ज्यून सिंड्रोम के लिए ज़िम्मेदार जींस की खोज

अपनी माँ और भाई के साथ जोशुआ
Image caption जोशुआ ने अपना पहला जन्मदिन अस्पताल में ही मनाया

अमांडा जब 12 हफ्ते की गर्भवती थीं तो उन्हें पता चला कि गर्भ में पल रहे बच्चे को कोई दिक़्क़त है.

उन्हें और उनके पति मार्क को बताया गया था कि उनका गर्भ में पल रहा बेटा गर्भावस्था में जीवित नहीं रह पाएगा. मगर वे गर्भपात नहीं कराना चाहते थे.

एक दुर्लभ लाइलाज समस्या के साथ जोशुआ एडेयर का जन्म जून 2011 में हुआ. इस बीमारी का नाम है ज्यून सिंड्रोम.

इसके साथ पैदा होने वाले बच्चों के हाथ-पैर विकसित नहीं होते और पसलियां अविकसित होती हैं.

कठिन जीवन

मार्क और अमांडा के इस दूसरे बच्चे के लिए यह कठिन जीवन की शुरुआत थी. उसका पहला महीना मैनचेस्टर चिल्ड्रेन हास्पिटल के इनक्यूबेटर में बीता, जिसकी मदद से वह सांस लेता था. उसकी सांस की समस्या जैसे-जैसे बढ़ती गई, उसे और अधिक ऑक्सीज़न की ज़रूरत पड़ने लगी और अंत में उसे जीवनरक्षक प्रणाली यानी वेंटीलेटर पर रख दिया गया.

एक समय आया जब उसके माता-पिता को कह दिया गया कि वह केवल कुछ हफ़्ते ज़िंदा रेहगा. उसकी माँ कहती हैं, ''उसकी पसलियां बढ़ नहीं रही थीं. इसलिए उसके लिए सांस लेना और मुश्किल हो गया. इसलिए हमने तीन हफ़्ते में उसका नामकरण कर दिया.''

वो बताती हैं, ''ऐसे वक़्त हमने तय किया कि उसके जीवन के लिए हम सब कुछ करेंगे. हम ग्रेटआरमांड स्ट्रीट हॉस्पिटल के संपर्क में आए.''

इस समस्या का जवाब था कि जोशुआ के सीने का ऑपरेशन कर उसे बढ़ाया जाए. इसमें उसकी सभी पसलियां तोड़कर धातु पत्तियों की मदद से फिर लगाई जाएं.

मगर एक गंभीर संक्रमण के चलते उसे दिल की समस्या हो गई. इसलिए ऑपरेशन नहीं हो सका. इसके बाद ऑपरेशन हुआ और सफल रहा. पाँच दिन बाद जोशुआ मैनचेस्टर वापस लौट आया.

वह अब ढाई साल का है और चार महीने से अपने माता-पिता के साथ है. अमांदा कहती हैं कि यह बहुत कठिन रास्ता था.

पहला जन्मदिन

Image caption वैज्ञानिकों ने ज्यून सिंड्रोम के लिए ज़िम्मेदार तीन जिंसों का पता लगाया है

वह कहती हैं,''उसने पहला जन्मदिन एक देखभाल यूनिट में गुज़ारा. पिछले अक्तूबर में हम क्रिसमस मनाने घर आए लेकिन उसके सीने में संक्रमण हो गया. इसलिए उसे दो हफ़्ते आईसीयू में रहना पड़ा.''

थोड़ी सी ठंड और संक्रमण इस बच्चे के लिए बड़ी समस्या बन जाती हैं. इससे उसे हमेशा के लिए वेंटीलेटर पर रखना पड़ सकता है.

इसके बावजूद जोशुआ माता-पिता और डॉक्टर के लिए किसी अजूबे से कम नहीं. अब वह खुद बैठ सकता है. पेट के बल लेट सकता है और आवाज़ें निकालता है लेकिन सांस की नली के ऑपरेशन की वजह से वह बोल नहीं सकता.

माना जाता है कि ज्यून सिंड्रोम से ब्रिटेन में छह सौ लोग पीड़ित हैं. हालांकि यह बच्चों को उनके माता-पिता से विरासत में मिलता है. ऐसे माता-पिता को यह पता नहीं चलता कि वे इस सिंड्रोम के वाहक हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के चाइल्ड हेल्थ इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता डॉक्टर मरियम स्किमिड्टस को एक्शन डल रिसर्च ने सिंड्रोम के लिए ज़िम्मेदार जींस का पता लगाने के लिए वित्तीय मदद दी थी.

शोध में उन्हें पता चला कि ज्यून सिंड्रोम से तीन जींस जुड़े हैं. यानी वैज्ञानिक अब 70 फ़ीसदी मामलों का पता लगा सकते है. वे गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में माता-पिता का इलाज भी कर सकते हैं.

शोध के नतीजे

वो कहती हैं कि उनके शोध के लिए जींस के अनुक्रमण की नई विधि क्रांतिकारी रही.

इनका पता लगने के बाद वैज्ञानिक बता पाएंगे कि आखिर यह स्थिति आती कैसे है. भविष्य में इस सिंड्रोम का इलाज़ खोजने में भी आसानी होगी.

इस साल अप्रैल में जोशुआ का एक और ऑपरेशन हुआ. अब टाइटेनियम प्लेट की जगह कृत्रिम हड्डियों का प्रयोग किया गया. यह ऑपरेशन भी सफल रहा, जिससे उसे बढ़ने और सीने को फैलने के लिए और जगह मिली.

यह उस बच्चे के लिए अच्छा है, जिसे एक मौक़ा भी नहीं मिल रहा था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार