फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की तैयारी...'जानवरों जैसा बर्ताव'

  • 18 नवंबर 2013
नेपाल

क़तर में फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप 2022 की तैयारियों के बीच क़तर से मज़दूरों की दयनीय स्थिति, शोषण और कुछ जगहों पर जानवरों जैसे बर्ताव की खबरें आई हैं.

ये खबरें मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक ताज़ा रिपोर्ट पर आधारित हैं. इन तैयारियों में जुटे मज़दूरों में नेपालियों की संख्या सबसे अधिक है. क़तर की सरकार ने फ़िलहाल ताजा रिपोर्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

क़तर में फ़ुटबाल वर्ल्ड कप 2022 की तैयारी जोर-शोर से चल रही है और स्टेडियम और सड़कों सहित कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं.

एमनेस्टी का आरोप है कि निर्माण कार्यों में लगे मज़दूरों को अक्सर मज़दूरी न दिए जाने, ख़तरनाक स्थितियों में काम कराए जाने और घटिया आवास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

एमनेस्टी के अनुसार की मानें तो एक प्रबंधक ने तो मज़दूरों को "जानवर" तक कहा है.

वैसे क़तर के अधिकारियों ने तुरंत बयान जारी किया है कि विश्व कप आयोजन से जुड़ी सुविधाओँ के निर्माण में लगे मज़दूरों की दशा में सुधार शीघ्र ही लाया जाएगा.

नेपाल में 'क़तर' एक गाली

नेपाल भौगोलिक दृष्टि से दुनिया का सबसे ऊंचा मगर अत्यंत गरीब देशों में से एक है. वहां पहाड़ी क्षेत्र के भीतरी इलाकों के घरों के हालात कमोबेश एक जैसे हैं. लगभग हर घर से एक आदमी विदेश काम करने गया हुआ है.

मंजू डोंग के पति क़तर में नए विश्वकप एयरपोर्ट बनाने वाले हजारों मज़दूरों में से एक थे. पिछली गर्मी में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई. उस समय वे बस 29 साल के थे.

मंजू बताती हैं, "जब मेरे पति मज़दूरी करने क़तर गए तो वे तंदुरुस्त थे. अगर वो वहां बीमार पड़े तो उसे वापस घर क्यों नहीं भेजा गया? वे हमेशा काम के लंबे घंटों, गर्मी और बासी खाने की शिकायत किया करते थे. इन्हीं वजहों से उनकी मौत हो गई."

गांव के वे लोग खुद को भाग्यशाली मान रहे हैं जिनके क़तर में मज़दूरी करने वाले रिश्तेदार जिंदा हैं. मगर यहां क़तर अब एक 'गाली' जैसा बन गया है.

वर्ल्ड कप 'दुख' का नाम

एक नेपाली युवक कहता है, "नहीं. मैं क़तर अब फिर नहीं जाऊंगा. मैं अपने दोस्तों से भी यही कहता हूं. क़तर में मरने से अच्छा है कि मैं यहां मरें."

रोज कई नेपाली नौकरी के लिए क़तर जा रहे हैं. क़तर में साल 2022 में होने वाले फुटबाल वर्ल्ड कप के कारण कई तरह के निर्माण कार्य शुरू होने से काम के बहुत अवसर हैं. मगर कई मानवाधिकार संगठनों जैसे कि एमनेस्टी का कहना है कि 'गुलामों जैसी बदतर स्थिति में रहने और काम करने के कारण हजारों मज़दूरों की मौत हो रही है.'

क़तर के अधिकारी इन आरोपों का खंडन करते हैं.

मंजू और उसकी बेटी जैसे और भी कई नेपाली हैं जिनके लिए वर्ल्ड कप एक नई शुरूआत की बजाय तकलीफ का दूसरा नाम है.

स्याह पहलू

एमनेस्टी ने क़तर में प्रवासी मज़दूरों की दशा पर 'प्रवास का स्याह पक्ष - क़तर विश्व कप के लिए निर्माण क्षेत्र पर एक नजर' के नाम से एक रिपोर्ट जारी की है. एमनेस्टी का कहना है कि उसने यह रिपोर्ट 210 मज़दूरों, मालिकों और सरकारी अधिकारियों से बातचीत के आधार पर बनाई है.

इस रिपोर्ट में उन नेपाली मज़दूरों की गवाही है जो फीफा के लिए योजनाबद्ध मुख्यालयों के निर्माण कार्य के लिए आपूर्ति में लगी कंपनियों के लिए काम करते हैं.

इन नेपाली मज़दूरों ने बताया कि उनके साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाता है, 12 घंटे काम लिए जाते हैं, क़तर की गर्मी की बेहद तपते दिनों मे भी सप्ताह में एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती

1000 से अधिक ट्रामा सेंटर में

अमनेस्टी ने अपनी रिपोर्ट में इनमें से कई प्रवासी मज़दूरों से जबरन श्रम करवाए जाने की बात का भी जिक्र किया है.

एमनेस्टी ने आरोप लगाया है कि कुछ प्रवासी मज़दूरों को एक ओर तो मज़दूरी नहीं दी जाती, इसके बावजूद उन्हें जुर्माना लगाने की धमकी भी दी जाती है. उन्हें ये धमकी दी जाती है कि यदि उन्होंने अपना काम अच्छी तरह नहीं किया तो उन पर जुर्माना ही नहीं लगाया जाएगा बल्कि उनके पैसे रोक लिए जाएंगे और निर्वासित कर दिया जाएगा.

Image caption एममेस्टी के अनुसार कतर में प्रवासी मजदूरों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार हो रहा है.

बिना नाम बताए एमनेस्टी ने एक अस्पताल के प्रतिनिधि का हवाला देते हुए कहा कि दोहा के मुख्य अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में साल 2012 में वैसे 1000 से ज्यादा लोगों को भर्ती करवाया गया था जो काम करते समय ऊंचाई से गिरने से घायल हो गए थे.

ऊंचाई से गिर कर घायल हुए लोगों में से 10 फीसदी इसके बाद शारीरिक रूप से अक्षम पाए गए. यही नहीं उनकी मृत्यु दर भी अधिक पाई गई है.

फ़ीफ़ा की ज़िम्मेदारी

सलिल शेट्टी, एमनेस्टी महासचिव ने बताया, "बेहद दुखद है कि दुनिया में सबसे अमीर देशों में से एक, क़तर में, श्रमिकों का बेरहमी से शोषण हो रहा है, उन्हें मज़दूरी से वंचित रखा जा रहा है, और अपने हाल पर छोड़ दिया गया है."

उनका कहना है, "हमारी जानकारी के अनुसार उनका भयानक शोषण हो रहा है. फीफा की जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक रूप से इस बात का कड़ा संदेश दे कि वह विश्व कप से जुड़ी निर्माण परियोजनाओं में हो रहे मानवाधिकारों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगी."

Image caption नेपाल का यह युवक मजदूरी करने अब दोबारा कतर नहीं जाना चाहता.

एमनेस्टी की इस रिपोर्ट में ब्रतानी अखबार गार्डियन का सितंबर में जारी की गई वह रिपोर्ट भी शामिल है जिसमें श्रमिकों के काम के हालात की "आधुनिक गुलामी" से तुलना की गई थी.

गार्डियन ने जांच रिपोर्ट पर दुनिया भर के पेशेवर फुटबाल खिलाड़ियों की संघ फीफप्रो, जो यूएनआई ग्लोबल यूनियन के साथ मिलकर काम करती है, की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई थी. यूनी ग्लोबल यूनियन को सेवा क्षेत्र के 2 करोड़ श्रमिकों की आवाज माना जाता है, का ध्यान अपनी ओर खींचा था.

इसमें कहा गया था कि 2022 फुटबाल विश्व कप की मेजबानी करने वाले क़तर को अपने मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा करनी होगी.

फिप्रो बोर्ड के सदस्या ब्रेंडन श्वाब का मानना है कि मज़दूरों का जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ अक्षम्य है खासकर तब जब निर्माण उद्योग में स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी सारी आधुनिक सुविधाओं के मौजूद हैं ".

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