उनके लिए उतना ही आसान होता है.”

चीनी भाषा पर पकड़

ये एक सरकारी स्कूल है जिसमें 23 अलग अलग जातीय समूहों और पृष्ठभूमि वाले बच्चे पढ़ते हैं.

इनमें से कुछ बच्चे एशियाई देशों से हैं जिन्हें ऑस्ट्रेलिया में गोद लिया गया है और उनकी परवरिश ऐसे परिवेश में हो रही है जहां अग्रेजी पहली भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है. ये बच्चे अब चीनी भाषा पर पकड़ मजबूत कर रहे हैं.

इस स्कूल में चीनी भाषा की तरह वियतनामी भी पढ़ाई जाती है लेकिन ये कोर्स शुरुआती चरण में ही जिसका स्कूल विस्तार करना चाहता है.

इस स्कूल में छह वर्ष तक चीनी भाषा सीखने के बाद जब छात्र यहां से निकलते हैं तो उम्मीद की जाती है कि वो चीनी भाषा बोलने और पढ़ने में पारंगत होंगे.

Image caption हैरी बताते हैं कि उन्हें चीन दौरे में बहुत मज़ा आया

इस स्कूल में पढ़ चुके कुछ छात्रों ने हाल ही में चीन का दौरा किया.

12 वर्षीय हैरी फ्लिन किचेन कहते हैं, “जब मैं वहां दुकान पर कुछ खरीदने गया और मैंने कहा, ‘ये कितने का है’ और ‘शुक्रिया’ तो ये सुन कर उन्हें बहुत अच्छा लगा, वो बोले, ‘वाह, क्या बात है आप चीनी भाषा बोल रहे हैं.’”

12 वर्ष की ही जॉर्जिया केलेट का कहना है, “उन्हें बहुत हैरानी हुई. उन्हें कभी कभार ही सुनहरे बालों वाली ऐसे लड़की दिखती है जो फ़र्राटे से चीनी भाषा बोलती हो.”

अपवाद

अगर ऑस्ट्रेलिया में सभी स्कूल इसी तरह के हों, तो आप कह सकते हैं कि ये देश बहुभाषी होने के रास्ते पर है. लेकिन रिचमॉन्ड स्कूल अपने आप में एक अपवाद है.

स्कूल के प्रिंसीपल ल्योड मिचेल कहते हैं, “देश भर में मुश्किल से दस ऐसे स्कूल होंगे जहां बच्चों को एशियाई भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं.”

मेलबर्न यूनिवर्सिटी में चीनी अध्यापक ट्रेनिंग केंद्र की निदेशक डॉ. जेन ओर्टन का कहना है कि बहुत से प्राइमरी स्कूलों में एशियाई भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, लेकिन हफ्ते में एक बार सिर्फ आधे घंटे के लिए, लेकिन इससे भाषा सीखने में कोई खास मदद नहीं मिलती हैं.

ऐसे बच्चे जब हाई स्कूल स्तर तक पहुंचते हैं तो उनमें से ज्यादातर एशियाई भाषाओं की पढाई छोड़ देते हैं क्योंकि उनके लिए इसे आगे बढ़ा पाना मुश्किल होता है.

लेबर पार्टी की पिछली सरकार ने प्रस्ताव रखा था कि ऑस्ट्रेलिया में हाई स्कूल स्तर के हर बच्चे को 2025 तक एशियाई भाषा सीखने का मौका मिलना चाहिए.

'अवसर खो देगा ऑस्ट्रेलिया'

Image caption जॉर्जिया कहते हैं कि चीनी लोग उन्हें चीनी भाषा बोलते देख बहुत हैरान हुए

मौजूदा सरकार का कहना है कि अगले दस साल के दौरान हाई स्कूल स्तर के 40 फीसदी बच्चों को कोई विदेशी भाषा सीखनी चाहिए. अभी ऐसे बच्चों की संख्या लगभग 12 फीसदी के आसपास है.

हालांकि कुछ लोग राजनेताओं पर खोखले वादे करने के आरोप लगाते हैं.

अनुमान है कि हाई स्कूल स्तर के 40 फीसदी बच्चों को 2023 तक एशियाई भाषा सिखाने पर दो अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की रकम खर्च होगी.

ज्यादातर ऑस्ट्रेलियाई मानते हैं कि एशिया के साथ रिश्ते बढ़ाना आर्थिक रूप से फायदेमंद है.

मिचेल का कहना है, “व्यापारिक, बौद्धिक संपत्ति और संस्कृतिक दृष्टिकोण से एशिया के साथ संपर्क बढ़ाना बहुत जरूरी है. अगर हम इस अवसर का उपयोग नहीं करते हैं तो कोई और इसका इस्तेमाल करेगा.”

उनके अनुसार, “मुझे लगता है कि अन्य देश इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमसे ज्यादा मेहनत कर रहे हैं. अगर ऑस्ट्रेलिया ने साहसी कदम नहीं उठाया तो वो इस अवसर को गंवा देगा.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार