ब्रिटेन के सूदखोर महाजन

  • 28 नवंबर 2013
Image caption ब्रिटेन के कई शहरों में सूदखोर आमतौर पर मिल जाते हैं.

साहूकार और सूदखोर महाजन भारत में होते हैं, वह भी गाँव-देहात में, जहाँ बैंक न हों, वे बहुत ज़्यादा सूद वसूल करते हैं मगर ब्रिटेन जैसे विकसित कहे जाने वाले देश में उनका क्या काम?

मगर सच्चाई ये है कि लंदन के हर गली-मुहल्ले में आपको ऐसी दुकानें मिलेंगी, जिनके बाहर लिखा होता-- 'क्विक लोन', 'पे डे लोन' या फिर पॉन शॉप जहाँ लोग घड़ी या अंगूठी जैसी चीज़ें गिरवी रखकर उधार लेते हैं.

हर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तरह ब्रिटेन में भी लोग क्रेडिट कार्ड से ख़रीदारी करते हैं, उधार की ज़िंदगी को बुरा नहीं समझा जाता बर्शते आप उधार की किस्तें चुकाते रहें, लेकिन ब्रितानी साहूकारों के चक्कर में पड़ने वाले वे लोग हैं जिन्हें कोई क्रेडिट कार्ड देने को तैयार नहीं है.

आर्थिक तंगी का दौर शुरू होने के बाद से लोन देने वाली कंपनियों की दुकानों के नए ब्रांच रोज़ धड़ाधड़ खुल रहे हैं, इन कंपनियों को ब्रितानी मीडिया 'लोन शार्क' कहती है यानी एक बार इनके चंगुल में फँस जाने पर छूटना मुश्किल हो जाता है.

सरकारी हस्तक्षेप

सरकार राजनीतिक सिद्धांत के तौर पर कर्ज़ लेने वाले और कर्ज़ देने वाले के बीच में नहीं पड़ना चाहती थी और कई बार ऐसी माँगों को ठुकरा चुकी थी, मगर अब साहूकारों की मनमानी इस क़दर बढ़ गई है कि पिछले दिनों सरकार को कहना पड़ा कि ये कंपनियाँ कितना सूद वसूल सकती हैं इसकी एक क़ानूनी सीमा तय करनी होगी.

ब्रितानी वित्त मंत्री जॉर्ज ऑस्बर्न ने कहा कि सिर्फ़ सूद की दर ही नहीं, कर्ज़ चुकाने में देरी होने पर लगाए जाने वाले दंड और अरेंजमेंट फ़ीस के नाम पर वसूली जाने वाली रकम की भी सीमा तय की जाएगी.

Image caption ब्याज पर या गिरवी रखकर पैसा देने वाले सूदखोर ब्रिटेन में हर जगह मिल जाते हैं

कई लोग हैं जो सरकारी हस्तक्षेप को ग़लत मानते हैं, उनका कहना है कि साहूकारों के बीच आपस में काम्पीटिशन होगा और जो अधिक ब्याज लेगा उससे लोग कर्ज़ नहीं लेंगे, इसमें सरकार को पड़ने की क्या ज़रूरत है, एक दूसरा तर्क ये भी है कि इससे कर्ज़ देने वाली कंपनियाँ बंद हो जाएंगी और लोग अवैध तरीक़े से लोन देने-लेने लगेंगे.

मगर जानकारों का कहना है कि बीसियों वजहें जो लोगों को इन सूदखोर महाजनों के पास जाने पर विवश करती हैं, मसलन, ग़रीबी, नशे की लत, अचानक सामने आई कोई ज़रूरत या फिर किसी पुराने कर्ज़ को उतारने के लिए नया कर्ज़ लिया जाना.

मजबूरी

जानकार ये भी बताते हैं कि कर्ज़ लेने पर मजबूर लोग उस तबक़े से आते हैं जिनकी हिसाब किताब को समझने की योग्यता काफ़ी सीमित है, स्मॉल प्रिंट पढ़ना सबके बूते की बात नहीं जिसमें लिखा होता है कि वक़्त पर लोन न चुकाने की हालत में कर्ज़ से दोगुना रक़म अदा करनी होगी.

60 से 70 फ़ीसदी सालाना ब्याज दर मामूली बात है लेकिन कर्ज़दारों को बताया जाता है कि उनसे पाँच प्रतिशत ब्याज लिया जाएगा, ये ब्याज दर मासिक होती है वार्षिक नहीं.

अब बताइए कि लंदन के साहूकारों और भारत के साहूकारों में क्या फ़र्क़ है, सिवा इसके कि वे अँगरेज़ी बोलते हैं.

कर्ज़दार और साहूकार का रिश्ता मजबूरी और शोषण पर आधारित रहा है, देश चाहे विकसित हो या विकासशील, पैसे और उसका कारोबार करने वालों की प्रवृत्ति एक ही रहती है.

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