ऊर्दू प्रेस: विधानसभा चुनाव नतीजे का 2014 पर असर

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पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में बीते हफ़्ते कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के बयान की रोशनी में भारत पाक रिश्तों पर चर्चा हुई तो भारत के ऊर्दू मीडिया में रविवार को आने वाले विधानसभा के चुनावों के नतीजों के अलावा सांप्रदायिक दंगों की रोकथाम के लिए आने वाला बिल भी सुर्ख़ियों में है.

हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने लिखा है कि विपक्ष के विरोध के बाद सरकार ने सांप्रदायिक दंगों की रोकथाम से जुड़े बिल के विवादित प्रावधानों को हटा लिया है जिनमें दंग़ों के लिए बहुसंख्यकों को ज़िम्मेदार ठहराने वाला प्रावधान भी शामिल है और इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार की भूमिका को भी सीमित कर दिया गया है.

अख़बार लिखता है कि एक सभ्य देश की पहचान इस बात से होती है कि वहां रहने वाले अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं, उन्हें सरकार और प्रशासन पर कितना भरोसा है और प्रशासन किस हद तक ईमानदार और निष्पक्ष है. इसलिए जरूरी है कि इस बिल को राजनीतिक रस्साकशी का शिकार न बनाया जाए और बल्कि इससे अल्पसंख्यकों का विश्वास बहाल किया जाए.

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के निधन पर इंकलाब लिखता है कि उन्होंने कभी खुद को आम आदमी से अलग नहीं किया, वो जनता के लिए जिए और उससे जुड़े रहे. अख़बार के अनुसार अब मंडेला दुनिया से विदा हो चुके हैं लेकिन उनका संदेश इतना ताक़तवर है कि वो ज़िंदा रहेगा और लोग उससे प्रेरणा लेते रहेंगे.

भ्रष्टाचार का मुद्दा

रविवार को आने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर अख़बार-ए- मशरिक ने लिखा है कि जैसा कि एग्जिट पोल में बताया जा रहा है, अगर चार राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में फ़ैसला बीजेपी में हक में पड़ा तो 2014 के चुनावों पर इसका जरूर असर होगा.

प्रचार के दौरान होने वाली तीखी बयानबाज़ी पर अख़बार लिखता है कि कांग्रेस के राहुल गांधी जहां अमीरी और गरीबी के साथ गांव और शहर का फर्क समझा रहे रहे वहीं बीजेपी के नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया और आंकड़ों के साथ यूपीए सरकार की बखिया उधेड़ी. तेज़ तर्रार बयानों के बीचे आने वाली राजनीतिक परिस्थितियों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

उधर पाकिस्तानी अख़बारों में दैनिक एक्सप्रेस ने सम्पादकीय लिखा है कि 'चौथी जंग से बचा जाए' और प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के उस बयान का ज़िक्र किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या दो परमाणु शक्तियों यानी भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी वक़्त चौथी लड़ाई का कारण बन सकती है.

अख़बार लिखता है कि जब कश्मीर मसला हल होगा तो क्षेत्र में मंडराने वाले एटमी जंग के बादल छंटेंगे, डेढ़ अरब इंसान अमन और सुकून से रह सकेंगे, आपसी रिश्तों और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, अरबों रुपये वाला रक्षा बजट आम लोगों के कल्याण कि योजनाओ पर ख़र्च होगा और ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों लोगों कि ज़िन्दगी बेहतर होगी.

मनमोहन की 'ख़ुशफ़हमी'

अख़बार के अनुसार इसलिए ये इम्तिहान दोनों देशों के नेतृत्व का है कि वो इस क्षेत्र को कैसे अमन का मक़ाम बनाते हैं. दूसरी तरफ नवाए वक़्त ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस बयान को अपने पहले पन्ने पर जगह दी है कि उनकी ज़िंदगी में तो पाकिस्तान भारत से जंग नहीं जीत सकता.

अख़बार ने मनमोहन के इस बयान को मनमोहन कि खुशफहमी बताते हुए लिखा है कि नवाज़ शरीफ के बयान पर प्रतिक्रिया में भारतीय प्रधानमंत्री ने ये बात कही. अख़बार कि रिपोर्ट में भारत के एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून के इस बयान का भी ज़िक्र है कि अगर पाकिस्तान युद्ध चाहता है तो भारत उसके लिए तैयार है, वो डरता नहीं है.

साथ ही साथ पाकिस्तान सरकार ये बय़ान भी सब अख़बारों में दिखा कि भारत सियाचिन से अपनी फ़ौज निकाले.

कराची से छपने वाले जंग ने पाकिस्तान के रास्ते नाटो सप्लाई रुकने पर लिखा है कि ख़ैबर पख़्तून ख़्वाह में इमरान खान कि पार्टी की सरकार ने रास्तों को रोकने कि घोषणा की तो अमरीका ने ट्रक ड्राइवरों की सुरक्षा के मद्देनज़र सप्लाई को निलम्बित कर दिया.

अख़बार कहता है कि इस बात में शक नहीं कि पाकिस्तान में ड्रोन हमलों का ख़ूब विरोध होता है और पाकिस्तान इसे हर मंच पर विरोध जताता है.

नाटो सप्लाई

जंग लिखता है कि संघीय सरकार को सेना, विदेश मंत्रालय और सब पार्टियों के साथ मिल कर एक नीति बनानी चाहिए ताकि नाटो सप्लाई रोकने के ख़ैबर पख़्तून ख़्वाह के फैसले से ये सन्देश नहीं जाना चाहिए कि पाकिस्तान में सूबे, पार्टियां और समूह अपनी मर्ज़ी को देश कि विदेश नीति से भी ऊपर समझते हैं.

दैनिक वक़्त लिखता है कि ज़रूरत ऐसी रणनीति की है कि अमरीका हमारा दोस्त न बने तो दुश्मन भी न बने. इमरान कि तहरीक ए इन्साफ एक लोकप्रिय पार्टी है लेकिन उसे ये भी समझना होगा कि उसे अपनी बात कहने का हक़ है लेकिन ऐसे क़दम उठाने का नही जो पाकिस्तान के लिए मुश्किल पैदा करें. बेहतर होगा कि इस मामले पर संसद में ही चर्चा हो.

दैनिक आजकल में एक कार्टून छपा है जिसमें मांगें पूरी होने तक अफ़ग़ान मंत्रियों के अमरीका से सुरक्षा समझौते पर दस्तख़त न करने की ख़बर को विषय बनाया गया है. कार्टून में सर झुकाए अमरीका से अफ़ग़ान राष्ट्रपति करज़ई कह रहे हैं ये मत समझो कि हम पाकिस्तान हैं.

दैनिक औसाफ़ के कार्टून में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज़ अज़ीज़ को अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लिए अमरीका के विशेष दूत से मिलते हुए दिखाया गया है. अमरीकी दूत कह रहे हैं मिस्टर अज़ीज़, हम टुम से कुछ वाडा करना चाहता है, ओके. इस पर अज़ीज़ कह रहे हैं - ओह नो, नो.

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