चिथड़ा-चिथड़ा ज़िंदगी को सिलती पाकिस्तानी विधवाएं

पाकिस्तानी विधवा

पाकिस्तान के चरमपंथ प्रभावित ख़ैबर पख़्तूनख्वा सूबे के एक गांव शेरपाओ में साल 2007 में ईद के समारोह के दौरान हुए एक बम विस्फ़ोट ने पूरे गांव को तोड़कर रख दिया था.

इस धमाके में गांव के सभी पुरुष मारे गए थे और अपने पीछे 22 विधवाएं और बच्चे छोड़ गए.

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यहाँ के बेहद संकीर्ण समाज में घर के किसी पुरुष के बिना जीना क़रीब-क़रीब असंभव है.

इसलिए गांव में खुले एक सिलाई केंद्र में ये महिलाएं सिलाई करना सीख रही हैं ताकि अपनी ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ा सकें.

फ़्रंटियर इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी नाम के इस सिलाई केंद्र में इस वक़्त 20 महिलाएं हैं.

केंद्र के संयोजक इमरान यूसुफ़ कहते हैं, "यहां हमने बहुत सी महिलाओं को प्रशिक्षण दिया है और अब वह अपने घर पर सिलाई-कढ़ाई करके ठीक-ठाक कमाई कर रही हैं."

हौसला

Image caption सिलाई केंद्र के संयोजक का कहना है कि सिलाई सीखकर महिलाएं गुज़ारे लायक कमा लेती हैं.

मीना गुल, उन महिलाओं में से एक है जो इस केंद्र में सिलाई करना सीख रही हैं.

एक साल पहले पति की मौत होने के बाद सरकार से उन्हें करीब एक लाख रुपये (पाकिस्तानी रुपये) की सहायता मिली थी, लेकिन वह जल्दी ही ख़त्म हो गए थे.

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उसके बाद से वह या दो दूसरों की दया पर निर्भर थीं या फिर दूसरों के घरों में सफ़ाई का काम करती थीं.

मीना कहती हैं, "ज़िंदगी बहुत मुश्किल है. बच्चों का अभिभावक नहीं है. मैं लोगों के घरों में काम करती हूं और बमुश्किल गुज़ारा कर पाती हूं. मैं जो कुछ कमाकर ला पाती हूं बच्चों को दे देती हूं. जब इनके पिता ज़िंदा थे, तब भी हम अमीर नहीं थे- लेकिन हम ख़ुश थे."

लेकिन सिलाई सीखने के बाद अब उम्मीद की एक किरण जगी है. हालांकि अब भी वो दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही हैं लेकिन हौसला जगने लगा है.

वह कहती हैं, "पहले मैं बच्चों के कपड़े सिलने के लिए पैसे देती थी, जो अब नहीं देने पड़ते. अब लोग मेरे पास कपड़े सिलवाने आते हैं. हालांकि मैं सिर्फ़ 25-30 रुपये ही कमा पाती हूं लेकिन इससे ज़िंदगी आसान हो गई है. अपने मेहनत से पैसा कमाना- मांगने से अच्छा होता है."

सिलाई सीखने से मीना और उसकी जैसी कई विधवाओं के लिए सम्मानपूर्वक जीने की राह खुली है. इस इलाके के सामाजिक जीवन में यह एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है.

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