जिसने खींची थी भारत-पाकिस्तान के बीच बंटवारे की रेखा

  • 26 दिसंबर 2013
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साल 1947 का वो समय जब आनन फानन में ब्रिटेन से बुलाए गए सिरील रेडक्लिफ से कहा गया था कि भारत के दो टुकड़े करने है.... रेडक्लिफ न कभी भारत आए थे, न यहाँ की संस्कृति की समझ थी, बस भारत को बांटने का ज़िम्मा उन्हें सौंप दिया गया था. क्या गुज़रा होगा रेडक्लिफ़ के दिलो-दिमाग़ में.. इसी की कल्पना पर आधारित नाटक 'ड्राइंग द लाइन' लंदन में चर्चा में है.

नाटक के लेखक हॉवर्ड ब्रेंटन कुछ साल पहले भारत आए थे. वहाँ केरल में उनकी मुलाक़ात एक युवक से हुई जिसके पास पाकिस्तान में उनके पुश्तैनी घर की चाबियाँ आज भी हैं.

ये किस्सा सुनने के बाद हॉवर्ड के मन में भारत के बंटवारे को लेकर कई सवाल उठे और ख़ासकर उस शख़्स को लेकर जिसे विभाजन रेखा खींचने का ज़िम्मा सौंपा गया था.

कहते हैं कि रेडक्लिफ़ ने वो सब दस्तावेज़ और नक्शे जला दिए थे जो बंटवारे के गवाह थे और इस बारे में ज़्यादा बात नहीं की. इतिहासकारों के मुताबिक भारत और पाकिस्तान में हुई सांप्रादियक हिंसा के कारण लाखों लोगों की मौत हो गई थी.

क्या रेडक्लिफ़ को इस पूरी घटनाक्रम को लेकर ग्लानि थी, क्या वे ख़ौफ़ज़दा या नाराज़ थे? इन्हीं काल्पनिक सवालों का जवाब ढूँढने की कोशिश इस नाटक में की गई है.

ये नाटक भले ही इतिहास की एक त्रासदी को दर्शाता है जिसमें बंटवारे की रेखा अपने साथ ग़ुस्सा, बेबसी, कटुता का सैलाब लेकर आई. लेकिन नाटक में कई मुश्किल परिस्थितियों को भी कभी कभी तंज़ और व्यंग्य के पुट में दिखाया गया है.

मिसाल के तौर पर नाटक के एक दृश्य पर नज़र डालिए

पहला व्यक्ति (रेडक्लिफ़ से)- नक्शे पर आपने जो लकीर खींची है वो फिरोज़पुर की रेलवे लाइन है. आपने रेलवे लाइन के बीचों बीच सीमारेखा खींच दी है. एक रेल भारत में हो जाएगी और दूसरी पाकिस्तान में.

रेडक्लिफ़ (नक्शे पर खींची रेखा मिटाते हुए)- तो हम सीमारेखा को थोड़ा दक्षिण की ओर कर देते हैं. पहला व्यक्ति- लेकिन यहाँ तो हिंदुओं के खेत हैं रेडक्लिफ़- तो सीमारेखा को उत्तर की ओर कर देते हैं.

कैसे पाकिस्तान को मिला लाहौर

भारत के वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर विभाजन के समय सियालकोट में रहते थे. वे उन चंद लोगों में से थे जिन्होंने बाद में रेडक्लिफ़ से लंदन में मुलाक़ात की थी.

Image caption बंटवारे की फाइल फोटो

रेडक्लिफ़ से जुड़े अपने अनुभव बाँटते हुए कुलदीप नय्यर ने बताया, “मैं जानना चाहता था कि कैसे उन्होंने विभाजन की लाइन खींची. उन्होंने कोई बात मुझसे छिपाई नहीं.”

बकौल कुलदीव नय्यर रेडक्लिफ़ ने आपबीती सुनाते हुए कहा था, “मुझे 10-11 दिन मिले थे सीमा रेखा खींचने के लिए. उस वक़्त मैंने बस एक बार हवाई जहाज़ के ज़रिए दौरा किया. न ही ज़िलों के नक्शे थे मेरे पास. मैंने देखा लाहौर में हिंदुओं की संपत्ति ज़्यादा है. लेकिन मैंने ये भी पाया कि पाकिस्तान के हिस्से में कोई बड़ा शहर ही नहीं था. मैंने लाहौर को भारत से निकालकर पाकिस्तान को दे दिया. अब इसे सही कहो या कुछ और लेकिन ये मेरी मजबूरी थी. पाकिस्तान के लोग मुझसे नाराज़ हैं लेकिन उन्हें ख़ुश होना चाहिए कि मैने उन्हें लाहौर दे दिया.”

बंटवारे के कारण लाखों लोगों की जान गई. क्या रेडक्लिफ़ को इसे लेकर अफ़सोस था. कुलदीप नय्यर ने बताया कि इस बारे में रेडक्लिफ़ से कोई सीधी बात नहीं हुई लेकिन उन्हें बातचीत से ऐसा लगा कि रेडक्लिफ़ संवेदनशील इंसान थे और उन्हें काफ़ी ग्लानि महसूस हुई.

रेडक्लिफ़ कभी भारत नहीं लौटे

नाटक 'ड्राइंग द लाइन' में रेडक्लिफ़ का किरादर निभाने वाले ब्रितानी अभिनेता टॉम बियर्ड का भी मानना है कि वे शालीन और बिना पक्षपात करने वाले इंसान थे लेकिन अंतत वो शायद अपने काम को ठीक से अंजाम दे नहीं पाए.

नाटक की रिहर्सल के दौरान टॉम ने बताया, "मेरे ख़्याल से रेडक्लिफ़ पूरा काम सही तरीके से करना चाहते थे. उन्हें बहुत ही जटिल काम में झोंक दिया गया था, समय बहुत ही कम था उनके पास. रेडक्लिफ़ न्यायपूर्ण काम करना चाहते थे. पर वो कर नहीं पाए. वो इससे टूट जाते हैं, बिखर जाते हैं. दरअसल शुरू में उन्हें अंदाज़ा ही नहीं था कि ये कितना बड़ा काम है और इसका मानवीय-राजनीतिक असर क्या हो सकता है."

नाटक में काम करने वाले कलाकार मानते हैं कि 60 से भी ज़्यादा साल पहले हुए बंटवारे का खमियाज़ा आज की पीढ़ियाँ भी झेल रही हैं. भारतीय मूल के पॉल बेज़ली ने जिन्ना का किरदार निभाया है.

Image caption बंटवारे की फाइल फोटो

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "विभाजन की औपनेविशक विरासत का बोझ आज भी लोग उठा रहे हैं. कश्मीर को देखिए, वो आज युद्धक्षेत्र जैसा है. पाकिस्तान और भारत कई युद्ध लड़ चुके हैं. हज़ारों लोग दो ऐसे देशों की लड़ाई में मारे जा चुके हैं जो दो पीढ़ी पहले तक एक थे. जहाँ भी औपविेशवाद होता है, वो अपने निशां छोड़ ही जाता है. बस उस ताकत की जगह कोई नई शक्ति ले लेती है."

भारत और पाकिस्तान के लोगों के लिए ये नाटक इसलिए अहम है क्योंकि रेडिक्लिफ़ ही वो शख़्स थे जिनकी खींची एक रेखा ने रातों रात एक देश के दो टुकड़े कर दिए जबकि ब्रितानियों के लिए ये नाटक इतिहास की सबक की तरह है कि कैसे एक घटना लाखों लोगों की जान जाने की वजह बन गई.

बंटवारे के बाद लाखों की संख्या लोग अपना घर छोड़ सीमा के आर-पार जाने को मजूबर हुए लेकिन इस बीच सिरील रेडक्लिफ़ कभी भारत लौटकर नहीं आए.

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