जहाँ विरोध की आँच पर उबल रहा है 'सियासी' चावल

  • 4 फरवरी 2014
थाईलैंड में धान की खेती करने वाले किसानों का विरोध इमेज कॉपीरइट AFP

थाईलैंड में एक तरफ जहां सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन जारी हैं, वहीं सरकार ने आम चुनावों के कार्यक्रम को जारी रखा हालांकि कुछ जगहों पर वोटिंग के पहले हंगामा हुआ.

प्रदर्शनकारियों ने राजधानी बैंकॉक के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा कर रखा है. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री यिंगलक चिनावाट भ्रष्ट हैं और मनमाने तरीके से काम करती हैं. लेकिन ये प्रदर्शनकारी सरकार समर्थकों को एक बात पर राज़ी नहीं कर पाए हैं. आलोचकों का मानना है कि चावल से जुड़ी सरकार की स्कीम पर होने वाला खर्च बहुत ज़्यादा और अनावश्यक है.

( बैंकॉक में दो महीने के लिए आपातकाल)

जिन किसानों ने इस स्कीम में हिस्सा लिया था, वो कर्ज़ के बोझ तले डूबे हैं. सोमचार्ट यिमलमाई ऐसे ही एक किसान हैं और अपने पुराने ट्रैक्टर पर बैठकर दिन की शुरुआत होते ही अपने काम पर निकल जाते हैं. वो चावल की खेती करते हैं, लेकिन उससे मिलने वाला पैसा जीवन गुज़ारने के लिए काफ़ी नहीं है. लेकिन हाल ही में ज़िंदगी में मुश्किलें बढ़ी हैं.

अक्टूबर में सोमचार्ट को उनकी फ़सल के लिए मिलने वाली सरकारी मदद नहीं मिली थी. पिछले तीन सालों से सरकार थाईलैंड के किसानों से उनकी सारी पैदावार खरीद रही थी ताकि किसानों के जीवन का स्तर सुधारा जा सके और चुनाव के दौरान ये किसान सरकार के साथ हों.

चावल का बाज़ार

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सोमचार्ट ने बताया कि उन्हें बीज, खाद और उनकी दूसरी ज़रूरतों के लिए सरकारी आर्थिक मदद चाहिए और सरकारी मदद के अभाव में उन्हें स्थानीय क़र्ज़दारों से ऊँची ब्याज़ दरों पर ऋण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है. वो अब सरकार को अपने समर्थन पर पुनर्विचार कर रहे हैं.

(विरोध प्रदर्शन की चिनगारी)

सरकार देशव्यापी प्रदर्शनों को इस मदद में देरी को ज़िम्मेदार ठहराती है. प्रदर्शनकारियों ने पिछले नवंबर से कई सरकारी इमारतों पर कब्ज़ा कर रखा है. लेकिन किसानों की बढ़ती निराशा के कारण ध्यान चावल पर सरकारी नीति पर केंद्रित हो रहा है. अतीत में किसानों ने आमतौर पर भारी बहुमत से सरकार का साथ दिया है.

उधर विपक्ष का आरोप है कि ये सरकारी कार्यक्रम धन का दुरूपयोग है.

कॉर्न चटिकावानिज पूर्व वित्त मंत्री और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी में नीति विशेषज्ञ हैं. वे कहते हैं, "सरकार ने जो चावल किसानों से खरीदा है उसकी कीमत बाज़ार के दाम से 40 से 50 प्रतिशत ज़्यादा है. इससे चावल का बाज़ार तबाह हो गया है. इससे भ्रष्टाचार बढ़ा है."

इस कार्यक्रम की कमान उप-प्रधानमंत्री निवत्थमरंग बूनसॉंगपायसन के हाथ में हैं. उनका कहना है, "आपको पता है कि एक किसान दिन में कितना पैसा कमाता है. करीब 200 बाट. किसानों को अभी भी प्रतिदिन काम करने का मेहनताना कानून में निर्धारित मेहनताने से कम मिलता है."

बड़ा निर्यातक

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दुनिया के बाज़ारों में थाईलैंड अभी भी चावल का बड़ा निर्यातक है लेकिन सरकार की ओर से ऊँची कीमत तय कर दिए जाने के कारण वैश्विक बाज़ार में थाईलैंड के चावल पिछड़ता जा रहा है. साथ ही ये बताना भी मुश्किल है कि इस स्कीम पर कितना सरकारी धन खर्च हो रहा है क्योंकि सरकार इकट्ठा किए गए चावल के भंडार को बेच नहीं पाई है.

(एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ धराशाई)

इस सवाल के जवाब में उप प्रधानमंत्री कहते हैं, "मैं यहां कोई आंकड़ा नहीं बताना चाहता हूँ. हमें पहले समस्या होती थी, लेकिन अब नहीं है." लेकिन थाईलैंड के चावल के व्यापारियों का रुख भी सरकार के लिए चिंता का विषय रहा है. चारोएन ताओथामाटास थाई राइस एक्सपोर्टर के नव निर्वाचित प्रमुख हैं.

उनका कहना है, "अभी जिस दाम पर सरकार किसानों से चावल खरीद रही है वो बाज़ारी भाव से 50 प्रतिशत से ज़्यादा है. हमारी प्रतिस्पर्धा वियतनाम और भारत जैसे देशों के साथ है. हमें चावल के निर्यात में परेशानी हो रही है. हमें पता नहीं कि भविष्य में क्या होगा क्योंकि करीब पांच करोड़ टन चावल गोदाम में भरा हुआ है. इसकी गुणवत्ता खराब हो रही है, औऱ हम इसे किसे बेचेंगे."

थाईलैंड में माहौल इतना खराब है कि सरकार आर्थिक मदद में देरी के लिए प्रदर्शनों को ज़िम्मेदार ठहरा सकती है. लेकिन विपक्ष को इससे सरकार पर आरोप लगाने का एक औऱ मौका मिल गया है.

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