बीजिंग से भी बदतर दिल्ली की 'आबोहवा'

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एक ताज़ा अध्ययन के अनुसार दिल्ली ने वायु प्रदूषण के मामले में चीन की राजधानी बीजिंग को पछाड़ दिया है.

अमरीका के येल विश्विद्यालय के अध्ययन में ये बात सामने आई है.

हालाँकि दिल्ली प्रदषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा है कि मौजूदा वायु प्रदूषण के पीछे मौसम प्रमुख कारण है और सालाना औसत के लिहाज से दिल्ली अब भी बीजिंग से पीछे हैं.

लेकिन अध्ययन के मुताबिक़ ताज़ा एनवॉयरमेंट परफार्मेंस इंडेक्स (ईपीआई) में 178 देशों के शहरों में भारत का स्थान 32 अंक गिरकर 155वां हो गया है.

वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति ब्रिक्स देशों (चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका) में सबसे खस्ताहाल है. इंडेक्स में सबसे ऊपर स्विट्ज़रलैंड है.

भारत से बेहतर पाक

प्रदूषण के मामले में भारत की अपेक्षा पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और चीन की स्थिति बेहतर है, जिनका इस इंडेक्स में स्थान क्रमशः 148वां, 139वां, 69वां और 118वां है.

इस इंडेक्स को नौ कारकों- स्वास्थ्य पर प्रभाव, वायु प्रदूषण, पेयजल एवं स्वच्छता, जल संसाधन, कृषि, मछली पालन, जंगल, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा के आधार पर तैयार किया गया है.

इंडेक्स के अनुसार, दुनिया में पांच सबसे स्वच्छ देश हैं- स्विट्जरलैंड, लक्ज़मबर्ग, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और चेक गणराज्य.

येल विश्वविद्यालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, ''प्रदूषण से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान के मामले में भारत का प्रदर्शन अच्छा नहीं है.''

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में वायु प्रदूषण की हालत सबसे बुरी है.

नासा सैटेलाइट द्वारा इकट्ठा किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली में पीएम-25 (पार्टीकुलेट मैटर-2.5 माइक्रान से छोटे कण) की मात्रा सबसे ज्यादा थी.

बीजिंग पीछे छूटा

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धुंध और वायु प्रदूषण के लिए कुख्यात चीन का बीजिंग शहर इस मामले पीछे छूट गया.

पीएम-25 प्रदूषण के मामले में दिल्ली बीजिंग को लगातार पीछे छोड़ता जा रहा है.

गाड़ियों की भारी संख्या और औद्योगिक उत्सर्जन से हवा में पीएम-25 कणों की बढ़ती मात्रा घने धुंध का कारण बन रही हैं.

पिछले कुछ सालों में दिल्ली में धुंध की समस्या बढ़ती ही जा रही है.

इसके बावजूद, जहां बीजिंग में धुंध सुर्खियों में छाया रहता है और सरकार को एहतियात बरतने की चेतावनी तक जारी करनी पड़ती है, वहीं दिल्ली में इसे नज़रअंदाज कर दिया जाता है.

हार्वर्ड इंटरनेशनल रिव्यू के मुताबिक पांच में हर दो दिल्लीवासी श्वसन संबंधी बीमारी से ग्रस्त हैं.

लैंसेट ग्लोबल हेल्थ बर्डन 2013 के अनुसार, "भारत में वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए छठा सबसे घातक कारण बन चुका है."

भारत में श्वसन संबधी बीमारियों के कारण होने वाली मौतों की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है. यहां अस्थमा से होने वाली मौतों की संख्या किसी भी अन्य देश से ज्यादा है.

12 गुना ज्यादा प्रदूषण

येल विश्वविद्यालय के अध्ययन के मुताबिक, 2.5 माइक्रान व्यास से छोटे कण मनुष्यों के फेफड़ों और रक्त उत्तकों में आसानी से जमा हो जाते हैं, जिसके कारण हृदयाघात से लेकर फेफड़ों का कैंसर तक होने का खतरा होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रतिदिन 25 माइक्रोग्राम कण प्रति घन मीटर तक की मात्रा स्वास्थ्य के लिए घातक नहीं है.

लेकिन इस वर्ष जनवरी के पहले तीन सप्ताह में नई दिल्ली के पंजाबी बाग में प्रदूषण की औसत रीडिंग 473 पीएम-25 थी, जबकि बीजिंग में यह 227 थी.

इस वर्ष बीजिंग में पहली बार 15 जनवरी की रात को पीएम-25 की मात्रा 500 को पार कर गया था. लेकिन दिल्ली में आठ दिन तक प्रदूषण का यह स्तर बना रहा.

दिल्ली में तीन सप्ताह में एक बार पीएम-25 की मात्रा 300 से नीचे पहुंची, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाई गई मात्रा से 12 गुना ज्यादा है.

येल सेंटर ऑफ एनवॉयोन्मेंट लॉ एंड पॉलिसी से जुड़े डॉ. एंजेल ह्यू कहते हैं, ''मुझे हमेशा यह बात परेशान करती है कि प्रदूषण के मामले हमेशा चीन की चर्चा होती है न कि भारत की.''

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