बांग्लादेश: इस्लामी नेता कादर मुल्ला को फाँसी

  • 12 दिसंबर 2013

बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी नेता अब्दुल कादर मुल्ला को फाँसी दे दी गई है. देश की सर्वोच्च न्यायालय ने कट्टरपंथी इस्लामी नेता अब्दुल कादर मुल्ला की मौत की सज़ा को बरक़रार रखा था और गुरुवार देर शाम उन्हें फाँसी दे दी गई.

बांग्लादेश के गृह मंत्रालय ने बीबीसी को क़ादर मुल्ला की फाँसी की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्हें गुरुवार को रात दस बज ढाका के सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई.

कादर मुल्ला को फाँसी दिए जाने को लेकर देश भर में सुरक्षा सुबह से ही कड़ी कर दी गई थी, इसके बावजूद उन्हें फाँसी देने के बाद बांग्लादेश के कुछ शहरों में हिंसा की खबरें मिली हैं. विपक्षी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच हुए संघर्ष में कम से कम पांच लोगों के मारे जाने की ख़बर है.

क़ादर मुल्ला की पार्टी का कहना है कि उनकी फाँसी राजनीति से प्रेरित है.

याचिका रद्द

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के जज ने मौत की सज़ा पर उनकी पुनर्विचार याचिका को रद्द कर दी थी.

अब्दुल कादर मुल्ला को मंगलवार को ही फाँसी दी जानी थी लेकिन उन्हें अंतिम समय में राहत मिल गई.

कादर मुल्ला को फाँसी दिए जाने को लेकर देश भर में सुरक्षा सुबह से ही कड़ी कर दी गई थी, इसके बावजूद उन्हें फाँसी देने के बाद बांग्लादेश के कुछ शहरों में हिंसा की खबरें मिली हैं.

कादर मुल्ला: छात्र नेता से युद्ध अपराधी तक

साल 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी के लिए हुए युद्ध में मानवता के ख़िलाफ़ अपराध करने के मामले में अब्दुल कादर मुल्ला को इसी साल फ़रवरी में अदालत ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी.

जमात-ए-इस्लामी पार्टी के शीर्ष नेता कादर मुल्ला आरोपों को नकारते रहे हैं.

कादर मुल्ला पर चले मुक़दमे के विरोध में जमात-ए-इस्लामी ने व्यापक प्रदर्शन किए. उनके समर्थक सरकार पर राजनीतिक साज़िश का आरोप लगाते रहे हैं.

जमात-ए-इस्लामी पार्टी के कई शीर्ष नेता युद्ध अपराध मुक़दमे के सिलसिले में जेल में है.

Image caption अब्दुल कादर मुल्ला ने आरोपों से हमेशा इनकार किया है.

प्रदर्शन

मुल्ला उन पांच नेताओं में से हैं जिन्हें बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने फ़ांसी की सज़ा दी है. इस न्यायधिकरण की स्थापना 1971 के संघर्ष के दौरान हुए अत्याचारों की जांच के लिए साल 2010 में की गई थी. कुछ अनुमानों के मुताबिक 1971 के अत्याचारों में 30 लाख लोगों की मौत हुई थी.

मुल्ला जमात-ए-इस्लामी के सहायक महासचिव थे. मुल्ला को शुरुआत में आजीवन कारावास की सज़ा दी गई थी लेकिन बाद में उन्हें ढाका के उपनगर मीरपुर में निहत्थे नागरिकों और बुद्धिजीवियों की हत्या का दोषी पाया गया था.

इसके बाद हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने मांग की थी कि उन्हें फांसी दी जाए. बांग्लादेश की संसद ने इसके बाद क़ानून में बदलाव किया ताकि सरकार इस न्यायाधिकरण के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील कर सके.

इसी साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला की सज़ा को फाँसी में बदल दिया था.

इस विशेष अदालत पर मानवाधिकार समूहों ने सवाल उठाए हैं और कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी नहीं उतरती है.

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