शांति प्रक्रिया पर बात करने काबुल पहुंचे शरीफ़

हामिद करज़ई, नवाज़ शरीफ़

अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया की बहाली पर बात करने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ काबुल पहुंच गए हैं.

नेटो सेनाओँ के 2014 के आखिर तक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से पहले शांति प्रक्रिया की बहाली इस वार्ता के एजेंडे में सबसे ऊपर है.

अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई के मुताबिक वह चाहते हैं कि पाकिस्तान तालिबान से होने वाली शांति वार्ता में भूमिका निभाए, जिन पर उसका काफ़ी प्रभाव है.

अफ़ग़ान राष्ट्रपति का मानना है कि तालिबान, पाकिस्तान स्थित ठिकानों से हमले करते हैं.

पाकिस्तानी ख़ुफ़िया सेवा के कुछ निहित तत्वों पर अफ़ग़ान तालिबान का समर्थन करने के भी आरोप हैं हालांकि पाकिस्तान इसकी ज़ोरदार मुख़ालफ़त करता है.

शरीफ़ की यात्रा पर पाकिस्तानी विदेश विभाग के प्रवक्ता ऐजाज़ अहमद चौधरी ने कहा, "दोनों नेता अफ़ग़ानिस्तान में शांति और दोस्ती बढ़ाने पर बात करेंगे."

तालिबान ने राष्ट्रपति करज़ई या अफ़ग़ान उच्च शांति परिषद को अमरीका का पिट्ठू बताते हुए उससे सीधे बात करने से इनकार कर दिया है.

तालिबान कमांडर की रिहाई

उच्च शांति परिषद साल 2001 से ही अमरीकी नेतृत्व वाली सेनाओं और अफ़ग़ान सेनाओं से लड़ रहे तालिबान लड़ाकों से समझौता वार्ता शुरू करना चाहती है.

राष्ट्रपति करज़ई जून में क़तर में तालिबान के ऑफ़िस खोले जाने से भी नाराज़ हैं और इसे मैत्री की उम्मीदों को एक और धक्का मानते हैं.

करज़ई ने अगस्त में इस्लामाबाद का दौरा कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ मुलाक़ात की थी लेकिन मई में पद संभानने के बाद से नवाज़ शरीफ़ का काबुल का यह पहला दौरा है.

दोनों नेता पिछले महीने लंदन में ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से भी मिले थे. क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए की जा रही त्रिपक्षीय मुलाक़ातों की कड़ी में यह चौथी थी.

करज़ई की मुख्य मांगों में से एक पाकिस्तान में क़ैद तालिबानी क़ैदियों की रिहाई भी है. उन्हें उम्मीद है कि इससे विद्रोहियों से बातचीत को उत्साहजनक शुरुआत मिल सकती है.

पाकिस्तान का कहना है कि उसने पूर्व तालिबान कमांडर मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर को रिहा किया है. अफ़ग़ानिस्तान ने इसे लड़ाकों को बातचीत के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम माना है.

लेकिन तालिबान सूत्रों का कहना है कि बरादर दरअसल अब भी पाकिस्तान में क़ैद हैं.

इस दौरान अमरीका और अफ़ग़ानिस्तान उस समझौते को अंतिम रूप दे रहे हैं जिसके तहत अमरीकी सेनाएं 2014 के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान में रहेंगी.

करज़ई ने अब तक इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. वह अमरीका से और गारंटी चाहते हैं.

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