पाकिस्तानः अग़वा बच्चों की रिपोर्ट नहीं

  • 21 दिसंबर 2013
पाकिस्तान लापता बच्चे

रुख़साना पंजाब के इलाक़े जामपुर से अपने पति आदिल के इलाज के लिए कराची आई थीं लेकिन यहां उनके लिए एक और मुश्किल खड़ी हो गई.

उन्होंने खांसी और बुख़ार से ग्रस्त डेढ़ साल की बेटी सादिया को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया था जहां से कोई अनजान औरत उसे उठाकर ले गई.

रुख़साना की शादी को सिर्फ़ दो साल हुए हैं और सादिया उनकी पहली औलाद थी.

वह कहती हैं, "मैं पहले ही शौहर की बीमारी की वजह से दुखी हूं. पता नहीं मैं अब मां बन सकूंगी या नहीं, लेकिन मेरी बेटी लूट ली गई है. मैं यहां इलाज के लिए आई थी. इसलिए तो नहीं आई थी कि मेरी बेटी को कोई उठाकर ले जाए."

कहां हैं ग़ायब बच्चे?

फैज़ बख़्श की दो साल की बेटी शुमायला पिछले साल जून में गुलशन इक़बाल की क़ायदे आज़म कॉलोनी से लापता हो गई थी.

बेटी की तलाश में माता-पिता इस क़दर परेशान रहे कि उनका कामकाज भी छूट गया.

पति चौकीदारी करते थे और बीवी घर में कामकाज करके कुछ पैसे और जोड़ लेती थी. अब दोनों दर-ब-दर भटकने को मजबूर हैं लेकिन पुलिस उनकी शिकायत दर्ज करने को तैयार नहीं.

फ़ैज बख़्श की बीवी कहती हैं, "थाने में जाते हैं तो थाने वाले हमारी बात बिल्कुल नहीं सुनते. कभी-कभी तो गेट के अंदर नहीं आने देते. जाते ही बोलते हैं नहीं है, कोई नहीं है जाओ."

Image caption स्वयंसेवी संस्था रोशनी के मुताबिक़ पिछले साल 2,000 से ज़्यादा बच्चे लापता हुए.

स्वयंसेवी संस्था रोशनी बच्चों के अधिकारों के लिए काम करती है. संस्था के आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल दो हज़ार से ज़्यादा बच्चे लापता हुए जिनमें से 80 फ़ीसदी लड़के थे.

सवाल है कि ये लापता बच्चे आख़िर कहां जाते हैं?

रोशनी के कार्यकर्ता मोहम्मद अली कहते हैं. "अगर एक साल से पांच साल के बच्चे ग़ायब होते हैं तो यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उस बच्चे को या तो भीख मंगवाने वाले माफ़िया के लोग ले गए हैं या फिर ऐसा शख़्स उठाकर ले गया है जो बच्चे को भीख मांगने के लिए तैयार करे या भीख मंगवाने लोगों को बेच दे.''

"लेकिन अगर पांच-छह साल से ऊपर के बच्चे का मामला है और अगर वह लड़की है तो ज़्यादा आशंका यह है कि उसे कोई यौन हमले के लिए उठाकर ले गया है."

'सीपीएलसी दर्ज करे मामले'

कराची पुलिस का कहना है कि पिछले साल शहर से पौने तेरह सौ लोगों को अग़वा किया गया.

लेकिन जबरन उठाए गए बच्चों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा है.

बच्चों की गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती है इसलिए कुल ग़ायब होने वाले बच्चों की सही तादाद सामने नहीं आ पाती है.

सिटीज़न पुलिस लाइज़न कमेटी पुलिस (सीपीएलसी) और शहरियों के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए काम करती है.

व्यावसायियों की आर्थिक मदद से चलने वाली इस संस्था का छोटे अपराधों के अलावा अपहरण की रोकथाम में भी अहम योगदान है.

सिंध हाईकोर्ट ने कहा है कि संस्था उन सभी लापता बच्चों के मां-बाप की शिकायत दर्ज करे, जिन्हें पुलिस इनकार कर चुकी है.

सीपीएलसी के प्रमुख अहमद चुनाए इस बात से इंकार करते हैं कि उनकी संस्था सिर्फ ऊंचे तबक़े के लोगों की सहायता करती है.

वह कहते हैं, "छोटे बच्चे अक्सर ग़रीब परिवारों के ग़ायब होते हैं इसलिए अक्सर इनकी सुनवाई नहीं होती. जो वंचित तबक़े के लोग हैं उनके पास सीपीएलसी के अलावा कोई और जगह नहीं है. हां, यह बात ज़रूर है कि इसके बारे में जानकारी ज़्यादा लोगों को नहीं है."

लापता बच्चे अधिकतर समाज के पिछड़े और ग़रीब परिवारों के होते हैं जिनके मामलों पर पुलिस और प्रशासन बहुत तवज्जो नहीं देता है.

ग़रीब मां-बाप भी कुछ अरसा रो-पीटकर ख़ामोश या मायूस हो जाते हैं.

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