क्या मंडेला का अंतिम संस्कार सबसे बड़ा होगा?

मंडेला, स्मृतिसभा

कुछ ही घटनाएं ऐसी हुई हैं जहां पर इतने बड़े लोग पहुंचे हों जितने नेल्सन मंडेला की स्मृति सभा में आए.

मंगलवार को जोहानेसबर्ग के पास सोवेटे के स्टेडियम में दुनिया के 52 राष्ट्रपति और 16 प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के प्रति सम्मान जताने के लिए मौजूद थे.

हालांकि सॉकर सिटी स्टेडियम में सीटें खाली थीं, तीन और जगहों पर इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया गया और पूरे दक्षिण अफ़्रीका में कम से कम 100 जगहों पर लोग इस कार्यक्रम को देख सकते थे.

रविवार को मंडेला का अंतिम संस्कार होना है और उससे पहले हज़ारों लोग पूरे प्रिटोरिया में सड़कों के किनारे खड़े होकर उनके ताबूत को देखेंगे.

हालांकि भीड़ का आकलन हमेशा सतर्कता के साथ करना चाहिए. माना जाता है कि 1969 में चेन्नई में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री सीएन अन्नादुरई के अंतिम संस्कार में करीब डेढ़ करोड़ लोग शामिल हुए थे.

तमिल विशेषज्ञ एमएसएस पांडियन कहते हैं, "उनकी लोकप्रियता की वजह एक शानदार वक्ता और लेखक होने के अलावा ये भी थी कि उन्होंने हिंदी को नकारते हुए तमिलों के लिए एक अलग भाषाई पहचान बनाई थी."

'अब धार्मिक संस्कार भी प्रदर्शन'

Image caption अयातोल्लाह खुमैनी की अंतिम यात्रा के समय तेहरान की सड़कों पर जनसैलाब मौजूद था

गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के मुताबिक 1989 में करीब एक करोड़ लोगों ने ज़बरदस्त कोलाहल के बीच अयातोल्लाह खोमैनी के ताबूत को तेहरान से गुज़रते हुए देखा.

ये एक जगह शोक मनाने वालों की सबसे ज़्यादा संख्या मानी जाती है. कहा जाता है कि हर छह में से एक ईरानी इस मौके पर मौजूद था. इस घटना में कुछ लोग कुचल कर भी मारे गए थे.

अगर राजनीतिक महत्व ही देखा जाए तो 2005 में रोम में पोप जॉन पॉल द्वितीय के अंतिम संस्कार के समय बीबीसी ने ख़बर दी थी कि सेंट पीटर्स स्क्वेयर में मौजूद ढाई लाख लोगों में दुनिया भर के 200 बड़े नेता भी थे.

Image caption अनुमान के मुताबिक अन्नादुरई के अंतिम संस्कार में डेढ़ करोड़ लोग शामिल हुए थे.

अनुमान है कि 1997 में राजकुमारी डायना के अंतिम संस्कार को दुनिया भर में अरबों लोगों ने टीवी पर देखा था.

'ग्रेट डेथ्स' के लेखक जॉन वोल्फ़ कहते हैं, "जब टेलीविज़न नहीं आया था तब अगर लोग किसी के अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहते थे तो उन्हें वहां जाना पड़ता था और वो साथ में बच्चों और नाती-पोतों को भी लाते थे. इसलिए 1852 में ब्रिटेन के सैन्य नायक ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन के अंतिम संस्कार में दस लाख से ज़्यादा लोग पहुंचे थे. ये वो वक़्त था जब लंदन का विस्तार हो रहा था और ट्रेनें लोगों को दूर-दूर से ला सकती थीं."

लेकिन वोल्फ़ जानते हैं कि वक़्त फिर से पहले जैसा हो गया है, लोग दूर से ही शामिल होकर संतुष्ट नहीं होते और वाकई वहां पहुंचना चाहते हैं.

वो कहते हैं, "धार्मिक संस्कार भी अपने आप में प्रदर्शन जैसा हो गया है."

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