मिस्र: क्रांति की तीसरी वर्षगांठ, हिंसा में 29 मरे

  • 26 जनवरी 2014
मिस्र में हिंसा

25 जनवरी 2011 को मिस्र में तत्कालीन राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के ख़िलाफ़ शुरू हुए जन आंदोलन ने दशकों से चली आ रही मुबारक की हुकूमत का ख़ात्मा कर दिया था. क्रांति की शुरूआत की तीसरी सालगिरह पर सेना समर्थित मौजूदा सरकार और अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी के समर्थन वाली संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड दोनों ने रैली करने का फ़ैसला किया था.

मौजूदा सरकार के समर्थकों और विरोधियों के बीच हुई झड़पों में कम से कम 29 लोग मारे गए हैं. राजधानी क़ाहिरा में सबसे ज़्यादा लोग मारे गए जबकि अलेक्ज़ेंड्रिया में भी एक महिला की मौत हो गई.

देश भर में और ख़ासकर राजधानी क़ाहिरा में हिंसा की आशंका के मद्देनज़र सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे. ग़ौरतलब है कि शुक्रवार को क़ाहिरा में हुए बम धमाकों में छह लोग मारे और 100 से ज़्यादा घायल हो गए थे. जबकि शुक्रवार को ही दूसरे शहरों में हुई हिंसक वारदातों में कुल 18 लोग मारे गए थे.

मिस्र के आंतरिक मामलों के मंत्री मोहम्मद इब्राहीम ने जनता से इस मौक़े पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम मेँ शामिल होने की अपील की थी. मुस्लिम ब्रदरहुड को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि हालात को ख़राब करने की किसी भी कोशिश को सख़्ती से निपटा जाएगा.

मोर्सी का तख़्तापलट

जूलाई 2013 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को सत्ता से हटा दिया गया था तभी से मुस्लिम ब्रदरहुड आंदोलन कर रहा है. मोर्सी की जगह जनरल अब्दुल फ़तह अल-सिसि फ़िलहाल मिस्र के राष्ट्रपति हैं जिन्हें सेना का समर्थन हासिल है.

हाल ही में मौजूदा सरकार ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक चरमपंथी संगठन क़रार दिया है. सरकार के मुताबिक़ देश भर में हो रही हिंसक वारदातों के पीछे मुस्लिम ब्रदरहुड का हाथ है लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड इन तमाम आरोपों को ख़ारिज करता है.

मौजूदा सरकार के विरोध में मुस्लिम ब्रदरहुड की अध्यक्षता में बने संगठनों के एक समूह ने शनिवार से अगले 18 दिनों तक आंदोलन करने की अपील की है.

18 दिनों तक आंदोलन जारी रखने की एक ख़ास वजह ये है कि 2011 में मुबारक के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन भी 18 दिनों तक चला था जिसके बाद मुबारक को सत्ता से हटना पड़ा था

उसके बाद हुए चुनाव में मोहम्मद मोर्सी पहली बार एक प्रजातांत्रिक तरीक़े से चुने जानी वाली सरकार के मुखिया बने थे. लेकिन मोर्सी के ख़िलाफ़ भी जनता के विरोध प्रदर्शन के कारण सेना ने दख़ल दिया और फिर सेना ने मोर्सी को भी सत्ता से हटा दिया था.

लोगों का मानना है कि इस बात की पूरी आशंका है कि मौजूदा अंतरिम राष्ट्रपति अल-सिसि एक दफ़ा फिर चुनाव लड़ेगें और एक बार फिर सेना का कोई आदमी मिस्र की सत्ता की बागडोर संभालेगा जैसा कि पिछले छह दशकों से होता आया है.

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