बांग्लादेश में हिन्दू ही बन रहे हैं निशाना?

बांग्लादेश में पांच जनवरी को हुए आम चुनावों के बादसे एकाएक अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा की ख़बरें आ रहीं हैं.

उत्तरी बांग्लादेश के कुछ इलाक़े और दक्षिणी हिस्से के कई गांवों में जब इस तरह की वारदातें हुई तब क़रीब सौ से भी ज़्यादा हिन्दू परिवार अपना घर-बार छोड़ कर भाग गए.

जो इलाक़े सबसे ज़्यादा प्रभावित बताए गए हैं उनमें जेसोर, देबीगंज, राजशाही, मोईदनारहाट, शांतिपुर, प्रोधनपारा और आलमनगर जैसे ज़िले शामिल हैं.

हालांकि बांग्लादेश सरकार और ख़ुद प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने उनके ख़िलाफ़ हो रही कथित हिंसा को रोकनेऔर कार्रवाई पर ज़ोर दिया है लेकिन अभी तक सफलता की ख़बर नहीं मिली है.

बताया जा रहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय के जिन लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा की कोशिश हुई हैं, वे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने बहिष्कार और हड़ताल के आह्वाहन के बावजूद आम चुनावों में जाकर मतदान किया था.

कट्टरपंथियों का बोलबाला

लेकिन इस बात में भी उतनी ही सच्चाई है कि ऐसे तमाम मुसलमानों को भी निशाना बनाया गया है जिन्होंने चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लिया था.

सवाल यही उठता है कि क्या सिर्फ़ अल्पसंख्यक समुदाय ही बांग्लादेश में हिंसा का शिकार हो रहा है?

शहरयार कबीर बांग्लादेश के जाने-माने लेखक और कार्यकर्ता हैं. उन्होंने बताया, "ये बात सही है कि जब-जब कट्टरपंथियों का बोलबाला हो जाता है तब-तब अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनना पड़ता है. ऐसा आज से नहीं बांग्लादेश की आज़ादी के बाद कई दफ़ा हो चुका है. कई अन्य देशों की तरह यहाँ भी इन्हे राजनीति की भेंट चढ़ना पड़ता है. ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए."

इतिहास के मुताबिक़ 1947 में जब प्रायद्वीप में बंटवारा हुआ था तब लाखों हिन्दू परिवार यहाँ से पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी भारत में गए थे.

ऐसे ही कई मुसलमान परिवार थे जो उन हिस्सों से आकर बांग्लादेश में भी बस गए थे.

इसके बाद 1950 में तब के पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश में साम्प्रदायिकदंगे हुए जिनके बाद अल्पसंखयक हिंदुओं की एक और खेप भारत की ओर रवाना हुई थी.

हिंदूओं पर हमले का इतिहास

इसके बाद बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा का एक दौर 1971 में आया था जब बड़े हिन्दू नेताओं जैसे ज्योतिरमोय गुहा ठाकुरता, गोबिंद चन्द्र देब और धीरेन्द्र नाथ दत्त जैसों की हत्या फ़ौज के साथ हुई मुठभेड़ में हुई थी.

हालांकि ब्राक विश्विद्यालय में प्रोफ़ेसर पियाश करीम के मुताबिक़ एक और पहलू भी है.

उन्होंने बताया, "देखिए हिंसा का शिकार तो हर कोई होता है जब रजनीतिक उथल-पुथल होती है. हिन्दू भी हुए हैं और मुसलमान बंगाली भी. लेकिन इसमें पडोसी भारत की नीति भी और अनुकूल हो सकती थी, जिससे सीमा पर शरणार्थियों के साथ बेहतर व्यवहार होता".

आंकड़ों पर ग़ौर करें तो जहाँ बांग्लादेश में 1971 के दौरान लगभग 25 % आबादी हिंदुओं की थी वहीँ अब 10% के आस पास है.

सुरक्षा का सवाल

बांग्लादेश में घरेलू राजनीति के जानकार बाताते हैं कि पिछले चार दशक में हिंदुओं के मंदिरों समेत घरों और ज़मीनों को नुकसान पहुंचा है. हालांकि आम तौर पर बांग्लादेश में हिंदुओं को आवामी लीग गठबंधन का समर्थक बताया जाता है.

लेकिन अगर ऐसा है तो फिर सवाल भी कई उठते हैं. जब इस समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ कुछ धार्मिक राजनीतिक दलों ने चुनाव से पहले ही उसमे हिस्सा न लेने की धमकी दे दी थी, तब आवामी लीग सरकार ने इस पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया?

बांग्लादेशी नागरिकों की हैसियत से उनके घरों और परिवारों की सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी किसकी थी?

सवाल कई हैं लेकिन जवाब कम. बहरहाल अभी तो सरकार के सामने अपने रजनीतिक भविष्य के साथ साथ बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय, जिसमें हिन्दू, ईसाई, बौद्ध शामिल हैं, की सुरक्षा की चुनौती है.

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