रोको और चूमो : अपराध रोकने का नया तरीका?

  • 9 दिसंबर 2013

स्टॉप ऐंड किस यानि रोको और चूमो. जब दी अनियन वेबसाइट ने न्यूयॉर्क के मेयर के हवाले से कहा कि वहां की पुलिस को अपराध रोकने के लिए ये नया तरीका इस्तेमाल करने को कहा गया है तो हंगामा मच गया.

वेबसाइट ने एक वीडियो में दिखाया कि किस तरह से पुलिस पहले लोगों को रोक कर उन्हें सर से पांव तक थपथपा कर तलाशी लेती है और फिर उन्हें कभी गाल पर तो कभी होठों पर चूमती है.

वीडियो में एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ज़्यादातर काले इलाकों में ये कार्यक्रम चला रही है और काले लोगों को चूमा जा रहा है.

वीडियो में मेयर ब्लूमबर्ग का ये बयान भी दिखाया गया कि अपराध रोकने के लिए ये कारगर कदम है और पुलिस उन्हीं को चूम रही है जिन पर किसी तरह का संदेह होता है.

ट्विटर पर बहुत सारे संदेश आए जिनमें पुलिस को समलैंगिक मानसिकता से ग्रस्त बताया गया.

बहकावे में लोग

Image caption इस प्रयोग ने एक बार फिर से न्यूयॉर्क पुलिस की स्टॉप ऐंड फ़्रिस्क पॉलिसी को सुर्खियों में ला दिया है.

कई घंटों के बाद पता चला कि वेबसाइट ने न्यूयॉर्क पुलिस की विवादास्पद "स्टॉप ऐंड फ़्रिस्क पॉलिसी" यानि "रोको और तलाशी लो" पर कटाक्ष किया था. दी अनियन इस तरह के व्यंग्यात्मक प्रयोगों के लिए मशहूर है लेकिन इस बार काफ़ी लोग बहकावे में आ गए.

वैसे इस प्रयोग ने एक बार फिर से न्यूयॉर्क पुलिस की स्टॉप ऐंड फ़्रिस्क पॉलिसी को सुर्खियों में ला दिया है. इसके तहत पुलिस किसी पर भी ज़रा भी शक होने पर उसे रोक कर उसकी तलाशी ले सकती है और पुलिस का कहना है कि इससे अपराध रोकने में भारी कामयाबी मिली है.

लेकिन पुलिस पर आरोप ये लगे हैं कि उन्होंने इसकी आड़ में काले, लातिनी या दक्षिण एशियाई लोगों को ही रोका है.

नस्लवाद के आरोप

Image caption न्यूयॉर्क में काले लोगों की आबादी 25 प्रतिशत है लेकिन तलाशी लिए जानेवालों में 50 प्रतिशत काले थे.

पहली जनवरी से न्यूयॉर्क पुलिस की कमान संभालने वाले कमिश्नर बिल ब्रैटन ने लॉस एैंजल्स में भी ये कार्यक्रम चलाया था और उनके कार्यकाल में जितने लोगों को रोका गया उनमें से 30 प्रतिशत गिरफ़्तार भी हुए और इसे एक कामयाब कार्यक्रम माना गया.

लेकिन वहां भी नस्लवाद के आरोप लगे और देखा गया कि वहां की आबादी में नौ प्रतिशत काले हैं लेकिन जिन लोगों को रोक कर तला‏शी ली गई उनमें 23 प्रतिशत काले थे.

न्यूयॉर्क में पिछले दस सालों में जितनी तलाशियां हुई हैं उनमें सिर्फ़ छह प्रतिशत की गिरफ़्तारी हुई है और वहां कालों की आबादी 25 प्रतिशत है लेकिन तलाशी लिए जानेवालों में 50 प्रतिशत काले थे.

बिल ब्रैटन कह रहे हैं वो इस पॉलिसी को छोड़ेंगे तो नहीं लेकिन थोड़ा और सम्मानजनक तरीके से रोक कर तलाशी लेंगे!

लेकिन मैं ये सोच रहा हूं कि अगर दिल्ली और मुंबई पुलिस रोको और चूमो की नीति अपनाए तो सारे बाहुबली, डॉन और भाई लोग शर्म के मारे अंडरग्राउंड हो जाएंगे! आपका क्या ख़याल है?

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