पाकिस्तान से बाहर जाने की फ़िराक़ में मुशर्रफ़

परवेज़ मुशर्रफ़

पाकिस्तान की दो बार प्रधानमंत्री रहीं बेनज़ीर भुट्टो, बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब अकबर बुग्ती और लाल मस्जिद, इस्लामाबाद के मौलवी अब्दुर रशीद ग़ाज़ी की हत्या के षड्यंत्र में ज़मानत पक्की हो जाने के बाद से ही पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने देश से बाहर जाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं.

उन्होंने सिंध हाईकोर्ट में अपना नाम बाहर जाने वालों की सूची (एग्ज़िट कंट्रोल लिस्ट- ईसीएल) से बाहर निकलवाने की अर्ज़ी दाख़िल की.

अदालत ने उनका नाम इसी साल मार्च में इस सूची में इसलिए डाला था कि क्योंकि उनके ख़िलाफ़ गंभीर आपराधिक मामले हैं.

उनके वकीलों की दलील थी कि मुशर्रफ़ को संयुक्त अरब अमीरात के दुबई में अपनी 95 वर्षीय बीमार मां को देखने जाना है.

पाकिस्तान के सबसे घने बसे शहर कराची में स्थित सिंध हाईकोर्ट ने सरकार को इस पर 18 नवंबर तक जवाब दाख़िल करने को कहा है.

लंबी क़ानूनी लड़ाई

ईसीएल से मुशर्रफ़ का नाम हटाने के किसी भी फ़ैसले को नवाज़ सरकार को लागू करना होगा. हालांकि अभी यह साफ़ नहीं है कि क्या सरकार उनका नाम फिर से ईसीएल में रख सकती है या नहीं क्योंकि मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ दो बार संविधान को ताक पर रख कर देशद्रोह करने की भी जांच की जानी है.

नवाज़ सरकार के अनुसार ऐसा पहली बार तब हुआ था जब 12 अक्तूबर, 1999 को मुशर्रफ़ ने सैन्य तख़्तापलट किया था और दूसरी बार तब जब तीन नवंबर, 2007 को आपातकाल लागू किया था.

मुशर्रफ़ 24 मार्च, 2013 को क़रीब चार साल का स्व-निर्वासन ख़त्म कर आम चुनावों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान लौट आए थे.

यह उन्होंने अपने समर्थकों की इच्छा के विरुद्ध किया था जिन्हें लगता था कि उन्हें कई मामलों में गिरफ़्तार किया जा सकता है या फिर अपने गढ़ में सैन्य कार्रवाई की इजाज़त देने से नाराज़ तालिबान अपनी धमकी के अनुसार उनकी हत्या कर सकता है.

बलूचिस्तान के पहाड़ों में बुग्ती के छुपने के स्थान पर सैनिक छापे में 26 अगस्त, 2006 को मारे जाने के ख़िलाफ़ बुग्ती के परिवार ने सार्वजनिक रूप से मुशर्रफ़ की हत्या करने वाले को नक़द इनाम देने का ऐलान किया था.

अपनी छवि के अनुसार मुशर्रफ़ ने इन धमकियों की परवाह नहीं की और अपने घर कराची आ गए, हालांकि उनके समर्थकों की ओर से मिले ठंडे स्वागत ने उनके उत्साह को हल्का कर दिया और भारी जनसमर्थन के दावों की पोल खोल दी.

मुशर्रफ़ की संसदीय चुनाव जीतने की उम्मीदें उस वक़्त धराशाई हो गईं जब कई जगह से भरे गए उनके नामांकन को रद्द कर दिया गया.

उनकी पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एपीएमएल), ने इसके विरोध में चुनाव का बहिष्कार कर दिया. लेकिन तब तक यह साफ़ हो चुका था कि उनके पास आम समर्थन और मज़बूत उम्मीदवार नहीं हैं.

इधर मुशर्रफ़ का राजनीतिक वजूद लड़खड़ाया कि उन्हें एक और झटका लगा जब उनकी तानाशाही के दौरान किए गए कामों के लिए एक अदालत के आदेश पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.

देश का पूर्व सैन्य प्रमुख और राष्ट्रपति होने के नाते उन्हें जेल के बजाय इस्लामाबाद के बाहरी इलाक़े में बने उनके नए फ़ॉर्म हाउस चाक शहज़ाद में नज़रबंद रखा गया.

हालांकि मुशर्रफ़ ने चार मामलों में ज़मानत हासिल कर क़ानूनी लड़ाई का पहला मोर्चा जीत लिया है लेकिन उन्हें इनसे मुक्त होने के लिए क़ानूनी जंग जारी रखनी होगी.

Image caption मुशर्रफ़ पर अक्टूबर, 1999 में नवाज़ सरकार के तख़्तापटल मामले की जांच अभी की जानी है

इसके अलावा संविधान का उल्लंघन करने के लिए देशद्रोह और 2007 में सुप्रीम कोर्ट के जजों को नज़रबंद करने के लिए उनके ख़िलाफ़ मामलों की जांच अभी शुरू होने ही.

मुशर्रफ़ की दिक्क़तें अभी दूर होती नज़र नहीं आ रहीं और इन सभी मामलों से उनका नाम साफ़ होने में वक़्त लगेगा.

नई ज़िंदगी

हालांकि कई लोगों ने ने इसके लिए उनकी तारीफ़ की है कि वह अदालत के सामने पेश हुए हैं यह जानते हुए भी कि न्यायालय और नवाज़ शरीफ़ सरकार साफ़ तौर पर उनके विरोधी हैं.

मुशर्रफ़ एक बार फिर एक आज़ाद आदमी हैं और वह चाहें तो घूम सकते हैं या अपनी राजनीतिक गतिविधियां जारी रख सकते हैं.

लेकिन अभी तक वह सुरक्षाकर्मियों से घिरे अपने फ़ॉर्महाउस से बाहर नहीं निकले हैं, यह मुख्यतः सुरक्षा कारणों से है. इसके अलावा वह अगला क़दम उठाने से पहले अपने वकीलों और समर्थकों के साथ सलाह कर रहे हैं.

उनके वकील और पार्टी के सदस्य अहमद रज़ा कसूरी कहते हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में अब भी मुशर्रफ़ की भूमिका बाक़ी है और वह अपनी योजना को सार्वजनिक करने से पहले अपने पूर्व सैन्य सहयोगियों और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों से बात कर रहे हैं.

चर्चा है कि मुशर्रफ़ ख़ैबर पख़्तूनख्वाह प्रांत के चितरल ज़िले से संसद का चुनाव लड़ सकते हैं. यह सीट उनके एक समर्थक शहज़ादा इफ़्तिख़ारुद्दीन उनके लिए ख़ाली कर सकते हैं.

हालांकि एपीएमएल ने मई, 2013 में चुनाव का बहिष्कार कर दिया था लेकिन इफ़्तिख़ारुद्दीन ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और जीते. इसकी मुख्य वजह मुशर्रफ़ की लोकप्रियता थी क्योंकि यहां विकास कार्य मुशर्रफ़ के शासनकाल में ही हुए थे.

अगर मुशर्रफ़ उपचुनाव लड़ते और जीतते हैं तो वह एक सांसद के रूप में नई ज़िंदगी शुरू कर पाएंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार