'श्रीलंका की सरकार लगातार झूठ बोलती रही है'

  • 18 नवंबर 2013
कैलम मैकरे

"नो फ़ायर ज़ोन" एक विवादित फ़िल्म है. यह तमिलों के ख़िलाफ़ युद्ध अपराध में श्रीलंका सरकार का बहीखाता पेश करती है. श्रीलंका सरकार ने फ़िल्म के दावों पर सवाल उठाए हैं.

पिछले दिनों दिल्ली में इस फ़िल्म का प्रदर्शन रखा गया था. इसके लिए फ़िल्म निर्देशक कैलम मैकरे ने भारत आने के लिए दो बार वीज़ा मांगा, लेकिन उन्हें नहीं मिला.

कैलम को इसका अफ़सोस है. उनको लगता है कि श्रीलंका सरकार के दबाव में भारत उनको वीज़ा नहीं दे रहा है. लंदन से उन्होंने बीबीसी संवाददाता रूपा झा से बात की.

आपकी फ़िल्म "नो फ़ायर ज़ोन" में नया क्या है?

फ़िल्म निर्माण में उन साक्ष्यों का इस्तेमाल किया गया है, जो अब तक दुनिया के सामने नहीं आए थे. इन साक्ष्यों की सत्यता भी प्रमाणित है.

फ़िल्म में इस्तेमाल की गई वीडियो फुटेज़ की सत्यता का क्या आधार है?

सभी वीडियो फ़ुटेज़ का स्वतंत्र रूप से विश्लेषण करने के लिए हमने एक प्रतिष्ठित संस्था की मदद ली, जो ब्रिटिश कोर्ट के लिए भी काम करती है. यह डिजिटल वीडियो के साथ किसी भी तरह की अनियमितता, छेड़छाड़ या उलटफेर की जाँच करती है.

इस जाँच से पता चला कि वीडियो फ़ुटेज़ असली है और उनके साथ किसी तरह की अनियमितता नहीं हुई है. उन्होंने अलग-अलग तस्वीरों की तुलना की, जो एक ही स्थान पर अलग-अलग कैमरे से ली गई थीं.

हमने उन वीडियो को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और ब्रिटिश कोर्ट के लिए काम करने वाले एक विशेषज्ञ को भी दिखाया.

वीडियो फ़ुटेज़ देखने के बाद उन्होंने माना कि लोगों के शरीर पर मौजूद घावों, चोटों, बहने वाले ख़ून और पानी में पड़े शवों से वीडियो की सत्यता का पता चलता है.

क्या इंटरनेशनल वॉर ट्रिब्यूनल और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वीडियो फ़ुटेज़ को श्रीलंका सरकार के ख़िलाफ़ साक्ष्य के रूप में स्वीकार करेंगी?

मुझे पूरा विश्वास है कि इस मामले पर एक दिन जाँच होगी. जब कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले की न्यायिक जाँच या सुनवाई होगी, तो इन स्वंतत्र रूप से सत्यापित साक्ष्यों को स्वीकार किया जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र के पास अपने विशेषज्ञ हैं. उनकी जाँच में अगर-अलग निष्कर्ष निकलते हैं, तो मुझे हैरानी होगी. फ़ुटेज़ की किसी भी तरह की जाँच में निष्कर्ष वही रहेंगे.

श्रीलंका सरकार लगातार झूठ बोलती रही है. वह युद्ध के समय भी झूठ बोल रही थी कि हम सुनिश्चित करेंगे कि इसमें कोई भी आम नागरिक नहीं मारा जाए.

विकीलीक्स के एक दस्तावेज़ से पता चलता है कि तत्कालीन विदेश मंत्री वोग्लेगामा ने विदेशी कूटनीतिज्ञों से बातचीत के दौरान कहा था, "युद्ध के दौरान एक भी आम नागरिक नहीं मारा गया." हम जानते हैं कि यह सब झूठ है.

यह सरकार लगातार झूठ बोल रही है. मैं एक वकील के सुझाए गए शब्दों का इस्तेमाल कर रहा हूं.

श्रीलंका सरकार इस बात पर ज़ोर देती रही है कि बालाचंद्रन प्रभाकरन दोतरफा गोलीबारी के दौरान मारे गए या फिर उनके सुरक्षा गार्ड्स ने उनको गोली मार दी थी, लेकिन हमारे पास फ़ोटोग्राफ़ है, जिससे पता चलता है कि प्रभाकरन को पहले पकड़ा गया और फिर उनको मार दिया गया. उनके हाथ पीछे की तरफ बंधे हुए थे.

फ़िल्म में साक्ष्य के लिए आपने वीडियो फ़ुटेज़ को कैसे इकट्ठा किया?

हमने दो तरह का वीडियो फ़ुटेज़ इकट्ठा किया है. पहले मुख्य नरसंहार से जुड़े हैं, जब नो फ़ायर ज़ोन में लोगों को इकट्ठा किया गया था. उसके बाद मारा गया था. इसमें लोगों की तकलीफ़ को देखा जा सकता है.

Image caption श्रीलंका सरकार ने फ़िल्म 'नो फ़ायर ज़ोन' के दावों पर सवाल उठाए हैं.

इन वीडियो को डॉक्टर और आम लोगों ने तैयार किया है. कुछ फ़ुटेज़ तो इंटरनेट पर पहले से मौजूद थी. बाक़ी हमें अन्य लोगों ने भेजी, जिसके सत्यापन के बाद हमने उसका इस्तेमाल किया.

श्रीलंकाई सेना के सैनिकों से भी हमें युद्ध अपराध के वीडियो फ़ुटेज़ मिले. यह वीडियो फ़ुटेज़ का दूसरा स्रोत है. हमें विभिन्न स्रोत से वीडियो फ़ुटेज़ मिले. सैनिकों ने आपस में अनेक वीडियो साझा किए. हमने किसी भी वीडियो फ़ुटेज़ के लिए भुगतान नहीं किया. कुछ सम्मानित संस्थाओं जैसे "जर्नलिस्ट डेमोक्रेसी इन श्रीलंका" से भी वीडियो फ़ुटेज़ मिली.

आपको सारे प्रयास में तीन साल का समय लगा. आपने फ़िल्म बनाने के लिए श्रीलंका को ही क्यों चुना?

मैंने युद्ध और युद्ध अपराधों पर पहले भी कई फ़िल्में बनाई हैं. पश्चिमी देशों द्वारा अफ़्रीका में हुए युद्ध अपराधों पर भी मैंने फ़िल्म बनाई है. मैंने बिना किसी पूर्वाग्रह, एजेंडा या विचार के फ़िल्म शुरू की थी.

मैं युद्ध और युद्ध की परिस्थितियों को समझता हूं. इस फ़िल्म को बनाना मेरे लिए काफ़ी कठिन था क्योंकि मुझे साक्ष्य भी इकट्ठे करने थे. मैंने इस स्तर का युद्ध अपराध पहले कभी नहीं देखा, जिसमें सरकार शामिल हो.

यह केवल एक फ़िल्म नहीं है. यह एक तरीके से दूसरों की मदद से इतिहास के साक्ष्यों को इकट्ठा करना है. जिस मक़सद से आपने फ़िल्म बनाई थी, क्या वह पूरा हुआ है?

मैनें अपना मक़सद पूरा किया है. मैंने महसूस किया है कि हमारे ऊपर एक असाधारण जिम्मेदारी थी, जिसे हमने पूरा किया है. साक्ष्यों को इकट्ठा करने का काम बहुत सावधानी से करने की ज़रूरत थी. यह फ़िल्म बनाना वाक़ई एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी.

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