किराए के मकान के लिए भटकती माहवारी वाली औरतें

  • 26 दिसंबर 2013
पूजा-पाठ करती एक नेपाली महिला.

नेपाल में महिलाएं कई तरह के सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठनों में काम करती हैं. इसके लिए उन्हें अपने घर और परिवार से काफ़ी दूर अकेले में रहना पड़ता है लेकिन रहने के लिए किराए का कमरा खोजने में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

ऐसा नहीं है कि देश में कमरों की कमी हो गई है. ऐसा चौपदी नाम की एक पुरानी परंपरा की वजह से है. इसकी वजह से महिलाओं को किराए पर कमरा लेने में परेशानी का सामना करना पड़ता है, ख़ासकर देश के सदूर पश्चिमी इलाक़ों में.

चौपदी की परंपरा के तहत रजोधर्म वाली महिलाओं को माहवारी के दौरान घर से बाहर पशुओं के बाड़े में रखा जाता है. दरअसल ऐसी महिलाओं को अपवित्र माना जाता है.

अपशकुन का डर

घर के मालिकों को लगता है कि नौकरीपेशा महिलाएं चौपदी का कड़ाई से पालन नहीं करेंगी. यह उनके घर के लिए अपशकुन होगा, इसलिए वे उन्हें किराए पर कमरा देने से परहेज करते हैं.

कुछ घर के मालिकों से इस संबंध में बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. हलांकि कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि नौकरीपेशा महिलाओं को किराए पर कमरा देने से पहले कुछ मकान मालिक चौपदी की परंपरा का पालन करने की शर्त रख देते हैं.

अचाम एक ऐसा ही ज़िला है, जहाँ आज के आधुनिक समय में भी चौपदी नाम के इस अंधविश्वास का कड़ाई से पालन किया जाता है. ताबिता परियार अचाम के एक ग़ैर सरकारी संगठन (एनज़ीओ) में काम करती हैं. उन्हें यहां किराए का एक कमरा तभी मिला जब वह इस परंपरा का पालन करने की मकान मालिक की शर्त पर सहमत हुईं.

ताबिता कहती हैं, "जब आप वहाँ जाते हैं, जहाँ पीने का पानी रखा हुआ है और आप पीने के लिए पानी मांगते हैं तो आपसे पूछा जाता है कि आपको माहवारी तो नहीं हो रही है."

उनके अनुसार, "आपको पीने का पानी तभी दिया जाता है, जब आप कहते हैं कि आप शुद्ध हैं. जब आप महिला हैं, तो आपसे पहला सवाल यह किया जाता है कि आप रजोधर्म में तो नहीं हैं, ऐसे में घर में रहने के लिए कहना काफ़ी कठिन हो जाता है."

दुखद अनुभव

दिना लामा दोती ज़िले में सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं. वह अपने गृह ज़िले संखुआसभा से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहती हैं, उनके अनुभव भी ताबिता जैसे ही हैं.

दिना बताती हैं, ''वे (मकान मालिक) सोचते हैं कि हम नए जमाने की नौकरीपेशा महिलाएं हैं, जो चौपदी का पालन नहीं करेंगी. अभी मैं जिस घर में रह रहीं हूँ, उसके मालिक ने भी मुझसे इन परंपराओं को पालन करने को कहा था.''

वह कहती हैं, ''वहाँ घर में एक पानी का ड्रम रखा है और माहवारी के दौरान मकान मालिक हमें उसे छूने नहीं देता है. अगर हम इसका पालन नहीं करते हैं, तो उन्हें लगता है कि घर में अपशकुन होगा. यही कारण है कि मकान मालिक नौकरीपेशा महिलाओं को कमरा देने से हिचकते हैं. ''

टूटती परंपराएं

इन इलाक़ों के स्थानीय लोगों को कहना है कि कमरा न मिलने की समस्या एक साधारण बात है. हालांकि इस समस्या पर बात करने के लिए कोई तैयार नहीं होता है. लेकिन 60 साल के रामजी श्रेष्ठ बताते हैं कि कुछ मकान मालिक किराए पर कमरा देने से पहले ऐसी शर्तें रखते हैं.

वह कहते हैं,''यहां किराए पर कमरा लेने के लिए उनके बनाए अपने नियम हैं. इन परंपराओं को छोड़ने के लिए उन पर (मकान मालिकों पर) दबाव नहीं डाल सकते हैं. वे पहले शर्त रखते हैं और अगर आप उसे मानने के लिए तैयार हैं तो आपको कमरा मिल जाएगा और अगर नहीं मानते हैं तो आप बेघर रहेंगे.''

लेकिन बहुत से लोगों को कहना है कि स्थिति में अब सुधार हो रहा है, क्योंकि इन परंपराओं का पालन अब केवल उन्हीं घरों में होता है जिनके मालिक बुजुर्ग हैं.

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