समुद्र में समा जाएंगे किरिबाती के 32 द्वीप

किरिबाती द्वीप

समुद्र से दो मीटर की ऊंचाई पर बसे किरिबाती द्वीप समूह के 32 द्वीपों के अगले 50 साल में समुद्र में समा जाने का अनुमान लगाया जा रहा है.

प्रशांत महासागर में स्थित यह द्वीपीय देश जलवायु परिवर्तन का पोस्टर ब्वॉय बन गया है.

बीबीसी की विज्ञान संवाददाता जूलियन सिडिल ने किरिबाती के प्रमुख द्वीप दक्षिण तारावा द्वीप की यात्रा की.

किरिबाती की पुरानी छवि प्रवाल द्वीपों, ताड़ के पेड़ों, मूंगे की चट्टानों और सामान्य जीवनशैली वाले देश की है. लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ने की वजह से इसे ख़तरा पैदा हो गया है.

यह द्वीपीय देश धरती की सबसे अधिक आबादी वाली जगहों में से एक है. ताज़ा अनुमानों के मुताबिक़ यहाँ क़रीब एक लाख दस हज़ार लोग रहते हैं. इनमें से आधे लोग दक्षिण तारावा द्वीप पर ही रहते हैं.

इसे 1970 के दशक के अंत में ब्रिटेन से आज़ादी मिली थी, उसके बाद से यहाँ की आबादी तेज़ी से बढ़ी. गाँव अब आपस में जुड़ गए हैं. सड़क के किनारे और समुद्र के पास शहरीकरण हुआ है.

यहाँ ज़मीन की कमी का मतलब है, बहुत कम खेती. ऐसे में यहाँ के निवासी खाने के लिए आयातित और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर बहुत अधिक निर्भर हैं.

बाहरी द्वीपों के गावों से बहुत से लोग दक्षिण तारावा के केंद्र आते हैं. इस वजह से बड़े पैमाने पर आर्थिक पलायन हुआ है, ज़मीन के समुद्र में समा जाने से भी इसमें तेज़ी आई है.

किरिबाती के राष्ट्रपति एनोटे टांग कहते हैं, ''बाहरी द्वीपों पर रहने वाले समुदाय प्रभावित हुए हैं. हमारा एक गाँव डूब गया. बहुत सी जगह समुद्र का पानी तालाब के साफ़ पानी में मिल गया, यह फसलों को भी प्रभावित कर रहा है.''

वो कहते हैं, ''ऐसा बहुत से द्वीपों पर हो रहा है. यह कोई अलग सी घटना नहीं है. गंभीर किस्म के जल सैलाबों को देखा गया है. यह सब वास्तविकता है, जिसका हम सामना कर रहे हैं, चाहें वो जलवायु परिवर्तन से प्रेरित हो या न हों.''

आबियांग तारावा के उत्तर में स्थित कम आबादी वाला द्वीप है, जहाँ का एक गाँव समुद्र की लहरों में समा गया है. यहाँ की आबादी क़रीब 10 हज़ार है.

इसका मतलब यह हुआ कि यहाँ खेती के लिए अधिक ज़मीन है. यहाँ की मुख्य उपज में नारियल और प्रशांत महासागर द्वीपों में उगने वाला एक गोलाकार फल ब्रेडफ्रूट है. हालांकि यहाँ फसलों के बहुत लंबे समय तक टिके रहने पर संदेह है.

खेती का संकट

आबियांग द्वीप परिषद के डिप्टी मेयर आंटा मोर्टिया कहते हैं, ''हम देख रहे हैं कि हमारे नारियल के पेड़ों का उत्पादन घट रहा हैं. मौसम बदल रहा है. हम जिन पेड़ों पर भरोसा करते हैं, वे सूखने गए हैं.''

न चाहते हुए भी इस द्वीप ने प्रमुख खाद्य निर्यातक बनने के लिए सहायता एजेंसियों के प्रस्ताव लेना शुरू कर दिया है. इसके लिए दक्षिण तरावा मुख्य बाज़ार बन रहा है. आबियांग को भी अब लग रहा है कि ज़रूरत से ज़्यादा पैदावार उपजाना उसके ख़ुद के अस्तित्व के लिए अहम हो सकता है.

आंटा मोर्टिया कहते हैं, "भोजन पर हमारी चिंता का मतलब होगा कि हम खाद्य फ़सलों के लिए इन नए प्रस्तावों को स्वीकार करें.''

खाद्य सुरक्षा की कमी के बाद भी, दक्षिण तारावा एक तरह से सुरक्षा का आभास देता है. द्वीप का अधिकांश भाग समुद्री दीवारों से सुरक्षित किया गया है, इन दीवारों को स्थानीय लोगों ने आसपास खुदाई करके बनाया है.

सड़कों की सुरक्षा के लिए सीमेंट से बनी नई दीवार बालू के बोरों से भरी है. दुर्भाग्य से समुद्र से सुरक्षा के दोनों तरीकों का हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है.

असुरक्षित क्षेत्र

किरिबाती के लोक निर्माण और सुविधा विभाग के लिए काम करने वाले तटीय इंजीनियर क्लिफ़ जुलेराट कहते हैं, ''मज़बूत समुद्री दीवार लहरों की ताक़त को वापस लौटा देती हैं. इससे असुरक्षित क्षेत्र में कटाव होता है.''

वो कहते हैं, ''वे सब सामुद्रिक इंजीनियरिंग से अधिक सिविल इंजीनियरिंग के समाधान हैं.''

जिस परियोजना पर वो काम करते हैं, उसे विश्व बैंक से वित्तीय सहायता मिलती है. किरिबाती अडाप्टेशन प्रोजेक्ट के शुरू मे उठाए गए कदमों से वो नाराज़ थे.

यह बड़ी समुद्री दीवार एक सड़क के किनारे से होकर गुजर रही पानी की पाइपलाइन, बिजली और टेलीफ़ोन के केबल की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी. दीवार की डिजाइन की वजह से कटाव हुआ.

इससे पाइपलाइन और केबल दिखने लगे. इससे द्वीप की अधिकांश जनता के सामने जलसंकट पैदा हो गया. क्लिफ़ कहते हैं कि अन्य विकल्पों पर भी विचार होना चाहिए.

वो कहते हैं, ''एक तटीय इंजीनियर होने की वजह से मैं समुद्री दीवार की सिफ़ारिश कभी नहीं करुंगा. बहुत से अपतटीय तरीक़े भी हैं, जो समुद्र की लहरों को नष्ट कर देते हैं. इसके अलावा मैंग्रोव के पौधे लगाना भी एक समाधान है, जो नई ज़मीन के बनने को बढ़ावा देगा.''

राष्ट्रपति टोंग कहते हैं कि जनसंख्या का दवाब और पर्यावरण क्षरण तात्कालिक समस्याएं हैं. ऐसे में यहाँ ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन पर एक परिप्रेक्ष्य पाना कठिन है.

वो कहते हैं, ''उनके पास ऐसी चीजों का सामना करने के लिए संसाधन नहीं हैं, जो उनके जीवन को सीधे प्रभावित नहीं करेंगी. हम पर ख़तरा मंडरा रहा है. हम फ्रंट लाइन पर हैं.''

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