पाकिस्तान:'शराफ़त' से नहीं हुआ शरीफ़ का आना

  • 2 दिसंबर 2013
राहील शरीफ़

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का फौज के लंबे समय से सेनाध्यक्ष रहे जनरल अशफ़ाक़ परवेज़ कियानी के रिटायर होने के अंतिम समय तक नए सेनाध्यक्ष की घोषणा करने का इंतज़ार करना बताता है कि उन्हें कितना मुश्किल चुनाव करना था.

यह आसान नहीं था क्योंकि वे सेना के सबसे वरिष्ठ अधिकारी लेफ़्टिनेंट जनरल हारून असलम और दूसरे नंबर के अधिकारी लेफ़्टिनेंट जनरल राशिद महमूद को सेना की कमान नहीं देना चाहते थे.

अपने सहयोगियों से लंबे सलाह मशविरों और पीड़ादायक सस्पेंस के बाद अंततः उन्होंने लेफ़्टिनेंट जनरल राहील शरीफ़ को नया सेना प्रमुख बनाने की घोषणा की.

ऐसा करने के लिए नवाज़ शरीफ़ को कई महीने पहले दिए गए अपने ही उस बयान के ख़िलाफ़ जाना पड़ा, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें सबक मिल गया है और अब नए सेना प्रमुख के चुनाव में वे वरिष्ठता को ही वरीयता देंगे.

लेफ़्टिनेंट जनरल हारून राशिद को दरकिनार करना भी आसान नहीं था, क्योंकि वे न सिर्फ एक पेशेवर सैनिक रहे हैं बल्कि उनका रिकॉर्ड भी असाधारण रहा है.

हारून राशिद फौज की 'इलीट स्पेशल सर्विस ग्रुप' से जुड़े रहे हैं. राशिद ने 2009 में स्वात घाटी में तालिबान के ख़िलाफ़ एक दिलेर अभियान का नेतृत्व भी किया था.

संवैधानिक अधिकार

बहुत से लोग मानते हैं कि राशिद की यह दक्षता ही उनके विपरीत चली गई. नवाज़ शरीफ़ कमांडो से सावधान रहने लगे थे क्योंकि पिछली बार उन्होंने कमांडो रहे जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख बनाया था.

मुशर्रफ़ उस समय वरिष्ठता सूची में तीसरे नंबर पर थे. अक्टूबर 1999 में मुशर्रफ़ ने सैन्य तख़्तापलट कर नवाज़ शरीफ़ को सत्ता से हटाकर जेल भेज दिया और ख़ुद सत्ता पर काबिज़ हो गए थे.

जैसा कि उम्मीद की जा रही थी, एक कनिष्ठ के सेना प्रमुख बनाए जाने के बाद जनरल हारून राशिद ने परंपरा निभाते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इससे इस बात पर बहस शुरू हो गई कि क्या सेना प्रमुख की नियुक्ति में इंसाफ़ हुआ.

हालाँकि अधिकतर विश्लेषक मानते हैं कि अपनी पसंद के सेना प्रमुख को नियुक्त करना प्रधानमंत्री का संवैधानिक अधिकार है. यह तर्क भी दिया गया कि सेना में पदोन्नति की व्यवस्था को प्रधानमंत्री की निजी पसंद पर छोड़ने के बजाए संस्थागत किया जाना चाहिए.

नवाज़ शरीफ़ की यह टिप्पणी कि उन्होंने एक शीर्ष पेशेवर अधिकारी के हाथों में सेना की कमान दी है, नाकाफ़ी ही साबित होती है क्योंकि इससे यह धारणा बनती है कि सेना प्रमुख की रेस में शामिल बाक़ी चार जनरल 'अच्छे पेशेवर' नहीं थे.

सेना में दूसरे नंबर के अधिकारी होने के बावजूद लेफ़्टिनेंट जनरल राशिद महमूद को भी दरकिनार कर दिया गया. हालाँकि उन्हें ज्वाइंट चीफ़ ऑफ स्टॉफ़ कमेटी के अध्यक्ष का औपचारिक पद देकर कुछ हद तक भरपाई कर दी गई. तकनीकी तौर पर अपने पद के कारण वे जनरल राहील शरीफ़ के वरिष्ठ ही रहेंगे लेकिन वास्तविकता में अगले तीन साल तक सेना प्रमुख के हाथ में ही सारी ताक़त होगी.

इतिहास

सेना प्रमुख का रिटायर होना और इस पद पर नए वारिस का आना यूँ तो सामान्य बात होती, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं है. यहाँ यह पद ही सबसे ताक़तवर है क्योंकि अतीत में सेना प्रमुख नागरिक सरकार का तख़्तापलट कर लंबे वक़्त तक सत्ता पर काबिज़ होते रहे हैं.

कहा जाता है कि 1947 में ब्रिटिश शासन से आज़ाद होने के बाद से पाकिस्तान के इतिहास के आधे वक़्त में सेना प्रत्यक्ष रूप से सत्ता पर क़ाबिज़ रही है और बाक़ी समय में परोक्ष रूप से सत्ता का प्रबंधन करती रही है.

जनरल अयूब ख़ान, जनरल ज़िया उल हक़ और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ सैन्य तख़्तापलट कर सत्ता पर काबिज़ हुए जबकि जनरल याह्या ख़ान ने आंतरिक फ़ेरबदल में साथी जनरल अयूब ख़ान से सत्ता बदली. याह्या ख़ान की सत्ता पाकिस्तान के लिए आपदाकारी रही, क्योंकि उन्होंने 1970 के आम चुनावों में शेख मुज़ीबुर्रहमान की आवामी लीग पार्टी के जीतने के बाद भी सत्ता के हस्तांतरण से इंकार कर दिया था. इससे पूर्वी पाकिस्तानी की बंगाली आबादी ने विद्रोह कर दिया जिसका नतीज़ा बांग्लादेश के गठन के रूप में सामने आया.

यह तीसरी बार हुआ है जब प्रधानमंत्री के रूप में नवाज़ शरीफ़ ने अपने तीन अलग-अलग शासनकालों में सेना प्रमुख की नियुक्ती की है. अपनी पिछली नियुक्तियों के रिकॉर्ड और नतीज़ों को देखते हुए इस बार अपनी पसंद को तय करने के लिए अंतिम फ़ैसला लेते वक़्त वे कुछ ज़्यादा ही सतर्क थे.

उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने सही फ़ैसला लिया है, लेकिन इससे पहले जब नवाज़ शरीफ़ ने ग़लत फ़ैसले लिए थे और उनके नतीज़े भुगते थे तब भी समर्थकों ने ऐसा ही कहा था.

अपनी तरह ही कश्मीरी मूल और ग़ैर राजनीतिक पृष्ठभूमि के जनरल को सेना प्रमुख बनाकर नवाज़ शरीफ़ ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इस बार उन्हें सैन्य तख़्तापलट और समय से पहले अपनी सरकार के ख़ात्मे का सामना नहीं करना पड़ेगा.

हो सकता है कि वे इस बार सही और किस्मतवाले साबित हों, लेकिन पाकिस्तानी राजनीति की अप्रत्याशित प्रकृति और सेना प्रमुख के हाथ में रहने वाली असीमित ताक़त को देखते हुए निश्चित तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है.

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