क़र्ज़ चुकाने के लिए बांग्लादेशी बेच रहे हैं गुर्दा

एम आर हुसैन, बांग्लादेश

बांग्लादेश की माइक्रोफाइनेंस (अल्पराशि की वित्तीय मदद) क्रांति की पूरी दुनिया में चर्चा हुई लेकिन अब इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं. पत्रकार सोफ़ी कज़िन ने बांग्लादेश के एक गाँव का दौरा किया जहाँ इस तरह के उधार चुकाने के लिए लोग अपनी किडनी तक बेच रहे हैं.

ग़रीबों के लिए अपने शरीर के अंग बेचना कोई नई बात नहीं है. लेकिन कम लोगों को मालूम है कि शरीर के अंग बेचने वाले कई लोग माइक्रोक्रेडिट देने वालों का उधार चुकाने के दबाव में अपने अंग बेच रहे हैं.

माइक्रोक्रेडिट की व्यवस्था मूलतः बेहद ग़रीबी में जी रहे लोगों को छोटी राशि के उधार देकर ग़रीबी से उबारने के लिए थी. क्योंकि इन लोगों के पास बड़े बैंकों से उधार लेने के लिए ज़रूरी पात्रता नहीं होती. इस तरह की योजना का उद्देश्य था कि इन छोटे उधार की सहायता से ग़रीब लोग आत्मनिर्भर बन सकेंगे, ख़ासतौर पर महिलाएँ.

जोतपुरहट ज़िले में स्थित कलई गाँव बांग्लादेश की राजधानी ढाका से महज़ छह घंटे की दूरी पर है. पहली नज़र में यह एक आम ख़ुशनुमा गाँव प्रतीत होता है.

लाखों बांग्लादेशियों की तरह यहाँ के गाँववालों का जीवन भी दैनिक जीवन के संघर्षों की जद्दोजहद में गुज़रता है. गाँव के कई लोगों ने जब ग़रीबी से उबरने के लिए माइक्रोक्रेडिट (अल्प राशि का उधार) देने वालों से उधार लिया तो यह उनके जी का जंजाल बन गया. कई लोग यह उधार चुका नहीं पाए.

परिणामस्वरूप इनमें से कई ने यह उधार अपने शरीर के अंग बेचकर चुकाए.

गुर्दा बिक्री

बांग्लादेश में अंग बेचना क़ानूनी अपराध है बशर्ते किसी पारिवारिक सदस्य को स्वेच्छा से अंगदान न किया जा रहा हो.

कलई गाँव के निवासी 33 वर्षीय मोहम्मद अख़्तर आलम के उदर पर 15 इंच लंबे चीरे का निशान है. उनका गुर्दा निकाला जा चुका है. इस ऑपरेशन के बाद सही तरीक़े से देखभाल न होने के कारण वो आंशिक रूप से विकलांग हो चुके हैं. उनकी एक आँख से दिखता नहीं है और वो कोई भारी सामान भी नहीं उठा पाते.

अपना ख़र्च चलाने के लिए आलम एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं.

कुछ साल पहले आलम ने माइक्रोक्रेडिट देने वाले आठ ग़ैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) से उधार लिया था.

आलम बताते हैं, "मेरे ऊपर क़रीब एक लाख टका उधार था. मैं एनजीओ वालों को पैसे नहीं लौटा पा रहा था. मैं उधार चुकाने के लिए फ़र्नीचर और किराना का सामान बेचता था."

आलम एक एनजीओ से लिए उधार को चुकाने के लिए दूसरे-तीसरे एनजीओ से उधार लेते गए और इस तरह उधार के चक्रव्यूह में फंसते गए.

एक दलाल ने उन्हें इससे मुक्त होने के लिए गुर्दा बेचने के लिए प्रेरित किया. उसने कहा कि इसके लिए उन्हें चार लाख टका मिलेंगे.

ढाका के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराने के बाद जब आलम घर लौटे तो वो अधमरे जैसे थे. उन्हें जितने पैसे देने का वादा किया गया था उन्हें उसका भी नाममात्र ही मिला था.

आलम कहते हैं, "मैं गुर्दा बेचने के लिए इसलिए तैयार हो गया क्योंकि मैं एनजीओ से लिया गया पैसा नहीं चुका सकता था. हम ग़रीब और असहाय हैं इसलिए हम ऐसा करने पर मजबूर हैं. मुझे इसका गहरा अफ़सोस है."

कलई के ही निवासी मोहम्मद मोकर्रम हुसैन भी माइक्रोक्रेडिट के शिकार हैं.

भारत में ऑपरेशन करा कर गए मोकर्रम अपने उदर पर लगा चीरे का निशान दिखाते हुए कहते हैं, "मैंने तय कर लिया था कि मुझे एनजीओ वालों का उधार चुका देना है. डॉक्टर ने कहा कि इसमें कोई ख़तरा नहीं है लेकिन अब मैं कोई भारी काम नहीं कर पाता."

उधार का दुष्चक्र

Image caption मोहम्मद अख़्तर आलम को भी क़र्ज़ चुकाने के लिए अपना गुर्दा बेचना पड़ा.

बांग्लादेश की माइक्रोक्रेडिट व्यवस्था को लाखों ग़रीबों की उद्धारक व्यवस्था के रूप में प्रचारित किया जाता है. इस तरह के उधार में कोई छिपी हुई शर्त इत्यादि नहीं होती और इससे ग़रीब लोगों को आयपरक कामों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है.

लेकिन उधार लेने वाले इसे चुकाएंगे कैसे इसके बारे में किसी सुनियोजित व्यवस्था का अभाव है. उधार लेने वाले व्यक्ति ने कितनी जगहों से उधार लिया है इसकी जाँच की भी लगभग कोई व्यवस्था नहीं है.

परिणामस्वरूप उधार लेने वाले के लिए यह एक दुष्चक्र सा बन जाता है. वो एक के बाद दूसरा उधार लेता है. दूसरी जगहों से लिए गए उधार से कुछ जगहों के उधार चुकाता है, कुछ का चुकाना रह जाता है और अंततः उन्हें अपने अंग बेचने पड़ते हैं.

मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपॉलोजी विभाग के प्रोफ़ेसर मुनीर मुनीरुज़्जमां पिछले 12 सालों से बांग्लादेश में मानव अंगों के व्यापार का अध्ययन कर रहे हैं.

प्रोफ़ेसर मुनीर के अनुसार, "बहुत सारे लोग एनजीओ से लिए गए उधार में उलझ जाते हैं. चूँकि वो उधार चुका नहीं सकते इसलिए उनके पास इससे मुक्त होने का एक ही रास्ता बचता है, वो है अपना गुर्दा बेचना."

बांग्लादेश के अंग व्यापार के अध्ययन के दौरान प्रोफ़ेसर मुनीर ने जिन 33 गुर्दा बेचने वालों का साक्षात्कार किया था उनमें से कई ने एनजीओ से लिए गए उधार को चुकाने के लिए अपना गुर्दा बेचा था.

प्रोफ़ेसर मुनीर का आरोप है कि ग्रामीण बैंक और बीआरएसी समेत कई संस्थान उधार लेने वालों पर तरह-तरह के दबाव बनाते हैं. वो कई बार क़र्ज़दार के घर के बाहर दिन-दिन भर बैठे रहते हैं, गाली-गलौज करते हैं और पुलिस में मुक़दमा दर्ज कराने की धमकी देते हैं.

प्रोफ़ेसर मुनीर बताते हैं, "एक अंग विक्रेता ने उन्हें बताया कि एनजीओ वालों की वजह से वो एक साल तक अपने गाँव से भागा रहा. और अंततः एनजीओ वालों के सामाजिक और आर्थिक दबाव के असहनीय हो जाने के बाद उसने गुर्दा बेचने का फ़ैसला किया."

ग्रामीण बैंक ने इस तरह का दबाव बनाने के आरोप से इनकार किया. बैंक ने बताया कि उसने किसी भी क़र्ज़दार के ख़िलाफ़ कभी भी मुक़दमा नहीं दर्ज कराया है.

ग्रामीण बैंक के कार्यकारी प्रबंध निदेशक मोहम्मद शाहजहाँ ने बीबीसी से कहा, "हमें मुक़दमे दर्ज कराने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि हम उधार न चुकाने पर कोई दंड नहीं लगाते. क़र्ज़दार जब चाहे क़र्ज़ चुकाने की समय सीमा को बढ़ा सकता है. उसके ऊपर कोई दबाव नहीं होता."

बांग्लादेश की सबसे बड़ी विकासपरक संस्था बीआरएसी के विश्लेषक मोहम्मद अरीफ़ुल हक़ कहते हैं, "हमारे काम में यह नहीं होता क्योंकि हम अपने क़र्ज़दारों पर कोई अतिरिक्त दबाव नहीं बनाते."

इसमें कोई शक नहीं कि माइक्रोक्रेडिट ने पूरी दुनिया में लाखों लोगों को ग़रीबी से उबारा है. लेकिन अमीरों और ग़रीबों के बीच खाई बढ़ी है और जो बेहद ग़रीब हैं वो कई बार अपने शरीर के अंग बेचने की हद तक चले जाते हैं. लेकिन अफ़सोस है कि वो इसके दीर्घकालीन दुष्परिणामों से वाक़िफ़ नहीं होते.

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