बुज़ुर्ग एड्स पीड़ितों का मुश्किल जीवन

एड्स पीड़ित
Image caption अकेलेपन और भविष्य को लेकर अनिश्चितता में जी रहे हैं बुज़ुर्ग एड्स पीड़ित.

80 के दशक में बाकी अन्य एड्स पीड़ितों की तरह ही डैनी वेस्ट को भी लगता था कि वे कुछ महीने ही जी पाएंगे.

वे बीमार पड़े, दोस्तों की मौतें देखीं और उस वक़्त अनजान वॉयरस रहे एड्स के कारण अपनी मौत का इंतज़ार करने लगे.

डैनी लंदन में रहते हैं. तीस साल बाद अब वे दुनिया में सबसे लंबे समय से एड्स से लड़ रहे मरीज़ों में से एक हैं.

डैनी 50 वर्ष से अधिक उम्र के 19 हज़ार ब्रितानी एड्स पीड़ितों में से एक हैं. इन लोगों का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के तहत इलाज़ हो रहा है. दवाइयां बेहतर होने के कारण एड्स पीड़ितों की उम्र भी बढ़ी है.

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने बुज़ुर्ग हो रहे एड्स पीड़ितों की बेहतर देखभाल का आह्वान करते हुए कहा था कि इन मरीज़ों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं.

लेकिन कुछ लोगों के लिए एड्स के साथ जीवन बहुत उतार चढ़ाव भरा रहा है.

Image caption आर्थिक दिक्कतों के कारण एड्स पीड़ितों का जीवन और मुश्किल हो जाता है.

डैनी कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था के वे 50 साल तक जी पाएंगे.

अनिश्चितता के बादल

वे कहते हैं, "मैं उस वक़्त 24 साल का था. मैंने उस समय सामाजिक कार्य करने की योग्यता हासिल की ही थी. मैं अपना करियर बस शुरू ही कर रहा था. एक पल के भीतर ही सबकुछ ख़त्म हो गया था. मुझे अधिक से अधिक एक साल तक का वक़्त बताया गया था."

डैनी बताते हैं, "उस वक़्त कोई इलाज़ नहीं था. मेरी बीमारी के बारे में पता चलने के दो साल के भीतर मेरे साथ इलाज़ करा रहे सभी लोगों की मौत हो गई. लोग ताश के पत्तों की तरह बिखर रहे थे. मेरा समुदाय ख़त्म हो रहा था."

डैनी को कभी भी उधार नहीं मिल सका और उन्हें पेंशन भी नहीं मिलती है. सार्वजनिक क्षेत्र और एड्स कार्यक्रमों में लगी संस्थाओं के साथ कई साल तक काम करने के बाद भी डैनी अपने भविष्य को लेकर निश्चिंत नहीं है. वे नहीं जानते की आगे क्या होगा.

दिक्कतें

Image caption एड्स के मामलों में पिछले कुछ सालों में कमी आई है लेकिन अभी भी जागरुकता का अभाव है.

वे कहते हैं, "मैंने बुढ़ापे के बारे में खुद को मनोवैज्ञानिक तौर पर तैयार नहीं किया था. मेरा शरीर एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में बहुत तेज़ी से बूढ़ा हो रहा है. मैं हमेशा पीड़ा में रहता हूँ. लेकिन ग़रीबी मेरे लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. मैं नहीं जानता कि आर्थिक तौर पर मैं हालात का सामना कैसे करूँगा."

एड्स जागरुकता के लिए कार्य करने वाली संस्था टेरेंस हिग्गिंस ट्रस्ट का एक हालिया अध्ययन बताता है कि डैनी अकेले नहीं हैं जिन्हें आर्थिक चिंताएं हैं.

'द फिफ़्टी प्लस' रिपोर्ट के मुताबिक 50 वर्ष से अधिक उम्र के एड्स पीड़ित अपनी उम्र के बाक़ी लोगों के मुकाबले में आर्थिक तौर पर कमज़ोर हैं और वे पैसे, गिरती सेहत, घर और सामाजिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.

संस्था की पॉलिसी निदेशक लीज़ा पॉवर मानती हैं कि इलाज़ के बाद अधिकतर मरीज़ों को काम छोड़ने के लिए मज़बूर होना पड़ता है. कई मरीज़ अपनी संपत्ति बेच देते हैं, पेंशन निकाल लेते हैं और मौत का इंतज़ार करते हुए दुनिया घूमते हैं.

डॉक्टर अभी तक एचआईवी से बूढ़े होने की प्रक्रिया पर होने वाले प्रभाव को सही से समझ नहीं पाए हैं.

अविश्वास

कुछ बुज़ुर्ग मरीज़ों की स्वास्थ्य संबंधित दिक्कतें शुरूआत में कराए गए इलाज़ के कारण भी हो सकती है. कई बार इलाज़ के दुष्प्रभाव वॉयरस से ज़्यादा ख़तरनाक होते थे.

आमतौर पर माना जाता है कि एड्स के मरीज़ों में दिल संबंधी बीमारियों, दिल का दौरा पड़ने और कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है.

Image caption भविष्य को लेकर अनिश्चितता बुज़ुर्ग एड्स पीड़ितों की सबसे बड़ी दिक्कत है.

वेस्टमिनिस्टर हॉस्पिटल से जुड़े डॉक्टर डेविड एसबोए बताते हैं कि उनके पास आने वाले आधे से ज़्यादा एड्स मरीज़ 50 वर्ष से ऊपर के हैं. कुछ तो 80 साल तक के हैं.

वे बताते हैं कि इन मरीज़ों पर एचआईवी संक्रमण के मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत ही स्वभाविक हैं.

डॉक्टर डेविड कहते हैं, "वे काम कर सकते हैं लेकिन आत्मविश्वास कम होने के कारण वे अपने परिवार और समाज से कट से जाते हैं."

एड्स जागरुकता के लिए कार्य कर रही संस्थाएं मानती हैं कि डॉक्टरों और देखभाल करने वालों को मरीज़ों को समझने के लिए बेहतर ट्रेनिंग दिए जाने की ज़रूरत है.

अक्सर मरीज़ अपने बारे में पूरी जानकारी देने का आत्मविश्वास नहीं जुटा पाते हैं.

मिथक

लीज़ा पॉवर मानती हैं कि अभी भी बहुत से मिथक तोड़ने और जनता में जागरुकता लाने की ज़रूरत है.

वे कहती हैं, "एक समूह कहता है कि इसका इलाज संभव है जबकि दूसरे इस बीमारी को मौत की सज़ा जैसे मानता है. सच्चाई यह है कि एचआईवी संक्रमित लोगों का अपना जीवन भी है."

डैनी को हाल ही में ऐसे स्थान पर रहने के लिए मज़बूर किया गया है जहां वे किसी को भी नहीं जानते हैं. वे एचआईवी के साथ अकेले ही भविष्य का सामना कर रहे हैं.

वे कहते हैं, " मैं नहीं जानता कि अगले दस सालों में मैं क्या कर रहा होऊंगा. मेरे जीवन में सबकुछ अनिश्चित और अज्ञात है. मैं बीमारी, ख़राब स्वास्थ्य, ग़रीबी और अकेलेपन में जी रहा हैं. जब मैं बिस्तर में होता हूँ तो इसी बारे में सोचता रहता हूँ."

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